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नए विकल्प के लिए तैयार देश

Tue, 31 Dec 2013 06:31 PM IST
बैजयंत जय पांडा
बैजयंत जय पांडा Updated Tue, 31 Dec 2013 06:31 PM IST
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Country ready for new option

आम आदमी पार्टी (आप) के दिल्ली विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन ने सनसनी-सी फैला दी है। इसके चलते कई समीक्षक अपनी भविष्यवाणियों का फिर से मूल्यांकन कर रहे हैं। इसने राजनेताओं को भी अंततः बदलती स्थिति की ओर ध्यान देने पर मजबूर कर दिया है। यहां दो प्रश्न उठते हैं- क्या यह सिर्फ एक बार होने वाली घटनाओं में से है या फिर एक नई राजनीति की शुरुआत है? और देश के अन्य हिस्सों, विशेषकर ग्रामीण भारत में ऐसी राजनीति का भविष्य क्या है?

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इन प्रश्नों के उत्तर के लिए मैं समकालीन भारत और एक सदी पूर्व के अमेरिका के बीच की समानताओं का वर्णन करना चाहूंगा। 19वीं सदी के अंतिम चरण और बीसवीं सदी के आरंभ में उस देश में क्रांतिकारी बदलाव आए, जिनकी प्रासंगिकता आज हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
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मार्क ट्वेन और चार्ल्स डडली ने अपने लेख में 1870 से 1890 के बीच के अमेरिकी हालात के बारे में लिखा है। उस दौर में तेजी से विकसित होती अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने एक बहुत बड़े मध्यवर्ग का निर्माण किया। दूसरा, अनेक उद्योगपतियों ने व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर अपार संपत्ति जमा की, जिसके चलते भ्रष्टाचार की कहानियां जग-प्रसिद्ध हो गईं। और तीसरा, अमेरिकी राजनीति भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई। यह वह समय था, जब अमेरिकी राजनीति बंद दरवाजों के पीछे वरिष्ठ राजनेताओं द्वारा चलाई जाती थी।
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वर्ष 1890 से 1920 के बीच वहां धीरे-धीरे प्रगतिशील युग की शुरुआत हुई, जिस दौरान सुधारवादियों ने वहां जबर्दस्त सामाजिक और राजनीतिक सुधार को आगे बढ़ाया। कुछ उसी तरह का सुधार आज हम अपने देश में देख रहे हैं। वहां के खोजी पत्रकारों द्वारा एक के बाद घोटालों का पर्दाफाश किया गया और सुधारवादियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राजनीतिक दलों पर एकजुट होकर प्रहार किया। कुछ याद आया?

कुछ सप्ताह पहले तक भारत के अधिकतर राजनेता 'आप' द्वारा किसी भी प्रकार के सक्षम अवरोध की संभावना तक से इन्कार कर रहे थे। 'आप' को अन्य दलों की गलतियों और गलत गणना का तो लाभ मिला ही, लेकिन उसने कुछ ऐसा भी किया, जिसे समझने की आवश्यकता है। आज देश में मध्यवर्ग की तादात बहुत बड़ी है और उसमें राजनीतिक दलों के प्रति कूट-कूट कर आक्रोश भरा हुआ है। इस आक्रोश को मतदान में बदलने की आवश्यकता थी। और 'आप' ने वही किया।
'आप' द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग नया था, जिसका अभी तक मजाक उड़ाया जाता था। इसके प्रयोग से उम्मीदवार बिचौलियों को पीछे छोड़ मतदाताओं, कार्यकर्ताओं और दान दाताओं से सीधा संपर्क बनाने में सक्षम हुए।

इसके अलावा, 'आप' ने कुछ ऐसे कदम भी उठाए, जिसे कई प्रमुख दलों ने भुला दिया था, मसलन जनसाधारण को लामबंद करना। उसके कार्यकर्ता एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे का चक्कर लगाकर, न केवल मध्यवर्गीय लोगों तक पहुंचे, बल्कि अन्य वर्गों का भी समर्थन जुटाया। जबकि अधिकतर स्थापित दल आजकल अपने नेताओं के आकर्षण और बड़ी चुनावी रैलियों पर निर्भर रहते हैं।

'आप' का सबसे महत्वपूर्ण कदम था, प्रत्याशियों का चयन। अधिकतर राजनीतिक दल भाई-भतीजावाद और वरिष्ठ राजनेताओं की मनमानी का शिकार होकर अक्सर औसत दर्ज के प्रत्याशियों का चयन कर बैठते हैं। 'आप' ने साफ-सुथरी छवि वाले प्रत्याशियों को टिकट दिया। यह बात अमेरिकी प्रगतिशील युग की याद दिलाती है, जब राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों के चयन की अपारदर्शी प्रक्रिया को समाप्त किया गया था।

फिलहाल भारतीय समीक्षक इस बात का आकलन करने में व्यस्त हैं कि 'आप' का प्रभाव आगामी चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई देगा या नहीं। क्या उसकी प्रासंगिकता ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देगी? यहां यह याद रखना जरूरी है कि अमेरिका में सुधारों के प्रभाव को स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक फैलने में तीन दशक तक का समय लग गया था। हो सकता है, आधुनिक मीडिया और संचार के चलते, और शहरीकरण की सर्वव्यापकता के चलते भारत में इतना समय न लगे। लेकिन हमारा देश विविधताओं वाला है, इसलिए समय लग भी सकता है।

बस विडंबना यह है कि एक सदी पहले अमेरिका में किसी नए राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी। दोनों मुख्य दलों में से ही कुछ ऐसे सुधारक सामने आए, जिन्होंने बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल की। ऐसा नहीं है कि 'आप' के अलावा अन्य दलों में कोई सुधारक नहीं है। मसलन, मेरे अपने दल (बीजद) ने कई प्रगतिशील सुधारों के समर्थन में बोला है। संसद में बीजद ही वह पहला दल था, जिसने दागी नेताओं को अयोग्य करार देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया।


बहरहाल, असली सवाल यह है कि क्या देश के स्थापित राजनीतिक दल वास्तव में इस बदलाव को अपनाने के लिए तैयार होंगे। फिलहाल यह तो साफ है कि यदि वे अपनी यथास्थिति कायम रखेंगे, तो देश का लोकतंत्र बेशक नए विकल्प प्रस्तुत करेगा।

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