फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   cyclone michaung Chennai still struggling from devastation, decreased in water catchment area become challenge

मिचौंग संकट: अब भी जूझ रही है चेन्नई, जलग्रहण क्षेत्र में भारी कमी ने बढ़ाई मुसीबत

Fri, 15 Dec 2023 06:57 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Fri, 15 Dec 2023 06:57 AM IST
विज्ञापन
सार
चेन्नई महानगर के जलग्रहण क्षेत्र बीते चार दशक में लगभग 250 वर्ग किलोमीटर घट गए, जिसके चलते बारिश का पानी सागर में नहीं जा पाता है।
 
loader
cyclone michaung Chennai still struggling from devastation, decreased in water catchment area become challenge
cyclone michaung - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

समुद्री चक्रवात मिचौंग के चेन्नई से गुजरे हुए एक हफ्ता हो गया है, चार दिन से अच्छी धूप भी है, लेकिन शहर के बड़े हिस्से में घुटनों से कमर तक पानी भरा है। बहुमंजिला इमारतों की बेसमेंट पार्किंग हजारों कारों का कब्रगाह बन गई हैं। चेन्नई में बरसात कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन इतनी ज्यादा बारिश और तेज आंधी ने बिजली, सड़क सभी तो ध्वस्त कर दिया। वर्ष 2015 के बाद हर साल शहर डूबता है। चक्रवात के कारण इतनी अधिक बारिश अप्रत्याशित है।



लेकिन सच यह है कि एक तरफ जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव सबसे पहले तटीय शहरों पर पड़ने की चेतावनी अब स्पष्ट है, दूसरी तरफ महानगर के जलग्रहण क्षेत्र बीते चार दशक में लगभग 250 वर्ग किलोमीटर घट गए और वहां कंकरीट का जंगल फैला है, जो बारिश के पानी को सागर में जाने से रोकता है। जबकि चेन्नई की पारंपरिक बसावट ऐसी थी कि एक दिन में 15 मिमी तक पानी बरसने पर भी शहर की जल निधियों में ही वह समा जाता था और अतरिक्त पानी समुद्र में चला जाता था।


चेन्नई के पश्चिमी हिस्से का कोरात्तुर इलाका जलभराव से बेहाल है। यहां की आबादी करीब सात हजार होगी। वहां 900 एकड़ में फैली एक झील भी है, पर उसके चारों तरफ इतने निर्माण हुए कि पानी वहां तक पहुंचता ही नहीं। यदि यहां की अंबातुर झील को सदियों पहले की तरह कूवम नाद से जोड़ दिया जाता, तो न यहां पानी भरता और न ही कभी पानी की कमी होती। यहां के तालाब या तो सुखा दिए गए, या फिर उन्हें नदी से जोड़ने वाले रास्ते बंद कर दिए गए।

अनियोजित विकास, शरणार्थी समस्या और जल निधियों की उपेक्षा के चलते चेन्नई आज बड़े शहरी-झुग्गी में बदल गया है। यहां की सड़कों की कुल लंबाई 2,847 किलोमीटर है और इसका गंदा पानी ढोने के लिए नालियों की लंबाई महज 855 किलोमीटर। लेकिन इस शहर में बारिश को सहेजने और अतिरिक्त जल को समुद्र तक छोड़ने के लिए यहां नदियों, झीलों, तालाबों और नहरों की सुगठित व्यवस्था थी। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस महानगर में 650 से अधिक जल निधियों में कूड़ा भर कर चौरस मैदान बना दिए गए। यही वे पारंपरिक स्थल थे, जहां बारिश का पानी टिकता था।

हर साल जब अधिक बरसात होती है, तो सबसे ज्यादा दुर्गति दो पुरानी बस्तियों-वेलाचेरी और तारामणि की होती है। वेलाचेरी यानी वेलाय-ऐरी। तमिल में ऐरी का अर्थ है तालाब व चेन्नई की ऐरी व्यवस्था सामुदायिक जल प्रबंधन का अनूठा उदाहरण है। आज वेलाय ऐरी के स्थान पर गगनचुंबी इमारतें हैं। वर्षा-जल की सुनियोजित निकासी के लिए अंग्रेजों ने 400 किलोमीटर लंबी नहर बनवाई थी, जो आज कचरे से पटी है। कीचड़ के कारण इसकी गहराई एक चौथाई रह गई है। इसलिए जब तेज बारिश हुई, तो तुरंत इसका पानी उछल कर दोनों तरफ बसी बस्तियों में घुस गया।

चेन्नई की खूबसूरती व जीवन रेखा कहलाने वाली दो नदियों-अडयार और कूवम के साथ समाज ने जो बुरा सलूक किया, प्रकृति ने इस बारिश में उसी का मजा चखाया। आसपास की बस्तियों का कूड़ा भर जाने के कारण यह बदबूदार नाले में तब्दील हो गई है। यही नहीं, समुद्र के साथ इसका मिलन-स्थल बेहद संकरा हो गया है, नतीजतन यह एक बंद नाला बन गया है। अडयार में शहर के 700 से ज्यादा नालों का पानी बगैर किसी परिशोधन के तो मिलता ही है, पंपल औद्योगिक क्षेत्र का रासायनिक कचरा भी इसे जहरीला बना रहा है।

कूवम शब्द ‘कूपम’ से बना है- जिसका अर्थ होता हैं कुआं। कूवम नदी के तट पर चूलायमेदू, चेरपेट, एग्मोर, चिंतारीपेट जैसी पुरानी बस्तियां हैं और इसका पूरा तट मलिन बस्तियों से पटा है। इस तरह करीब 30 लाख लोगों का जल-मल सीधे ही इसमें मिलता है। गंदगी, अतिक्रमण ने इसे बेहद संकरा बना दिया है।

भीषण चक्रवात और साथ में बारिश चेन्नई के लिए जलवायु परिवर्तन के आगमन की बानगी है। यह संकट समय के साथ और क्रूर होगा और इससे बचने के लिए जरूरी है कि शहर के पारंपरिक तालाबों व सरोवरों को अतिक्रमण मुक्त कर उनके जल-आगम के प्राकृतिक मार्गों को मुक्त करवाया जाए। नदियों व नहर के तटों से अवैध बस्तियों को विस्थापित कर महानगर की सीवर व्यवस्था का आधुनिकीकरण भी करना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed