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संकट के समय नेतृत्व

Tue, 07 Apr 2020 12:54 AM IST
surendar kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 07 Apr 2020 12:54 AM IST
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Covid19,coronavirus outbreak, pm modi leadership during coronavirus outbreak
पीएम नरेंद्र मोदी(फाइल फोटो) - फोटो : PTI

फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फॉलोअर अधिक हैं या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के, इस पर बहस हो सकती है। ट्रंप का दावा है कि उनके फॉलोअर अधिक हैं, और इस संदर्भ में वह फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग के एक बयान का हवाला भी दे चुके हैं। फिलहाल इस बहस को यहीं छोड़ देते हैं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि कोविड-19 से मुकाबला करने के मामले में मोदी अपने दोस्त ट्रंप से बहुत आगे हैं। मास्क, सैनिटाइजर और वेंटिलेटर की कमी के बावजूद मोदी देश की 1.3 अरब की आबादी को एकजुट करने के साथ उनका नेतृत्व कर रहे हैं।


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कोरोना से निपटने के लिए वह राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान चला रहे हैं और इसमें फिल्म कलाकारों और खेल सितारों समेत जनमत तैयार करने वाले सभी लोगों को शामिल कर रहे हैं। यह अलग बात है कि 21 दिन के लॉकडाउन की अचानक ही घोषणा कर देने से सामान्य जनजीवन बाधित हुआ है, जिससे रोज कमाने वाले लाखों गरीब लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर उमड़ पड़ी भारी भीड़ और बरेली में प्रवासी मजदूरों को एक जगह इकट्ठा कर उन पर रासायनिक छिड़काव की तस्वीरें दुनिया भर में देखी गई हैं, जिनसे भारत की छवि को धक्का ही लगा है। उल्टे इससे इसका खुलासा ही हुआ है कि निकट भविष्य में 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जा रहे भारत में सामाजिक-आर्थिक खाई कितनी चौड़ी है और लाखों लोग अब भी गरीबी में जीवन बिता रहे हैं।

दिल्ली में सात लाख से अधिक लोगों के बीच रोज मुफ्त का भोजन वितरित करना भी हमारे समाज की स्तब्ध करने वाली वास्तविकता है। इसके अलावा तब्लीगी जमात के निजामुद्दीन मरकज तथा दूसरी जगहों में लोगों का जमावड़ा और उनमें विदेशी प्रतिनिधियों का शामिल होना लॉकडाउन के प्रति अवज्ञा और कोरोना के खिलाफ उठाए जा रहे कदमों के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में गड़बड़ी के बारे में बताता है। इस चुनौती भरे समय में भी नरेंद्र मोदी के नवाचार भरे और कल्पनाशील दिमाग से निकले सरल विचारों के एकाधिक सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं और इनमें कुछ खर्च भी नहीं होता।

यह किसने सोचा था कि स्वास्थ्यकर्मियों और दूसरी आवश्यक सेवाएं मुहैया कराने वालों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए अपनी-अपनी बालकनियों से ताली और थाली बजाने का आइडिया भारत में इतना हिट हो जाएगा? जाति, नस्ल, भाषा और क्षेत्र की बाड़ेबंदी को तोड़कर लोग अपने परिवार के साथ उत्साह में भरकर इसमें शामिल हुए। दिलचस्प यह है कि ब्रिटेन और अमेरिका मेंलोगों ने इसका अनुकरण करते हुए ताली बजाकर स्वास्थ्यकर्मियों का हौसला बढ़ाया। इस तरह मोदी ने लोगों को जोड़ने के लिए एक साधारण किंतु बेहद प्रभावशाली भंगिमा का निर्यात किया, जिस पर दुनिया की कोई भी सरकार आयात शुल्क नहीं लगा सकती! जनता की प्रतिक्रिया से अभिभूत मोदी ने आगे का एक और कदम उठाया।

उन्होंने पांच अप्रैल को रात नौ बजे नौ मिनट तक अपने घर की बत्तियां बुझाते हुए दरवाजे पर दीया, मोमबत्ती या स्मार्टफोन की फ्लशलाइट जलाने के लिए कहा। इसके पीछे की सोच थी कि राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता की यह रोशनी कोविड-19 के अंधेरे को दूर करने में सहायक होगी। मोदी के राजनीतिक विरोधियों ने इस कदम का विरोध करते हुए इसे जिस तरह सुर्खियां बटोरने की प्रधानमंत्री की आदत का एक और उदाहरण बताया, वह प्रत्याशित ही था। कुछ लोगों का कहना था कि जिस समय अनेक लोग एक वक्त के भोजन या सोने की अच्छी जगह तक से वंचित हैं, तब प्रधानमंत्री का दीया जलाने के लिए कहना निर्मम मजाक है।

लेकिन इन आलोचनाओं से प्रधानमंत्री पर क्या कोई फर्क पड़ा? बिल्कुल नहीं! वह लोगों का मिजाज समझते हैं। इस समय देश की बड़ी आबादी वही करेगी, जो उनका कमांडर कहेगा। किसी भी नेता का इस तरह आंख मूंदकर समर्थन करना दीर्घावधि में क्या सही है? इसका जवाब तो वक्त ही देगा। पांच अप्रैल को दीया जलाने के लिए कहना क्या 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का ही प्रोत्साहित करने वाला मोदी शैली का संदेश था? मोदी समर्थकों का मानना है कि ऐसे कदमों से उनकीलोकप्रियता और बढ़ेगी। महामारी के विशेषज्ञ इस बारे में चुप हैं कि पांच अप्रैल को नौ मिनट तक दीया जलाने का कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में कोई लाभ मिलेगा या नहीं, हालांकि ज्योतिषियों का कहना है कि इसका सकारात्मक असर पड़ेगा।

जब कोरोना से निपटने मेंएकाधिक विकसित देश पस्त नजर आ रहे हैं, तब सार्क और जी-20 के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आइडिया और स्वास्थ्यकर्मियों तथा आवश्यक सेवा प्रदाताओं के प्रति कृतज्ञता जताने की पहल के जरिये भारत में कोरोना के प्रसार को एक हद तक नियंत्रित रखकर मोदी संकट के इस दौर में सबसे प्रभावशाली वैश्विक नेता के तौर पर सामने आए हैं। भारत में ट्विटर पर मोदी के सर्वाधिक फॉलोअर हैं। वह ट्विटर पर अपनी नीतियों के बारे में नहीं बताते, न ही ट्रंप की तरह अपने विरोधियों को धमकाने के लिए इस मंच का इस्तेमाल करते हैं।

इसके बजाय मोदी लोगों से जुड़ने, उनकी राय को प्रभावित करने और अपने फैसले पर जनता का समर्थन लेने के लिए ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं। वह देश के ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो सर्वाधिक संवाद करते है, हालांकि उनके आलोचकों का कहना है कि यह संवाद ज्यादातर एकतरफा होता है। संवाद की तकनीकों का शानदार इस्तेमाल करते हुए मोदी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर जैसा प्रभाव डालते हैं, वैसा उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री नहीं डाल पाए। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शीर्षासन करते थे। लेकिन सितंबर, 2014 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में योग को शामिल करने की मोदी के अपील पर ही इसे वैश्विक मान्यता मिली, और अब 21 जून को 186 देश अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं। लॉकडाउन के दौरान इवांका ट्रंप को योगासन की क्लिप मोदी के जरिये ही मिली। शौचालयों के अभाव और खुले में शौच करने की आदत के बारे में इस देश की सभी सरकारों को पता था। लेकिन स्वच्छ भारत अभियान का सफल क्रियान्वयन मोदी ने ही किया।

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