जब सभ्यता के खिलाफ अपराध होता है: मोदी के भारत ने बड़े संदेश को समझने में गलती नहीं की, पाकिस्तान को भी संदेश
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विस्तार
मजबूत नेता तो हमेशा से रहे हैं। उनकी प्रकृति बेशक वैचारिक जरूरतों के आधार पर समय के साथ बदलती रही है। पहले, सोवियत काल में नेताओं को ‘मजबूत’ विशेषण की जरूरत नहीं होती थी। वह सिर्फ ताकतवर ही नहीं था, जो अपनी सर्वोच्चता के आगे ‘अधिकतम’ और ‘सर्वोपरि’ जैसे शब्द लगाता था, वह पूरी आबादी के मन और सांस्कृतिक तौर-तरीकों पर राज करता था। वह महान कर्णधार हुआ करता था। उसे हमारा उद्धारक या प्रथम उद्धारक जैसे संबोधन भाते थे। ‘शुद्धतम’ वैचारिक वंश से आने वाले पागल व्यक्ति ने खुद को फ्यूहरर कहा। उल्लेखनीय है कि फ्यूहरर एक जर्मन शब्द है, जिसका अर्थ नेता या मार्गदर्शक होता है। 1933 से लेकर 1945 तक नाजी जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के साथ यह शब्द दृढ़ता के साथ जुड़ा हुआ है। नेता इतिहास का उत्पाद नहीं था; वह इसका एकमात्र निर्णायक था।
इस लेख में हम जिस नए सशक्त नेता की बात कर रहे हैं, वह लोकतांत्रिक क्षेत्र में एक योग्य प्रवेशी (आगंतुक) है, और उसकी शक्ति लोकप्रिय इच्छा की व्यापकता और अधीरता के प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है। (पुतिन, शी और किम या लैटिन अमेरिका के सामान्य नेताओं को यहां शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि उनकी ताकत लोकतंत्र की उदारता से नहीं, बल्कि उसके इन्कार से आती है।) लेकिन हमारा निर्वाचित ताकतवर नेता, चाहे वह वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, हालांकि अधिकांशतः दक्षिणपंथी धड़े के समर्थन से, एक कमजोर नेतृत्व द्वारा कुशासन की विरासत के प्रति आक्रोशित राष्ट्र की प्रतिक्रिया से पैदा हुआ है। जब वह किसी राष्ट्र की आहों और दुखों का उत्तर देने का साहस करता है, तो वह जनादेश को एक अनुबंध (प्रतिज्ञापत्र) में बदल देता है। यह एक ऐसा साहस है, जो ईश्वरीय भावना के आरोप का जोखिम उठाता है, यह नेता को लोगों की चिंताओं और आकांक्षाओं तक सीधी पहुंच भी प्रदान करता है।
शक्तिशाली नेता पहले से ही उद्धारकर्ता और विध्वंसक की आभा प्राप्त कर चुका है, तथा एक विशाल व्यक्तित्व में परिवर्तित भी हो चुका है, जिससे अखाड़े के बाकी सभी लोग निरर्थक हो चुके हैं। जब पश्चिम के दो प्रमुख लोकतंत्रों में ब्रेग्जिट वोट और ट्रंप-भूकंप के साथ सांस्कृतिक बदलाव आया, तो निर्णायक नेता की समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि और भी स्पष्ट हो गई। राष्ट्र ने प्रतिशोध के साथ जवाबी हमला किया, और प्रतिष्ठान की सुखद धारणाएं ध्वस्त हो गईं।
