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विकास : हीरा खोदकर हारे पन्ना-वासी
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सोशल मीडिया
विस्तार
जबसे ‘रियो-टिंटो’ कंपनी ने छतरपुर जिले के बक्सवाहा में जंगल के नीचे हीरे की खोज की है, तबसे वहां के विकास और रोजगार के अवसरों की चर्चा जोरों पर है। स्थानीय लोगों की अपनी अलग-अलग सोच और विकास के मापदंड हैं और शहरी लोगों ने कोरोना काल में ऑक्सीजन का जो संकट झेला है, उससे जंगल बचाने की हाय-तौबा मच गई है।
‘रियो-टिंटो’ कंपनी के ‘बक्सवाहा हीरा खनन परियोजना’ से 2017 में अलग होने के बाद यह प्रोजेक्ट अब बिड़ला समूह की ‘एस्सेल माइनिंग ऐंड इंडस्ट्री लिमिटेड’ कंपनी के पास है। इस कंपनी ने 382.181 हेक्टेयर जमीन पर 56 हजार करोड़ के ऑफसेट मूल्य पर 50 साल की माइनिंग लीज प्राप्त की है। इस पर खनन कार्य होना है और परियोजना से स्थानीय लोग विकास की आस लगाए बैठे हैं।
प्रदेश को हीरा प्रधान राज्य बनाने वाला मध्य प्रदेश का हीरा खनन क्षेत्र बक्सवाहा (छतरपुर) हीरा खनन परियोजना से 150 किलोमीटर दूर पन्ना जिले में ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ से लगे इलाके में है। मझगंवा में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) 1968 से खनन कार्य कर रहा है, लेकिन सवाल है कि बेशकीमती हीरा पन्ना की जमीन से निकलने के बाद यहां के लोगों के विकास को कहां तक पहुंचा पाया?
वर्ष 2018 के आंकड़ों के अनुसार, ‘मानव विकास सूचकांक’ में मध्य प्रदेश के 52 जिलों में पन्ना का 48वां स्थान है। इस प्रकार यह जिला मध्य प्रदेश के पांच अति पिछड़े जिलों में शामिल है। इससे समझा जा सकता है कि जिस इलाके की जमीन हीरा उगल रही है, उस इलाके की तस्वीर कितनी बदली है।
विंध्याचल पर्वतमाला की कैमूर-श्रेणी में अवस्थित पन्ना जैव विविधता से सराबोर है। वर्ष 1981 में यहां ‘राष्ट्रीय उद्यान’ बनाया गया, जिसे 1994 में ‘टाइगर रिजर्व’ घोषित कर दिया गया। यह देश के सबसे अच्छे ‘रेप्टाइल पार्क’ के रूप में जाना जाता है। यहां ‘केन-घड़ियाल अभयारण्य’ भी है।
एक अनुमान के मुताबिक, पन्ना में 22 लाख कैरेट हीरा पाया जाता है, जिसे पिछले 60 वर्षों से निकाला जा रहा है। इस हीरे की चमक के पीछे स्थानीय गांव के लोग विस्थापित होने को तैयार हुए, ताकि उनकी पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो और पन्ना क्षेत्र का विकास हो सके।
पन्ना से 17 किलोमीटर दूर मझगंवा में हीरा खनन के लिए गजराज गौण के पिताजी ने अपनी 30 एकड़ जमीन व 60 मवेशियों का मोह छोड़, हिनौता गांव की पांच एकड़ जमीन मंजूर कर ली। उनका मानना था कि एनएमडीसी एक राष्ट्रीय कंपनी है, जो यहां के लोगों के जीवन में सुधार करेगी। गजराज कहते हैं कि अगर आज पिताजी जीवित होते, तो उन्हें एहसास होता कि उनका बलिदान व्यर्थ गया।
एनएमडीसी ने पन्ना टाइगर रिजर्व की जैव विविधता नष्ट की है। सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में आदेश दिया कि एनएमडीसी यहां अगले पांच वर्षों तक कार्य कर सकती है और उसके बाद का फैसला एक ‘निगरानी समिति’ करेगी। इस समिति ने 2016 में पन्ना में खनन कार्य बंद करने को कहा और यह क्षेत्र 30 जून, 2018 तक ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ को सौंपने का आदेश दिया। पर्यावरण मंजूरी न मिलने के बाद भी दिसंबर, 2020 तक खदान का संचालन जारी रहा।
इस दौरान हीरा खनन से 13 लाख कैरेट हीरे का उत्पादन हो चुका है। जानकारी के मुताबिक, नौ लाख कैरेट हीरे का खनन बाकी है। अभी यहां हीरा खनन बंद है, क्योंकि खनन का शेष कार्य ‘राष्ट्रीय उद्यान’ में होना है, और मामला हाई कोर्ट में है। राजनीतिक सोच किसी भी कीमत पर खदान चालू करने के मूड में है, उन्हें पर्यावरणीय असंतुलन से कोई मतलब नहीं है। राज्य सरकार ने अगले 20 साल यानी 2040 तक खदान को संचालित करने की इजाजत दे दी है।
हीरा खनन से प्रभावित पन्ना जिले एवं वहां के गांवों की स्थिति का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि हम समझ सकें कि बक्सवाहा के जंगलों को काटकर अगर वहां के लोगों की रोजी-रोटी का जरिया छीना गया, तो क्या हीरा खनन करने वाली कंपनी वहां की तस्वीर बदलेगी? अगर आप इसकी तुलना पन्ना की हीरा खदान से करेंगे, तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। (सप्रेस)