एक अद्भुत मशीन की मौत: आज धरती पर लगभग पैंतालीस अरब कैमरे हैं... आज अपनी पुरानी आभा खो चुका है यह उपकरण
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विस्तार
यह कहानी है कैमरे की या यों कहें कि यह कहानी है इसकी कि हमने कैमरे का उपयोग कैसे किया और इसकी छवियों ने किस तरह से दुनिया के बारे में हमारी सोच को आकार दिया। जरा गीजा के पिरामिड की तस्वीर वाला पोस्टकार्ड याद करें। ये पिरामिड कितने अकेले और रहस्यमयी दिखते हैं? अब जरा कैमरे को थोड़ा-सा घुमाएं। पता चलता है कि ये पिरामिड तो कैरो के विशाल शहर के बिल्कुल बगल में हैं। कैमरा फिर घूमता है। 1994 की एक तस्वीर है। हैती में अमेरिकी सैनिक युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार हैं। कैमरा उन फोटोग्राफरों की फौज की तरफ मुड़ता है, जो इन सैनिकों की युद्ध की मुद्रा में तस्वीर लेने को बिल्कुल तैयार हैं। हम जिन्हें युद्ध के लिए तैयार सैनिक समझ रहे थे, वे सैनिक तो थे, लेकिन तस्वीर के लिए इस मुद्रा में खड़े थे। तस्वीरें झूठी हो सकती हैं।
वर्ष 1839 में कैमरे की शुरुआत एक चमत्कार के रूप में हुई थी, जब क्षणों को रजत-पटलों की मदद से छवियों में कैद करने की शुरुआत हुई थी। इसके कुछ वर्षों बाद गतियों को कैद करने की तकनीक की खोज हुई। अंग्रेजी लेखिका और इतिहासकार एलिजाबेथ ईस्टलेक ने कैमरे के बारे में लिखा था, ‘इसका उद्देश्य तथ्यों का प्रमाण देना है। प्रत्येक तस्वीर हमारी दुनिया के इतिहास का प्रामाणिक अध्याय बन जाती है।’
फ्रांसीसी आविष्कारक और सिनेमा के अग्रदूत लुमियर ब्रदर ऑगस्टे और लुई ने वर्ष 1895 में पहली बार सार्वजनिक तौर पर फिल्म स्क्रीनिंग आयोजित की। फिल्मों में वास्तविक लोगों, जगहों और घटनाओं को दिखाया गया, जो एक तरह से दुनिया का आईना ही था। लेकिन दर्शकों के बीच बैठे एक जादूगर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। ये फ्रांसीसी जादूगर जॉर्जेस मेलिएस थे, जो कैमरे के साथ और संभावनाएं देख रहे थे। उन्होंने छवियों के साथ कुछ प्रयोग किए, जो कामयाब रहे। पैसे बनाने के नए तरीकों को ईजाद करने की धुन में उन्होंने नए वीडियो बनाने की सोची।
अरे, यह तो ब्रिटेन के राजा एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक का वीडियो है, या शायद नहीं है। दरअसल, वास्तविक समारोह के फिल्मांकन के बजाय जादूगर ने कुछ फ्रांसीसी कलाकारों के साथ मिलकर यह वीडियो बनाया था। जब राजा ने इसे देखा, तो वह बहुत खुश होकर बोला, ‘यह कैमरा क्या कमाल की मशीन है। इसने समारोह के वे हिस्से भी दिखा दिए, जो असल में हुए ही नहीं थे।’ यही वह क्षण था, जिसके बाद से कैमरा कहानियां कहने का माध्यम बन गया। धीरे-धीरे ये छवियां पूरी दुनिया में चर्चित होने लगीं, कुछ सिनेमा, तो कुछ अखबारों के जरिये।
और फिर आया 1950 का दशक, जब एक अभूतपूर्व आविष्कार ने जनसंचार माध्यमों के लिए एक नए युग का सूत्रपात किया। टेलीविजन अब घरों तक पहुंचने लगे थे। 1961 में आयरलैंड के राष्ट्रपति ने टीवी लॉन्च करते हुए कहा, ‘मुझे स्वीकार करना होगा कि कभी-कभी, जब मैं टीवी और रेडियो और उनकी अपार शक्ति के बारे में सोचता हूं, तो मुझे थोड़ा डर लगता है। परमाणु ऊर्जा की तरह इस शक्ति का इस्तेमाल अथाह फायदे के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह अतुलनीय नुकसान भी कर सकता है।’ टेलीविजन के आगमन से कैमरे की छवियां सीधे लोगों के घरों में पहुंचने लगी थीं।
