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इस्लामी देशों से गहराते रिश्ते

Tue, 05 Mar 2019 06:29 PM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Tue, 05 Mar 2019 06:29 PM IST
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Deepening relationships with Islamic countries
ओआईसी

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सुंदरता यही है कि राजनेता और राजनयिक मिलते हैं, प्रस्ताव पारित करते हैं, लेकिन उसका महत्व कम होता है, क्योंकि सब कुछ जमीन पर बदलता है। और भारतीय राजनीति की खूबसूरती यह है कि जो लोग सरकार में होते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि विपक्ष में रहते हुए उन्होंने क्या कहा और क्या किया-ऐसा वह तब तक करते हैं, जब तक फिर विपक्ष में नहीं लौट जाते। वे हर उस चीज की आलोचना करते हैं, जिसका उन्होंने पहले समर्थन किया था। यह पूरी तरह से धारणाओं पर निर्भर करता है और इस बात पर कि कोई पक्ष उस वक्त की राजनीति के किस ओर है। ऑर्गेनाइशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों की 46वीं बैठक में भारत की राजनयिक मौजूदगी ने घरेलू राजनीति में एक बहस को जन्म दिया है, जिसे भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संबोधित किया और इसी सम्मेलन में बाद में (एक मार्च को) भारत की आलोचना करने वाले दो प्रस्ताव पारित किए गए। सरकार ने जहां इसे अपनी कूटनीतिक जीत बताया, वहीं कांग्रेस ने इसे गलत कदम बताया। दोनों आगामी चुनाव में अपनी सुविधा से उतना सत्य बोल रहे हैं, जिससे उन्हें चुनाव में राजनीतिक लाभ हो।


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स्वराज ने वहां विद्वतापूर्ण भाषण दिया, जो पवित्र कुरान और ऋग्वेद के उद्धरणों के साथ पूरा हुआ, और जिसमें उन्होंने आतंकवाद का समर्थन करने वालों पर खूब चाबुक चलाया और नाम लिए बगैर पाकिस्तान पर निशाना साधा। सम्मेलन के गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में उनका मुख्य संबोधन निश्चित रूप से भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता है। पचास वर्षों के बाद ओआईसी ने भारत को इसमें आमंत्रित किया, जबकि उसने 1969 में रबात, मोरक्को में हुई पहली बैठक में ही भारत के प्रवेश पर रोक लगा दिया था। पूरे विपक्ष ने, जिसमें भाजपा का पुराना अवतार जनसंघ भी शामिल था, उस समय इंदिरा सरकार की आलोचना की थी। ओआईसी के संस्थापक सदस्य पाकिस्तान ने भारत के मुस्लिम राष्ट्र नहीं होने का तर्क देकर रबात सम्मेलन में उसकी भागीदारी न होने देने को सुनिश्चित किया। भारत ने यह तर्क दिया कि उसके पास एक बड़ी मुस्लिम आबादी है, भले ही अल्पसंख्यक के रूप में, पर उनकी संख्या ओआईसी के सदस्य देशों की आबादी से ज्यादा है, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। पाकिस्तान तब सफल हुआ था।

आबुधाबी सम्मेलन के लिए भारत को आमंत्रण ओआईसी के मौजूदा अध्यक्ष संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) द्वारा दिया गया था। यह न केवल संयुक्त अरब अमीरात, बल्कि सऊदी अरब और पश्चिम एशिया के कई अन्य देशों (जिनका ओआईसी में वर्चस्व है) के साथ भारत के बढ़ते संबंध का सुबूत है। एक बड़े तेल आयातक के रूप में भारत का इन देशों से करीबी आर्थिक संबंध है, भारत के 70 लाख श्रमिक उन क्षेत्रों में काम करते हैं। साथ ही भारत वहां के निवेशकों को तत्परता से निवेश के लिए आमंत्रित करता है।

