फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Crisis due to shortage of urea

यूरिया की किल्लत से गहराता संकट

Tue, 24 Dec 2019 02:53 AM IST
Ramesh Thakur रमेश ठाकुर
Updated Tue, 24 Dec 2019 02:53 AM IST
विज्ञापन
Crisis due to shortage of urea
गेहूं की फसल - फोटो : सोशल मीडिया

समूचे हिंदुस्तान में इस वक्त यूरिया खाद की किल्लत है। गेहूं की बुआई से लेकर अभी तक अन्नदाताओं को उनकी जरूरत के मुताबिक यूरिया नहीं मिल सकी है। इस किल्लत के पीछे यूरिया की धड़ल्ले से हो रही कालाबाजारी है, जो चिंतित कर रही है। कहने को बाजारों में स्टॉक की कमी का रोना रोया जा रहा है, लेकिन ब्लैक में जितनी चाहो, उतनी यूरिया चंद घंटों में मुहैया हो रही है। दरअसल, गेहूं की फसल के लिए यूरिया सबसे बड़ी जरूरत होती है। पिछले कुछ वर्षों से गेहूं के अलावा अन्य फसलें भी पूरी तरह से यूरिया पर निर्भर हो गई हैं। यूरिया ऐसी खाद है, जो किसी भी किस्म की फसल की उत्पादन क्षमता बढ़ाने की क्षमता रखती है। यूरिया की किल्लत सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि दूसरे प्रदेशों में भी एक जैसी है।


loader

यूरिया की किल्लत होने पर बिचैलिए खूब फायदा उठा रहे हैं। किसान उनसे दोगुनी कीमत पर यूरिया खरीदने को मजबूर हैं। हालांकि काफी समय से केंद्र सरकार का जोर इस बात पर है कि देश के किसान ऑर्गेनिक खेती करें, पर किसान ऐसी सलाहों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। जमीन में बंजरपन इतना बढ़ गया है कि खादों का इस्तेमाल करना ही होगा। हमें दूसरी पीढ़ी के लिए भविष्य में खेती को बचाने के लिए रासायनिक और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल संतुलित रूप से करना ही होगा। नहीं तो जमीन खेती करने के लायक नहीं बचेगी। पर अन्नदाता दूरगामी दुष्प्रणामों की परवाह किए बिना यूरिया को जमीन में झोकने से बाज नहीं आ रहे। निश्चित रूप से यूरिया के अत्यधिक उपयोग से खेतों की उपज क्षमता घट रही है।

किसान संगठन बीते कुछ दिनों से केंद्र सरकार से यूरिया पर सब्सिडी देने की मांग पर अड़े हुए हैं। किसान नेता वीएम सिंह पूरे देश में मुहिम छेड़े हुए हैं। उनका कहना है कि रसोई गैस के सिलेंडर की तरह किसान बाजार मूल्य पर यूरिया खरीदे और सब्सिडी की रकम उनके खातों में पहुंचाई जाए। ऐसा होने पर निश्चित रूप से यूरिया की कालाबाजारी रुकेगी। विगत कुछ वर्षों से यूरिया की कालाबजारी बढ़ी है। सरकार द्वारा छापे मारने से कई बार यूरिया की बोरियां जब्त की गई हैं। यूरिया होते हुए भी दुकानदार किसानों को यूरिया मुहैया नहीं कराते। स्थानीय प्रशासन को इस तरह की शिकायतें बड़े पैमाने मिलती हैं कि सहकारी मंडियों और समितियों में खाद उपलब्ध नहीं है, लेकिन निजी दुकानों पर ऊंचे दाम पर यूरिया मिल जाती है। यूरिया को लेकर एक खबर ऐसी भी आई, जिससे प्रशासन के होश उड़ गए हंै। नेपाल से सटे उत्तरी बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों में यूरिया की अंतरराष्ट्रीय तस्करी हो रही है। प्रशासन को ऐसी खबरें मिली हैं कि भारत से यूरिया नेपाल भेजा जाता है, क्योंकि वहां हिंदुस्तान से कई गुना ज्यादा दामों पर यूरिया बिकती है। अगर ऐसा है, तो इसे स्थानीय सरकार की विफलता ही कहा जाएगा।

सिर्फ उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार हर साल खाद कारखानों को करीब एक लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है, लेकिन कारखानों का बीस हजार करोड़ रुपये अब भी बकाया है, इसलिए बड़ी संख्या में कारखाने बंद हो गए। सरकार को कारखानों और किसान, दोनों का ध्यान रखना पड़ेगा, क्योंकि किसान दुखी हुआ, तो कोई सुखी नहीं रह सकता। कमोबेश, ऐसा ही हाल दूसरे राज्यों का भी है। यूरिया उत्पादन करने वाले प्रतिष्ठानों का कहना है कि सरकारों की ओर से तमाम तरह की बंदिशें डाली जा रही हैं, जिससे उन्हें काम करने में दिक्कतें हो रही हैं। इन समस्याओं के निवारण के लिए केंद्र व राज्यों की हुकूमतों को ईमानदारी से गौर फरमाना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed