धूप आने दो : महादेव ने क्यों काटा ब्रह्मा का पांचवां सिर, संस्कृति के पन्नों से होता है खुलासा
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
भगवान शिव ने परमपिता ब्रह्मा की ऐसी कामासक्त दशा देखी, तो उन्हें पिता के मन में पुत्री के लिए ऐसा भाव देखकर क्रोध आ गया।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के रचना-कर्म का प्रयास जब आगे नहीं बढ़ा, तो ब्रह्मा ने अपने ही शरीर को दो भागों में विभक्त कर लिया। एक भाग पुरुष और दूसरा भाग स्त्री का हो गया। पुरुष का नाम 'मनु' और स्त्री का नाम 'ब्राह्मी' था। इस तरह मनु, ब्रह्मा का पुत्र और ब्राह्मी, उनकी पुत्री हुई। परंतु देवर्षि नारद ने किसी कारणवश ब्रह्मा को यह शाप दिया था, जिसके फलस्वरूप ब्रह्मा के मन में अपनी ही पुत्री ब्राह्मी के प्रति कामना उत्पन्न हो गई। ब्राह्मी का सौंदर्य अप्रतिम था, जिसे देखकर सृष्टिकर्ता अपनी रचना पर मुग्ध हो गए। वह ब्राह्मी को टकटकी लगाए देखते रहे। उनकी आंखों में अपनी पुत्री के लिए स्नेह और आशीष का भाव नहीं, अपितु उसे प्राप्त करने की कामना थी!
ब्राह्मी ने जब परमपिता ब्रह्मा की आंखों में इस तरह का भाव देखा, तो वह घबराकर मुड़ी और ब्रह्मा के बाईं ओर जाकर खड़ी हो गई। परंतु ब्रह्मा ऐसे मोहित थे कि ब्राह्मी को देखने के लिए बाईं ओर उनका एक सिर प्रकट हो गया। यह देखकर ब्राह्मी को बहुत आश्चर्य हुआ। वह फिर मुड़ी और ब्रह्मा के दाहिनी ओर चली गई। परंतु ब्रह्मा उसे देखते रहना चाहते थे, तो उनका एक और सिर दाहिनी ओर निकल आया। ब्राह्मी असहज हो गई। वह घूमकर ब्रह्मा के पीछे चली गई। लेकिन यह क्या! ब्रह्मा का चौथा सिर पीछे की ओर प्रकट हो गया। वह पुन: ब्राह्मी को मुग्ध-भाव से देखने लगे। ब्राह्मी स्तब्ध थी। पिता के मन में पुत्री के लिए ऐसा भाव! फिर ब्राह्मी ने अपना अंतिम प्रयास किया और वह ऊपर हवा में उठ गई। परंतु ब्रह्मा ने फिर भी उसका पीछा नहीं छोड़ा! इस बार उनका पांचवां सिर, ऊपर की ओर प्रकट हो गया और वे निरंतर ब्राह्मी को ताकते रहे।
ब्रह्मा की आसक्ति बढ़ती जा रही थी। ब्राह्मी समझ गई कि ब्रह्मा की दृष्टि से बचने के लिए उसे परमपिता से दूर जाना होगा। परंतु वह जहां भी गई, ब्रह्मा उसका पीछा करते रहे। ब्रह्मा से बचने के लिए ब्राह्मी ने पशु-पक्षियों का रूप तक धारण करके देखा। परंतु फिर भी सफलता नहीं मिली। ब्राह्मी घोड़ी बनी, तो ब्रह्मा घोड़ा बनकर आ गए, उसने गाय का रूप धरा, तो ब्रह्मा बैल बन गए। वह हिरणी में बदल गई, तो ब्रह्मा भी हिरण बन गए। इस तरह ब्राह्मी ने पशु, सरीसृप, पक्षी, कीट, स्तनधारी आदि सभी श्रेणियों में रूप धारण किए, परंतु हर बार उसने ब्रह्मा को नर रूप में अपने सामने पाया।
ब्राह्मी ने इस तरह एक-एक करके सौ रूप बदले, जिसके चलते उसका नाम पड़ा- शतरूपा। अधिकतर ग्रंथों में ब्रह्मा की संतान के रूप में मनु और शतरूपा का ही नाम मिलता है। भगवान शिव ने परमपिता ब्रह्मा की ऐसी कामासक्त दशा देखी, तो उन्हें पिता के मन में पुत्री के लिए ऐसा भाव देखकर क्रोध आ गया। तब शिव ने ब्रह्मा का ऊपर निकला पांचवां सिर काट डाला, जिसके बाद ब्रह्मा के केवल चार सिर रह गए। शिव ने ब्रह्मा का सिर तो काट दिया, किंतु वह कटा सिर शिव के हाथ से चिपक गया। यह देखकर शिव चकित थे। फिर उन्हें अहसास हुआ कि ब्रह्मा का शीश काटकर उनसे ब्रह्म-हत्या का पाप हो गया, जिसके दंडस्वरूप ब्रह्मा का सिर उनके हाथ से चिपक गया था।
भगवान शिव संसार-भर में घूमकर प्रयास करते रहे, किंतु उन्हें ब्रह्मा के कटे शीश से मुक्ति नहीं मिली। कुछ समय बाद, उस शीश का मांस सड़कर गिर गया और केवल हड्डियां शेष रह गईं। इस तरह शिव के हाथ में खाली कपाल रह गया। इसलिए उनका एक नाम ‘कपाली’ पड़ा। शिव के कुछ अनुयायी, जो कपाल लेकर घूमते हैं, ‘कापालिक’ कहलाते हैं। फिर एक स्थान पर पहुंचकर शिव के हाथ से कपाल स्वत: छूटकर गिर गया। भगवान समझ गए कि उन्हें ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई है। इसी कारण वह भूमि, जहां कपाल गिरा, मोक्षदायिनी मानी जाती है और मान्यता है कि उस जगह लोगों को अपने पापों से मुक्ति मिलती है। बाद में यही स्थान काशी (वाराणसी) कहलाया। काशी को ‘सप्तपुरी’ में भी स्थान मिला है। ‘सप्तपुरी’ वे सात पवित्र स्थान हैं, जिन्हें मोक्ष-प्राप्ति का तीर्थस्थल माना जाता है। इनमें वाराणसी के अलावा अयोध्या, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार, उज्जैन और कांचीपुरम भी शामिल हैं।