मनमोहन सिंह सरकार के आमंत्रण पर जहां सऊदी बादशाह ने 2006 में भारत का दौरा किया था, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की यात्राओं और पश्चिमी एशिया के नेताओं से मिलने के बाद दोनों देशों के संबंधों में और प्रगाढ़ता देखी गई। यूएई के युवराज प्रिंस पिछले वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। इसलिए पश्चिमी एशियाई देशों में से कई आज भारत को बेहतर नजर से देखते हैं। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाकिस्तान ने जब भारत को निमंत्रण देने पर आपत्ति जताई, तो यूएई ने कहा कि वह अपना फैसला नहीं बदलेगा। नतीजतन नाराज पाकिस्तान इस बैठक से बाहर रहा।

हालांकि राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों तरह से किसी का भी यह सोचना भोलापन होगा कि पाकिस्तान इस झटके को आसानी से सहन कर लेगा। वह अब भी ओआईसी का एक ताकतवर और प्रभावी नेता है और उसी के प्रभाव के कारण जम्मू-कश्मीर में भारतीय प्रशासन की भूमिका की आलोचना करने वाले दो प्रस्ताव पारित किए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि 'जुलाई, 2016 से भारत की बर्बरता तेज हुई' है और 'अवैध रूप से लोगों को हिरासत में लेकर गायब कर दिया' गया। उसमें भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद समाधान के लिए जनमत संग्रह का भी समर्थन किया गया है और जोर देकर कहा गया है कि दोनों देशों के बीच विवाद का 'मुख्य' मुद्दा कश्मीर है।

काउंसिल ने पाकिस्तान द्वारा उठाए गए प्रस्ताव को भी स्वीकार किया और पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों पर भारत द्वारा किए गए हवाई हमले पर चिंता जताई। ओआईसी ने भारतीय वायुसेना के पायलट अभिनंदन वर्धमान को वापस भेजे जाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की प्रशंसा भी की, जिन्हें पाकिस्तान में बंदी बना लिया गया था।

सिर्फ ओआईसी में ही नहीं, पाकिस्तान की भारत विरोधी भूमिका उसकी स्थायी विशेषता है। वह न बदला है और न ही बदल सकता है और उसमें बदलाव की संभावना भी नहीं है। साथ ही यह मानना भी भोलापन होगा कि ओआईसी भारत के प्रति अपना रवैया बदल लेगा या उसके रवैये में तब्दीली आई है, क्योंकि उसकी प्रकृति और अधिदेश ही भारत विरोधी है। यह संगठन मुस्लिम देशों के हितों की रक्षा के लिए है, जिनमें से ज्यादातर में शाही शासन है और उनके यहां लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है। उसका काम ही गैर-मुस्लिम राष्ट्रों में मुसलमानों पर नजर रखना है कि कहीं उनके साथ अन्याय या दमन तो नहीं हो रहा है। उसका नजरिया संकीर्ण है। इसलिए भारत जैसा कोई गैर-मुस्लिम राष्ट्र अपने द्विपक्षीय संबंधों के आधार पर कूटनीतिक अतिरेक करता है, तो यह सुनने में अच्छा लगता है। भारत ने वहां अपनी बात रखी, पर आशंका है कि ओआईसी अपने नजरिये पर लौटेगा अन्यथा उसकी आलोचना गलत होगी। पर भारत अपने चैनल को खुला रख सकता है।

भारत ने यह सुनिश्चित किया कि दोनों देशों के विवाद में तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं हो सकता और उसने मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया, जिसका उल्लेख प्रस्ताव में किया गया था। हालांकि अंतिम घोषणा पत्र में जम्मू-कश्मीर का जिक्र नहीं किया गया है, जिसे भारत की कूटनीतिक सफलता कहा गया है, क्योंकि पिछले वर्ष कश्मीर का जिक्र किया गया था। इससे पहले ताशकंद घोषणापत्र में कश्मीर का जिक्र नहीं था।

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