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आपदा प्रबंधन: प्रकृति का अनिवार्य नियम है भूकंप, लेकिन मानव जनित है जन-हानि

Sun, 05 Mar 2023 05:12 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Sun, 05 Mar 2023 05:12 AM IST
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सार
भूकंप प्राकृतिक है, लेकिन भूकंप से होने वाली मौतें मानव द्वारा प्रबंधित हैं। लोग भूकंप से नहीं मरते, अपनी आवास टेक्नोलॉजी के कारण मरते हैं। संयोग से अब कई देशों ने बेहतर निर्माण टेक्नोलॉजी अपनाकर अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित आवास-व्यवस्था प्रदान की है।
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Disaster Management Earthquake is natural calamity human loss may be minimized
सांकेतिक फोटो - फोटो : PTI

विस्तार

लगभग एक महीने पहले तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप में करीब 52,000 लोग मारे गए। सिर्फ तुर्की में ही भूकंप ने करीब 45,000 लोगों की जान ली है। भूकंप की न तो यह पहली घटना थी, न ही आखिरी होगी। जीवित ग्रह पर सदैव भूकंप आते रहे हैं। भौगोलिक दृष्टि से भूकंप का महत्व यह है कि इससे पृथ्वी तनाव-मुक्त होती है। लेकिन कई बार इससे जान-माल की भीषण हानि होती है, जैसे कि तुर्की और सीरिया में हुई है। बड़ा भूकंप विनाश का ऐसा दृश्य छोड़ जाता है, जिसकी भयावहता वर्षों तक स्मृतियों से नहीं मिटती।



पृथ्वी की चट्टानों के माध्यम से भूकंपीय तरंगों के पारित होने के कारण जमीन का अचानक हिलना ही भूकंप है। भूकंपीय तरंगें तब पैदा होती हैं, जब पृथ्वी के भीतरी केंद्र में संग्रहित ऊर्जा को अचानक छोड़ दिया जाता है। हमारी पृथ्वी दिन-प्रतिदिन भूकंपों से तरंगित रहती है और स्वयं को उसके अंदर बनते तनावों से मुक्त करती रहती है, जो कि एक जीवित ग्रह की स्वाभाविक प्रकृति है। रिक्टर स्केल पर 1.0 से 2.9 तीव्रता के लगभग 1,00,000 छोटे भूकंप प्रतिवर्ष आते हैं, जिन्हें स्थानीय उपकरणों से मापा तो जा सकता है, पर उन्हें अनुभव नहीं किया जा सकता। रिक्टर पैमाने पर 3.0 से 3.9 तीव्रता के 12,000 से 10,0,000 भूकंप प्रतिवर्ष आते हैं, जिन्हें कुछ लोगों द्वारा अनुभव किया जा सकता है, लेकिन उनसे कोई हानि नहीं होती। 4.0 से 4.9 की तीव्रता के भूकंपों की सालाना संख्या 2,000 से 12,000 होती है, जिन्हें अनुभव किया जाता है, और जिनसे थोड़ा-बहुत नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।


रिक्टर स्केल पर 5.0 से 5.9 भूकंपों की वार्षिक संख्या 200 से 2,000 है, जिनसे कुछ नुकसान हो सकता है। रिक्टर स्केल पर 6.0 से 6.9 तीव्रता के भूकंप को बड़ा भूकंप माना जाता है और एक वर्ष में ऐसे 20 से 200 भूकंपों से धरती दहलती है और भारी हानि का सामना करना पड़ता है। तीन से पांच भूकंप 7.0 से 7.9 तीव्रता के हर वर्ष पृथ्वी पर झेलने होते हैं, जो जान-माल की बहुत हानि कर जाते हैं। और रिक्टर स्केल पर आठ से अधिक का भूकंप, जिसकी संख्या प्रतिवर्ष तीन से कम रहती है, सब कुछ ध्वस्त कर देता है।

