{"_id":"609999378ebc3e0a8a525833","slug":"defeat-in-elections-will-rahul-gandhi-be-able-to-salvage-congress","type":"story","status":"publish","title_hn":"हार के बाद बढ़ीं मुश्किलें: क्या कांग्रेस को उबार पाएंगे राहुल","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
हार के बाद बढ़ीं मुश्किलें: क्या कांग्रेस को उबार पाएंगे राहुल
Tue, 11 May 2021 02:11 AM IST
केएस तोमर
के एस तोमर
के एस तोमर
Published by: केएस तोमर
Updated Tue, 11 May 2021 02:11 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
राहुल गांधी
- फोटो : पीटीआई
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन बेहद अनिश्चय के दौर से गुजर रही देश की सबसे पुरानी पार्टी क्या अपना अतीत दोहराएगी, इस पर अभी सवालिया निशान लगा हुआ है। यदि नेतृत्व के सवाल को जल्द नहीं सुलझाया गया, तो वह एक और विभाजन की ओर बढ़ सकती है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद गांधी परिवार, विशेष रूप से राहुल और प्रियंका की पार्टी पर पकड़ ढीली हुई है। कांग्रेस पहले ही ढलान पर है। पश्चिम बंगाल में वह अस्तित्वहीन हो चुकी है। केरल और असम में वह सत्ता हासिल करने में नाकाम रही है। इसने निश्चय ही सोनिया गांधी और राहुल गांधी की पीड़ा बढ़ाई होगी और अब उन्हें पार्टी को बचाने के लिए तेजी से काम करना होगा।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कांग्रेस के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पता चलेगा कि 1960 के दशक में अपने विरोधियों द्वारा 'गूंगी गुड़िया' कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने किस तरह से ताकतवर सिंडिकेट से लड़ाई लड़ी और 1969 के विभाजन के बाद अपनी खुद की पार्टी बनाई और दशकों तक राजनीतिक परिदृश्य का केंद्र बनी रहीं। इंदिरा गांधी ने 1978 में एक और विभाजन के बाद कांग्रेस (आई) बनाई, जो आपातकाल के काले दौर के बावजूद राष्ट्रीय परिदृश्य में बनी रही। कांग्रेस का ऐसा ही एक दौर तब आया था, जब सोनिया गांधी ने अनमने ढंग से पार्टी की कमान संभाली और फिर उसे दोबारा से खड़ा कर दिया। यही नहीं, उन्हें एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया, जिससे दस साल तक सत्ता में बनी रही।
इस पृष्ठभूमि को देखें, तो परिवार के वारिस राहुल गांधी के सामने पार्टी को पुनर्जीवित करने की कहीं अधिक बड़ी चुनौती है। जी 23 जैसे समूह से जुड़े उसके अधिकांश नेताओं का जमीनी आधार नहीं है और उनमें से एक या दो ही ऐसे नेता हैं, जो विभाजन को टाल सकते हैं। यदि विभाजन हो ही जाता है, तो इससे भाजपा ही खुश होगी और इसका लाभ उठाना चाहेगी। वैसे संकेत हैं कि अपनी मां की अस्वस्थता के कारण परोक्ष रूप से पार्टी के अध्यक्ष की तरह काम कर रहे राहुल जून में कमान संभाल सकते हैं। कोरोना की दूसरी लहर से पूरे देश में उपजे संकट से लेकर चीन की घुसपैठ जैसे मुद्दे को लेकर राहुल ही मोदी सरकार के खिलाफ मुखर हैं। राफेल सौदे को लेकर एक फ्रांसीसी वेबसाइट के खुलासे से राहुल के दावों को बल मिला है, जिसका असर पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा होगा। राहुल गांधी अकेले ऐसे नेता हैं, जिसने कोविड-19 के कारण जनस्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर मोदी सरकार को चेतावनी दी है।
लेकिन असम और केरल में मिली हार से गुटों में बंटी पार्टी में उनकी संभावनओं को धक्का लगा है। उन्होंने टिप्पणी की है कि नेतृत्व के सवाल को पार्टी के कार्यकर्ता सुलझाएंगे और पार्टी उन्हें जो जिम्मेदारी देगी, वह उसे स्वीकार करेंगे। यही अपने आपमें बताता है कि वह संगठन की कमान अपने हाथों में लेने के इच्छुक हैं। मौजूदा परिदृश्य में चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जिन्होंने ममता बनर्जी को तीसरी बार पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने में मदद की है, विपक्ष की भूमिका को लेकर कहीं अधिक स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा है कि मोदी जैसे मजबूत और लोकप्रिय नेता, जिनके पीछे आरएसएस के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की फौज हो, उन्हें अखिल भारतीय अपील वाली किसी पार्टी के नेतृत्व में एकजुट विपक्ष ही चुनौती दे सकता है। साफतौर पर उनका इशारा कांग्रेस की ओर है।
विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस को कुछ मानक प्रक्रिया अपनानी होगी, ताकि वह अगले वर्ष उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में चुनौती पेश कर सके। गेंद अब राहुल गांधी के कोर्ट में है, जो कि अध्यक्ष की सारी शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वास्तव में राहुल ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद छोड़कर बड़ी गलती की थी। तब उन्हें ऐसे कमांडर की तरह देखा गया, जिसने हार के बाद अपने सैनिकों को बेबस छोड़ दिया। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस में राहुल गांधी ही ऐसे नेता हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे सकते हैं।