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जानना जरूरी है: श्रीकृष्ण की योगमाया से नारद हुए भ्रमित, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी
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विस्तार
देवर्षि नारद ने जब सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर को मारकर उसके महल में कैद सोलह हजार राजकुमारियों से विवाह कर लिया है, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर नारद के मन में भगवान की दिनचर्या देखने की इच्छा पैदा हुई। देवर्षि नारद द्वारका आ पहुंचे। द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण का भव्य अंत:पुर था, जिसमें भगवान की रानियों के लिए सोलह हजार से अधिक महल थे। उस अंत:पुर का निर्माण करने में विश्वकर्मा ने अपना समस्त कला-कौशल लगा दिया था।
नारद ने एक भवन में प्रवेश किया, तो देखा कि श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ बैठे थे। नारद को देखते ही श्रीकृष्ण उठ खड़े हुए। उन्होंने नारद को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर अपने आसन पर बैठाया और बोले, ‘प्रभु! आप तो स्वयं समग्र ज्ञान, वैराग्य, धर्म, यश, श्री और ऐश्वर्य से पूर्ण हैं। आपकी हम क्या सेवा करें?’ नारद बोले, ‘भगवन! यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपके दर्शन हुए है। आप इतनी कृपा कीजिए कि मेरे मन में आपकी स्मृति सर्वदा बनी रहे और मैं सदा आपके ध्यान में तन्मय रहूं।’ इसके बाद नारद, भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का रहस्य जानने के लिए उनकी दूसरी पत्नी के महल में गए। वहां उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण अपनी पत्नी के साथ चौसर खेल रहे थे। वहां भी भगवान ने नारद का स्वागत किया, उन्हें आसन पर बैठाया और पूछा, ‘आप कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम हैं और हम हैं अपूर्ण। ऐसे में हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?’
नारद जी यह सब देख-सुनकर विस्मित हो रहे थे। वह चुपचाप उठकर दूसरे महल में चले गए। उस महल में नारद ने देखा कि श्रीकृष्ण बच्चों को दुलार रहे थे। वहां से फिर दूसरे महल में गए, तो देखते हैं कि भगवान स्नान की तैयारी कर रहे थे।
इस प्रकार नारद ने विभिन्न महलों में भगवान को भिन्न-भिन्न कार्य करते देखा। कहीं वह हवन कर रहे थे, तो कहीं देवता आदि की आराधना कर रहे थे। कहीं ब्राह्मणों को भोजन करा रहे थे, तो कहीं यज्ञ का अवशेष स्वयं भोजन कर रहे थे। और कहीं प्रजा में, तो अंत:पुर के महलों में वेष बदलकर सबका अभिप्राय जानने के लिए विचरण कर रहे थे। और क्यों न हो, भगवान योगेश्वर जो हैं! इस प्रकार मनुष्य की-सी लीला करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का वैभव देखकर देवर्षि नारद जी ने मुस्कराते हुए उनसे कहा, ‘योगेश्वर! आपकी योगमाया बड़े-बड़े मायावियों के लिए भी अगम्य है। परंतु हम आपकी योगमाया का रहस्य जानते हैं; क्योंकि आपके चरणकमलों की सेवा करने से वह स्वयं ही हमारे सामने प्रकट हो गई है। भगवन! चौदहों भुवन, आपके सुयश से परिपूर्ण हो रहे हैं। अब मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं आपकी त्रिभुवन-पावनी लीला का गान करता हुआ उन लोकों में विचरण करूं।’
श्रीकृष्ण ने कहा, ‘देवर्षि नारद जी! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वालों का अनुमोदनकर्ता भी हूं। इसलिए संसार को धर्म की शिक्षा देने के उद्देश्य से ही मैं इस प्रकार धर्म का आचरण करता हूं। प्रिय नारद! तुम मेरी यह योगमाया देखकर मोहित मत होना।’ भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का परम ऐश्वर्य देखकर नारद के विस्मय और कौतूहल की सीमा न रही। नारद अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान का स्मरण करते हुए वहां से चले गए। भगवान नारायण सारे जगत के कल्याण के लिए अपनी अचिंत्य महाशक्ति योगमाया को स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्यों की-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरी में सोलह हजार से भी अधिक पत्नियां अपनी प्रेमभरी चितवन तथा मंद-मंद मुस्कान से उनकी सेवा करती थीं और वह उनके साथ विहार करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएं की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता। वह विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं। जो उनकी लीलाओं का गान, श्रवण और गान-श्रवण करने वालों का अनुमोदन करता है, उसे मोक्ष के मार्ग स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है।