वैचारिक गलियारे के दोनों ओर से परित्यक्त और अनाथ लोग अपने घर, अपने इतिहास और अपने भविष्य पर दावा करने के लिए उठ खड़े हुए। सामान्य राजनीति का स्थान राष्ट्रीय दायित्व की राजनीति ने ले लिया, तथा नियंत्रण वापस लेने का ब्रेग्जिट नारा ब्रिटेन से बाहर भी गूंजने लगा। फिर भी, आर्ची ब्राउन जैसे विद्वान यह तर्क दे सकते हैं कि मजबूत नेता आधुनिक युग का एक मिथक है, तथा बदलाव के वाहकों को आज अतिरिक्त अधिकार की नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण सहभागिता की आवश्यकता है। और फिर ऐसे लेखक भी हैं, जो उदारवादी लोकतंत्र की प्रवृत्ति से चिंतित हैं और लोकतांत्रिक भाषा के जरिये तानाशाहों के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं। उनमें से अधिकांश लोग यह स्वीकार करने में विफल रहते हैं कि सांसारिक शक्ति लोकतंत्र द्वारा वैध मजबूत नेतृत्व को बनाए रखती है। वह नेता अपनी शक्ति का श्रेय उन लोगों को देता है, जो उसमें अपनी अधूरी संभावनाएं देखते हैं। जैसे कि नरेंद्र मोदी, जो लोकतंत्र में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले सशक्त नेता हैं, तथा जिन्होंने राष्ट्र को यह विश्वास दिलाया है कि उनकी ताकत भारतीयों को सशक्त बना रही है।
स्वतंत्रता के बाद से किसी अन्य नेता ने इतनी प्रामाणिकता के साथ भारत की लोकप्रिय गाथा बयां नहीं की है, जिसमें प्रत्येक भारतीय को राष्ट्र-निर्माता के रूप में कल्पित किया गया हो। उनके नेतृत्व की ताकत लोकतंत्र की सर्वोच्च उदारता-विश्वास से आती है। जब भारत पर जिहाद के प्रायोजक मुल्क द्वारा हमला किया जा रहा था, तो उनकी बताई कहानी को एक एक्शन थ्रिलर के रूप में अद्यतन किया गया, जिसमें वे मुक्तिदाता और विध्वंसक की भूमिका में थे, जिन पर भारतीय और भी अधिक भरोसा कर सकते थे। हिंदू संयम की पुरानी कहावत के स्थान पर अक्षम्य राष्ट्रवाद का प्रचलन हुआ, जिसके हिंदू लहजे का ऑपरेशन सिंदूर पर अधिक प्रभाव पड़ा-न कि केवल विचारोत्तेजक नामकरण में।
पहलगाम में, कोई भी भारतीय इस बात से चूक नहीं सकता था-हत्यारों ने पहले पीड़ितों का धर्म पूछा था। भारत के जवाब ने भी अपनी सटीकता के साथ अपने प्रतिशोध की सांस्कृतिक पहचान को उजागर किया। और इस तरह ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ युद्ध में सबसे आगे ला खड़ा किया है। जब एक धर्म फिर से सक्रिय होकर किसी जीवनशैली पर युद्ध की घोषणा करता है, तो यह सभ्यताओं के बीच टकराव नहीं, बल्कि सभ्यता के खिलाफ अपराध होता है। मोदी के भारत ने इस बड़े संदेश को समझने में गलती नहीं की, जब उस पर हमला हुआ, तो उसने पाकिस्तान को भी इस संदेश से चूकने नहीं दिया। मोदी पाकिस्तान को भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सैन्य शक्ति की वास्तविकता से अवगत कराने के अलावा, अपने क्षेत्र या सांस्कृतिक पहचान पर किसी भी हमले को विफल करने के लिए और भी बहुत कुछ कर रहे थे। वह भारतीय राष्ट्रवाद की ताकत को जिहादी आतंक की शक्ति का दिखावा करने वाली ताकत से कहीं ऊपर रख रहे थे।
मोदी के अनुसार, मजबूत नेता को भारतीयता की साझा भावना से शक्ति मिलती है। युद्ध के बाद के विराम की पटकथा का भी लेखक वही है-एक मजबूत नेता, माफ न करने वाला और अडिग, जो अपनी ताकत को राष्ट्र के प्रति परम दायित्व के रूप में निभाता है। मोदी इस मामले में अकेले ऐसे नेता हैं।