{"_id":"5eb9e4458ebc3e909c3be257","slug":"coronvirus-news-in-hindi-trying-to-isolate-china","type":"story","status":"publish","title_hn":"चीन को अलग-थलग करने की कोशिश","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
चीन को अलग-थलग करने की कोशिश
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
चीन-कोरोना वायरस
- फोटो : Social Media
चूंकि यह धारणा बनी है कि महामारी फैलने की सूचना देने में विलंब कर, जिससे दुनिया भर में भारी तबाही मची, चीन ने अमेरिका तथा उसके साथ-साथ ब्रिटेन, जर्मनी, स्पेन, इटली आदि देशों को नाराज किया है, ऐसे में, ये सभी देश सामूहिक प्रयासों के जरिये चीन को अलग-थलग कर सकते हैं। यह महाशक्ति बनने की चीन की महत्वाकांक्षा के लिए बड़ा झटका होगा।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
अमेरिका ने सार्वजनिक तौर पर चीन की निंदा करने का अभियान तेज कर दिया है। इसका ताजा उदाहरण आर्थिक विकास, ऊर्जा और पर्यावरण उप-मंत्री कीथ क्रैच का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ट्रंप प्रशासन चीन को कोविड-19 पर चुप रहने के कारण दंडित करने के लिए मौजूदा औद्योगिक आपूर्ति शृंखला को बदल देने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है।
उन्होंने साफ-साफ कहा कि अमेरिका चीन पर प्रतिबंध लगाने और नए शुल्क थोपने के बारे में सोच सकता है, जिससे कि विदेशी कंपनियां आउटसोर्सिंग और मैन्यूफैक्चरिंग के लिए चीन के नियंत्रण से बाहर निकलने पर मजबूर हो जाएं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अमेरिका और दूसरे देशों में यह धारणा बन रही है कि वे अधिनायकवादी, गैरजिम्मेदार और असुरक्षित चीन पर निर्भर नहीं रह सकते, जिसके कामकाज का पूरा तरीका गोपनीय और अस्पष्ट है।
वर्ष 2018 में अमेरिका और चीन के बीच के व्यापार युद्ध ने इस अलगाव की पृष्ठभूमि तैयार कर ही दी है। कम श्रम लागत वाले भारत और दूसरे एशियाई देश वैश्विक उद्योग जगत का अगला ठिकाना हो सकते हैं और भारत के साथ बेहतर रिश्तों को देखते हुए अमेरिका इस विकल्प पर विचार कर सकता है। जापान ने तो अपनी कंपनियों को चीन से बाहर निकालने के लिए 2.2 अरब डॉलर के फंड की व्यवस्था भी कर डाली है।
अंतरराष्ट्रीय जगत में चीन के खिलाफ माहौल बनाने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने हमला बोलते हुए कहा है कि हमारे पास इसके सुबूत हैं कि वुहान की एक प्रयोगशाला वायरस का स्रोत थी। चीन ने जब पोम्पियो को इसका सुबूत पेश करने के लिए कहा, तो पोम्पियो ने आक्रामक लहजे में कहा कि चीन का रवैया अगर पारदर्शी होता और वुहान में संक्रमण के फैलने की बात उसने छिपाई न होती, तो लाखों लोगों के जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया जा सकता था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने तो पहले से ही चीन के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है।
उन्होंने चीन पर सीधे-सीधे संक्रमण फैलने की खबर छिपाने का आरोप लगाया, जबकि जनवरी में वुहान में जब कुछ चीनी कोरोना से मारे गए थे, तभी से चीन को इस बारे में पता था। ट्रंप ने चीन पर दूसरा आरोप यह लगाया है कि वह उनके दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने की संभावना को ध्वस्त करने की योजना पर काम कर रहा है। ट्रंप कोरोना वायरस के चीन की प्रयोगशाला से निकलने के बारे में आश्वस्त हैं और कहते हैं कि उनके पास इसके सुबूत हैं। उन्होंने यह खुलासा भी किया कि वायरस का स्रोत वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ही है या नहीं, इस दिशा में जांच शुरू की गई है।
ट्रंप ने सवाल किया कि चीन ने विदेशी नागरिकों को संक्रमित शहर वुहान से निकलने की तो अनुमति दी, लेकिन किसी को बीजिंग या दूसरे शहरों में जाने क्यों नहीं दिया गया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, उस वक्त लगभग 70 लाख विदेशी नागरिकों को विभिन्न उड़ानों से अपने देश जाने की अनुमति दी गई। उनमें से अनेक लोग या तो संक्रमित थे या वे वायरस के वाहक थे। उन लोगों ने करीब 175 देशों में संक्रमण फैलाने का काम किया।
चीन पर तीखा हमला करते हुए ट्रंप ने कोरोना वायरस से संबंधित तथ्य छिपाने और बीजिंग का साथ देने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की भी आलोचना की है। उन्होंने सवाल पूछा कि अमेरिका द्वारा चीन से आने वाली उड़ानों पर रोक लगाने के फैसले की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आलोचना क्यों की। अमेरिका इस विश्व संस्था को सबसे अधिक 40 से 50 करोड़ डॉलर की सालाना आर्थिक मदद देता रहा है।
जबकि चीन 5.74 करोड़, ब्रिटेन 2.19 करोड़, जर्मनी 2.91 करोड़, फ्रांस 2.12 करोड़, जापान 4.1 करोड़ और इटली 1.58 करोड़ डॉलर की मदद करता है। जाहिर है, अमेरिका द्वारा मदद का हाथ खींच लेने से इस वैश्विक संस्था के अस्तित्व पर संकट पैदा होगा।
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की तीन स्वतंत्र एजेंसियों ने चीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हुए उससे अरबों डॉलर के हर्जाने की मांग की है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने वायरस के स्रोत की जांच कराने का समर्थन किया है। इसके जवाब में चीन ने कोरोना संकट के दौरान चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति रोककर अमेरिका को नतीजा भुगतने की चेतावनी दी है। चीन का यह भी कहना है कि उसने कोरोना से संबंधित जानकारी नहीं छिपाई और विश्व स्वास्थ्य संगठन को लगातार इस बारे में सूचित किया।
चूंकि कोविड-19 से मरने वालों में अमेरिकियों की संख्या सर्वाधिक है, ऐसे में, ट्रंप को चिंता है कि इससे उनके दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने में मुश्किल आ सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन चुनाव में ट्रंप को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, और इस आरोप के साथ ट्रंप पर करारा हमला बोल सकते हैं कि उन्होंने न केवल अमेरिकियों को मरने दिया, बल्कि अपनी गलती का ठीकरा चीन पर मढ़ने की कोशिश की।
आने वाले महीनों में ट्रंप के सामने अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती भी होगी। ट्रंप ने अभी तक 176 खरब डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की है और 2.1 करोड़ से अधिक लोगों ने वित्तीय मदद के लिए आवेदन किया है। इससे जीडीपी में 24 फीसदी गिरावट की आशंका है, और साल के अंत तक ही स्थिति के सुधरने की उम्मीद है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर ट्रंप अपने मतदाताओं को चीन के षड्यंत्र के बारे में बता पाने में सफल होते हैं, तो यह उनके लिए वरदान साबित हो सकता है। अन्यथा अगले राष्ट्रपति चुनाव में वह अपने जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे होंगे। (लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं।)