टेलीविजन एक बड़े व्यवसाय का रूप लेने लगा था, और इसके मॉडल के केंद्र में विज्ञापन थे। ऐसे में यह जरूरी था कि विज्ञापनों के बीच के समय को भरने के लिए कुछ कार्यक्रम बनाए जाएं। इसके लिए कंपनियों ने दर्शकों की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देना शुरू किया और इस डाटा का इस्तेमाल ऐसा कंटेंट बनाने के लिए किया, जो दर्शकों को बांधे रख सके। मीडिया टाइकून टेड टर्नर के मुताबिक, ‘टेलीविजन ने कैमरे को एक बड़ी ताकत बना दिया था।’ एक जून, 1980 को उन्होंने केबल न्यूज नेटवर्क (सीएनएन) के नाम से दुनिया का पहला चौबीसों घंटे का न्यूज नेटवर्क शुरू कर दिया।
2000 के दशक की शुरुआत के साथ तो चीजें और भी तेजी से बदलने लगीं। यह मोबाइल क्रांति का युग था। हर हाथ में मोबाइल था। हर कोई तस्वीरें खींच रहा था। वर्ष 2000 में महान बास्केटबाल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट का जब वायु दुर्घटना में परिवार समेत निधन हो गया था, तब उस समय लोग सड़कों पर उतर आए और तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन पर हत्या का आरोप लगाकर प्रदर्शन किए। चुनाव से लेकर दुनिया की हर अजीबो-गरीब घटना को कैमरे से कैद किया गया, जो एक तरह से इतिहास में दर्ज हो गई हैं। इसके बाद इंटरनेट के युग में तो ऐसा हो गया है कि हम हर दिन औसतन सात घंटे स्क्रीन पर कैमरे की छवियों को देखते हुए बिताते हैं। आज इस पृथ्वी पर करीब 45 अरब कैमरे हैं।
यूट्यूब पर हर मिनट में 500 घंटे के बराबर फुटेज प्रकाशित किए जा रहे हैं। कैमरे के नए-नए उपयोग हो रहे हैं। लोगों की भावनाओं को जगाने वाली छवियां और वीडियो बनाए जा रहे हैं। डरावने, हिंसक, हास्यप्रधान इत्यादि सभी तरह के वीडियो बनाए जा रहे हैं। उद्देश्य बस यही है कि लोगों पर असर हो। नेटफ्लिक्स के सह संस्थापक रीड हैस्टिंग कहते हैं, ‘आज मीडिया कंपनियां टेड टर्नर से काफी आगे बढ़ चुकी हैं। वे हर बात का वैज्ञानिक अध्ययन करती हैं। फिल्म कैसी लगी, तो इसमें एल्गोरिदम का भी उपयोग हो रहा है।’ अब परिदृश्य बदल रहा है। एआई के उपयोग के बाद यह अद्भुत मशीन अप्रासंगिक हो सकती है।
ऐसे-ऐसे एप आ गए हैं, जिनमें एआई कैरेक्टर के जरिये लोगों की भावनाओं तक पहुंचने की कोशिश हो रही है। एक भारतीय युवक, जो यूट्यूब पर एआई के जरिये वीडियो और तस्वीर बनाता है, कहता है कि भारतीय लोग भावुक ज्यादा होते हैं, इसलिए तस्वीरें ऐसी हों, जिससे उनकी भावनाएं जागृत हों और सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा व्यू मिलें। जैसे-कोई गरीब इन्सान, जो बिल्कुल हड्डी हो गया है। अब एआई से निर्मित वीडियो और तस्वीरों में आप किसी भी बड़े इन्सान के साथ चाय-नाश्ता से लेकर कई काम करते हुए दिख सकते हैं। एआई भावुक करने वाले वीडियो भी बना सकता है, तो विकृत करने वाले भी, जबकि कैमरा बस वही सहेजता है, जो उसके सामने होता है। यह एक ऐसी मशीन रही है, जो हमें हमारी दुनिया दिखा सकती है, लेकिन एआई के दौर में हम ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां न सच की जरूरत है, और न ही कैमरे की।