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जानना जरूरी है: पुनर्जन्म लेकर जुआरी बना दैत्यराज बलि; संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

Sun, 27 Jul 2025 06:54 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 27 Jul 2025 06:54 AM IST
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सार
पुनर्जन्म में जुआरी ने विरोचन के तेजस्वी पुत्र के रूप में जन्म लिया। आगे चलकर वही ‘बलि’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो दान और भक्ति के लिए तीनों लोकों में आज भी प्रसिद्ध है।
 
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Demon King Bali became gambler after being reborn know whole story from pages of culture
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्राचीन काल में एक गांव में एक आदमी रहता था, जो जुआरी भी था। वह सदा जुए में डूबा रहता, लोगों की बुराई करता और देवताओं का अपमान करता। एक दिन उसने जुए में ढेर सारा पैसा जीत लिया। धन जीतने के बाद उसने पान का बीड़ा बनाया, कुछ फूल और इत्र लिया और ये सब सामग्री एक वेश्या को देने के लिए उसके घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसके पैर लड़खड़ा गए और वह गिर पड़ा। वह थोड़ी देर के लिए बेहोश हो गया। जब होश आया, तो उसके मन में अचानक अजीब-सा विचार उत्पन्न हुआ। उसे मानो अपनी पूर्व में की गई सभी गलतियों का एहसास होने लगा।



वह सोचने लगा कि उसने गलत कामों में अपना जीवन नष्ट कर दिया। उसने नीचे पड़े फूल और इत्र, भगवान शिव को अर्पित कर दिए। अपने जीवन में उसने यही एकमात्र अच्छा काम किया था। कुछ समय बाद जुआरी की मृत्यु हो गई। यमराज के दूत उसे यमलोक ले गए। यमराज ने जुआरी को देखते ही डांटा और कहा, ‘अरे मूर्ख! तूने इतना पाप किया है कि तुझे नरक में भयानक सजा मिलेगी।’ जुआरी ने डरते हुए कहा, ‘महाराज! अगर मैंने कोई अच्छा काम किया हो, तो कृपा करके उसका भी कुछ फल दे दीजिए।’


चित्रगुप्त ने यमराज को बताया, ‘जुआरी ने मरने से पहले भगवान शिव को फूल और इत्र अर्पित किया था। इस महान पुण्य के कारण यह अधम, तीन घड़ी के लिए इंद्र पद का अधिकारी हो गया है।’ इतना सुनते ही जुआरी ने कहा, ‘ठीक है, पहले मुझे मेरे पुण्य का फल दे दीजिए।’

फिर क्या था! यमराज के निर्णय के अनुसार, जुआरी को तीन घड़ी के लिए इंद्र का पद मिल गया। देवताओं के गुरु बृहस्पति देवताओं के साथ आए और उस पापी जुआरी को ऐरावत हाथी पर चढ़ाकर इंद्रसभा में ले गए। वहां पहुंचकर बृहस्पति ने इंद्र से कहा, ‘देवराज! इसे कुछ देर के लिए अपना सिंहासन दे दो।’ इंद्र ने अनमने मन से अपना राजपद छोड़ दिया।

जुआरी, देवराज इंद्र बन गया। इंद्र-पद ग्रहण करते ही उसने देवलोक की मूल्यवान वस्तुएं ऋषियों को दान कर दीं। उसने ऐरावत हाथी महर्षि अगस्त्य को, उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा विश्वामित्र को, कामधेनु गाय वशिष्ठ को, चिंतामणि रत्न गालव मुनि को और कल्पवृक्ष कौंडिन्य मुनि को दे दिया। तीन घड़ी तक वह बस दान करता रहा। फिर जैसे ही तीन घड़ी समाप्त हुईं, वह चला गया और इंद्र को उनका सिंहासन वापस मिल गया।

इंद्र को जब पता चला कि जुआरी ने तीन घड़ी में समस्त मूल्यवान रत्न दान कर दिए हैं, तो उन्होंने गुरु बृहस्पति से पूछा, ‘गुरुदेव! अब क्या करें?’ बृहस्पति ने कहा, ‘यह सारी बात यमराज को बताओ।’ इंद्र ने यमलोक जाकर यमराज से शिकायत की। यमराज ने कहा, ‘इंद्र! आपने सौ यज्ञ करके यह पद पाया था, परंतु उस जुआरी ने अपनी खराब स्थिति में भी उससे बड़ा काम किया। अगर आपको अपनी चीजें वापस चाहिए, तो ऋषियों से विनती कीजिए।’ यह सुनकर इंद्र ने सभी ऋषियों से विनती की और उन्हें बहुत सारा धन देकर अपनी चीजें वापस प्राप्त कर लीं।

कुछ समय बाद, जुआरी ने फिर से जन्म लिया। इस बार वह दैत्यराज विरोचन का पुत्र बना। वह जब मां के गर्भ में था, तभी उसे अच्छे कर्मों की राह पर चलने की प्रेरणा मिली। विरोचन के बढ़ते वर्चस्व को देखकर इंद्र ने उसे मारने का निश्चय किया। इंद्र ब्राह्मण का वेश धारण कर विरोचन से भिक्षा मांगने पहुंचे। विरोचन ने कहा, ‘जो चाहो मांग लो, चाहो तो मैं अपना सिर भी दे दूं।’

इंद्र ने विरोचन से कहा, ‘मुझे तुम्हारा सिर ही चाहिए।’ विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को दे दिया। कालांतर में, दान का यह महान कर्म तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ। अंत में, उस जुआरी ने विरोचन के तेजस्वी पुत्र के रूप में जन्म लिया। आगे चलकर वही ‘बलि’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो दान और भक्ति के लिए तीनों लोकों में आज भी प्रसिद्ध है।

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