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जीवन तो चलते रहने का नाम है

Tue, 07 Apr 2020 01:24 AM IST
Rajendra Gupta राजेंद्र गुप्ता
Updated Tue, 07 Apr 2020 01:24 AM IST
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Covid19,coronavirus lockdown, Life is the name of walking
Corona india - फोटो : PTI

कोरोना के दौर में हम खालीपन के एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जो बेहद निराश करने वाला है। जो क्रियाशील आदमी है, जब वह खाली रहता है तो संभव है कि उसको तरह-तरह की मानसिक समस्याएं शुरू हो जाएं। वजह, उसको आदत नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि आप घर से निकल सकें। ऐसे में या तो आप बैठे कुढ़ते रहें, हालात को लेकर चिढ़ते रहें, ऐसे कुछ कमेंट्स करते रहें, जो कि बेमानी हैं। ऐसे मौकों पर बहुत से लोग अपने सुझाव देने लगते हैं कि ऐसा नहीं, वैसा होना चाहिए, जैसे कि उन्हें सब कुछ मालूम हो। यह ऐसी बीमारी है कि सरकार को भी विशेषज्ञों से राय लेकर जरूरी कदम उठाने पड़ रहे हैं। जाहिर है कि इन कड़े कदमों के कुछ फायदे हैं, तो कुछ नुकसान भी हैं।


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ऐसे समय में जिस आदमी को जो काम पसंद है, या जो उसकी हॉबीस हैं, जिनको अक्सर वह रोजी-रोटी या दुनियादारी के चलते समय नहीं दे पाता, वे सारे काम अगर वह चाहे तो कर सकता है और करना चाहिए। अगर हम यह समय चिंतन-मनन को दें, स्वयं के साथ समय बिताएं तो निश्चित रूप से हमारी उन्नति होगी। आध्यात्मिक रूप से हमारा विकास होगा। अन्यथा तो हम लोग भेड़चाल में शुमार हैं। पता नहीं है कि कहां भागे जा रहे हैं, लेकिन भागे जा रहे हैं।

हमारी शिक्षा भी ऐसी ही चल रही है और समाज का भी यही हाल है। इसीलिए आज हम एक ऐसे आदर्शविहीन समाज में रह रहे हैं, जहां मूल्य ही नहीं बचे रह गए हैं। अगर आप इन सबसे हटकर यह सोचें कि आपको क्या अच्छा लगता है, क्या चीज सुख और ताकत देती है, जो आपको सकारात्मक बनाती है, उस काम को करने में लगें तो निश्चित रूप से आप इस समय का फायदा उठा सकते हैं।

मैं अकेलापन बहुत एंजॉय करता हूं। हालांकि मैं भीड़भाड़ वाले प्रोफेशन में हूं, लेकिन वहां भी मैं आधा घंटे बाद ही निकलकर अकेले हो जाता हूं। अकेले में आप प्रकृति के साथ घंटों बैठकर एंजॉय कर सकते हैं। इसके अलावा मैं खाली समय में पत्नी के साथ ताश खेलता हूं, या फिर कुछ कविताएं पढ़ता हूं। कुछ लोग समकालीन समाज, देश और मानव जीवन पर कमाल की कविताएं लिख रहे हैं। उनकी कविताएं पढ़ना मुझे बहुत सुख देता है। इन्हें पढ़कर मुझे लगता है कि इंसान कम से कम कविताओं में तो जिंदा है।

कुछ कवि ऐसे हैं जो इंसान की संवेदनाओं, उसकी मनुष्यता को जिंदा रखे हुए हैं। दरअसल, संवेदनशीलता ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। मुंबई में हिंदी के प्रोफेसर हूबनाथ पांडेय की कविताओं में मुझे यह सब कुछ मिलता है। उनकी कविताएं आपको जीवन देती हैं, प्रेरणा देती हैं। विपत्ति के दौर में ऊर्जा आपको अपने अंदर ही ढूंढनी होती है, क्योंकि हालात को आप एक हद तक ही कंट्रोल कर सकते हैं। ऐसे में जब आपको निराशा होती है, तो आपको उसी में से रास्ता बनाना होता है, क्योंकि जीवन तो चलते रहने का नाम है।

अगर आप मायूस होकर बैठ जाएंगे, तो जो थोड़ी-बहुत संभावनाएं बची हैं, उनसे भी महरूम हो जाएंगे। आप खुद को ही नहीं, बल्कि आसपास के लोगों को भी दुखी करेंगे। इसलिए यह सोचना चाहिए कि समय कभी एक-सा नहीं रहता, वक्त बदलता रहता है, जैसा कि निदा फाजली कह गए हैं, सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो... एक दिन खुशी का है, तो एक दिन निराशा का भी होगा। लेकिन ओवरऑल जब आप पीछे घूमकर देखते हैं और आपका नजरिया सकारात्मक है, तो आपको अच्छा अधिक दिखता है।

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