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गरीबों तक पहुंचे कॉरपोरेट मदद
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जयंतीलाल भंडारी
- फोटो : a
हाल ही में प्रकाशित भारत में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-19 में सीएसआर के तहत 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। यह खर्च 2017-18 में 10,128 करोड़ रुपये, वर्ष 2016-17 में 9064 करोड़ रुपये वर्ष 2015-16 में 8489 करोड़ रुपये और वर्ष 2014-15 में 6552 करोड़ रुपये था। ऐसे में इन दिनों देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह टिप्पणी करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि जब भारत में सीएसआर व्यय रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है, तब देश के सामाजिक कल्याण के मद्देनजर सीएसआर के रूप में कॉर्पोरेट मदद का दायरा सीधे गरीबों की मदद तक पहुंचना चाहिए।
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सीएसआर के संबंध में तीन तरह की चिंताएं दिखाई दे रही हैं। एक, भारत में गरीबी, भुखमरी व कुपोषण से पीड़ित करोड़ों लोगों तक सीएसआर की पहुंच नगण्य है। दो, बड़ी संख्या में कंपनियां सीएसआर के उद्देश्य के अनुरूप खर्च नहीं कर रही हैं। तीन, कंपनियां सीएसआर पर बड़ा खर्च महाराष्ट्र और गुजरात जैसे विकसित प्रदेशों में ही कर रही हैं। पिछड़े हुए कई राज्यों जैसे-बिहार, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय आदि राज्यों में यह खर्च बहुत कम है।
उल्लेखनीय है कि 500 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा नेटवर्थ या पांच करोड़ रुपये या इससे ज्यादा मुनाफे वाली कंपनियों को पिछले तीन साल के अपने औसत मुनाफे का दो प्रतिशत हिस्सा हर साल सीएसआर के तहत उन निर्धारित गतिविधियों में खर्च करना होता है, जो समाज के पिछड़े या वंचित लोगों के कल्याण के लिए जरूरी हों। विगत अगस्त 2019 में सरकार ने जिस कंपनी (संशोधन) विधेयक-2019 को पारित किया है, उसके तहत उन कंपनियों पर जुर्माना लगाने के प्रावधान भी शामिल हैं, जो कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए अनिवार्य दो फीसदी का खर्च नहीं करती हैं। कंपनी अधिनियम की धारा 135 के नए सीएसआर मानकों के मुताबिक, यदि कोई कंपनी अपने मुनाफे का निर्धारित हिस्सा निर्धारित सामाजिक गतिविधियों पर खर्च नहीं कर पाए, तो जो धनराशि खर्च नहीं हो सकी उसे कंपनी से संबद्ध बैंक में सोशल रिस्पांसिबिलिटी अकाउंट में जमा करना होगा। ऐसे में अभी तक जो कंपनियां सीएसआर को रस्म अदायगी मानकर उसके नाम पर कुछ भी कर देती थीं, उनके लिए अब मुश्किल हो सकती है। अब कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच पाएंगी कि उन्होंने सीएसआर पर पर्याप्त रकम खर्च की है। अब उन्हें बताना पड़ेगा कि खर्च किस काम में किया गया? उसका नतीजा क्या निकला और समाज पर उसका कोई सकारात्मक असर पड़ा या नहीं। निश्चित रूप से जैसे-जैसे देश में कारपोरेट जगत छलांगंे लगाकर आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे उसका सामाजिक उत्तरदायित्व भी बढ़ रहा है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस् चिल्ड्रेन 2019 में कहा गया है कि भारत में पांच साल से कम उम्र के 69 फीसदी बच्चों की मौतों का कारण कुपोषण है। यूनिसेफ ने कहा है कि महज 42 फीसदी बच्चों को ही समय पर खाना मिलता है। इसी तरह भारत में भूख की समस्या से संबंधित रिपोर्ट वैश्विक भूख सूचकांक में 117 देशों की सूची में 2019 में भारत की रैंकिंग सात स्थान फिसलकर 102वें स्थान पर रही है, जबकि वर्ष 2010 में भारत 95वें स्थान पर था। देश के कॉर्पोरेट क्षेत्र को गरीबी, कुपोषण एवं भूख की चिंताओं को कम करने जैसे दायित्वों के निर्वहन की ओर कदम बढ़ाने के साथ ही, देश के पिछड़े तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में सीएसआर व्यय बढ़ाकर अपनी जवाबदेही बढ़ानी चाहिए।