वैसे तो भूकंप पृथ्वी पर कहीं भी आ सकते हैं, लेकिन मुख्य रूप से ये फॉल्ट लाइन्स (पृथ्वी के गर्भ की चट्टानों में प्लानर या घुमावदार फ्रैक्चर) के साथ होते हैं, जहां संपीडन या तन्य बल चट्टानों को फ्रैक्चर के विपरीत दिशा में ले जाते हैं। ऐसे फॉल्ट्स कुछ सेंटीमीटर से लेकर कई सौ किलोमीटर तक फैले होते हैं। इसके अलावा, दुनिया के अधिकांश भूकंप 'रिंग ऑफ फायर' के भीतर आते हैं, जो कि भूकंप के अधिकेंद्रों, ज्वालामुखियों, और टेक्टॉनिक प्लेट सीमाओं की घोड़े के नाल के आकार की लंबी बेल्ट है, जो प्रशांत बेसिन को घेरती है।

दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण भूकंप बेल्ट सर्कम-पैसिफिक बेल्ट है, जो प्रशांत महासागर के आसपास के कई आबादी वाले तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करती है, जैसे, न्यूजीलैंड, न्यू गिनी, जापान, अलेउतियन द्वीप समूह, अलास्का तथा उत्तर अमेरिका के उत्तरी व दक्षिणी तट। अनुमानत: वर्तमान में भूकंपों में जारी ऊर्जा का 80 प्रतिशत पृथ्वी के उन क्षेत्रों से मुक्त होता है, जिनके अधिकेंद्र (एपीसेंटर) इस बेल्ट में हैं। एक दूसरी भूकंप-सक्रिय बेल्ट-जिसे एल्पाइड बेल्ट के रूप में जाना जाता है-एशिया के माध्यम से भूमध्यसागरीय क्षेत्र से पूर्व की ओर गुजरती हुई वेस्ट इंडीज में सर्कम-पैसिफिक बेल्ट से मिल जाती है। इस बेल्ट से भूकंपों में जारी ऊर्जा दुनिया की कुल ऊर्जा का लगभग 15 प्रतिशत है। आर्कटिक महासागर, अटलांटिक महासागर, पश्चिमी हिंद महासागर तथा पूर्वी अफ्रीका की दरार घाटियों के साथ भूकंप गतिविधि से जुड़े बेल्ट भी हैं। भूकंप ज्वालामुखी के फटने से, जलाशय-प्रेरण से और मानव गतिविधियों से धरती के गर्भ से अत्यधिक मात्रा में जीवाश्म पदार्थों के दोहन से भी आ सकते हैं।

भूकंप के माध्यम से भूमि इतनी प्रचंड मात्रा में ऊर्जा से अवमुक्त न हो, तो हमारे ग्रह का क्या हाल होगा!  पृथ्वी के गर्भ में उसकी धारण-क्षमता से अधिक ऊर्जा एकत्र होती रहे और उसको भूकंपों के माध्यम से उत्सर्जित करने का रास्ता न मिले, तो कालांतर में किसी एक भूकंप से ही भूखंड दूर-दूर तक छिटक सकते हैं। इसलिए पृथ्वी का ऊर्जा बजट संतुलित रखने, उसे निरंतर उत्पन्न आंतरिक तनावों से मुक्त रखने, अक्षुण्ण और जीवन-दायिनी बनाए रखने के लिए भूकंप जरूरी हैं।

भूकंप प्रकृति का नियम है। एक प्राकृतिक त्रासदी मानकर अब तक हुई लाखों लोगों की मौत का दोष भूकंप पर मढ़कर कुछ समय बाद भुला दिया जाता है, अगली भूकंपीय घटना में और लोगों की बलि देने के लिए। भूकंप प्राकृतिक है, लेकिन भूकंप से होने वाली मौतें मानव द्वारा प्रबंधित हैं। लोग भूकंप से नहीं मरते, अपनी आवास टेक्नोलॉजी से मरते हैं। वे अपने घरों की अपनी छतों से दबकर मरते हैं। भूकंप के समय अगर सबसे अधिक खतरा कहीं है, तो वह अपने घर में है। भूकंप के समय मैदान में होने पर उसका अनुभव भी नहीं होगा। वे तो हमारे पारंपरिक निर्माण-तकनीक से बने घर हैं जो एक अवश्यंभावी ग्रह-अनुकूल प्राकृतिक प्रक्रिया को एक आपदा में बदल देते हैं। संयोग से अब बेहतर निर्माण टेक्नोलॉजी का आविष्कार हो चुका है और कई देशों ने इसे अपनाकर अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित आवास-व्यवस्था प्रदान की है।

-प्रोफेसर एमेरिटस (पर्यावरण विज्ञान), जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय

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