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थाईलैंड और वियतनाम से सबक लें, पत्रलेखा चटर्जी से जानिए आखिर उन्होंने क्या किया?
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पीटीआई
हमारे देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामले साठ लाख के पार चले गए हैं और इसके चलते 95 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। हालांकि हाल के दिनों में दैनिक मामलों की संख्या में मामूली कमी आई है, लेकिन ज्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले त्यौहारों का मौसम चुनौतीपूर्ण होगा।
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बेशक देश के सभी हिस्से समान रूप से प्रभावित नहीं है, लेकिन इस महामारी ने हमारी तमाम सामूहिक ऊर्जा को बुरी तरह प्रभावित किया है। हममें से ज्यादातर लोग किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जिनकी मौत कोरोना वायरस से हुई है या जो कोरोना से संक्रमित हुए हैं।
हममें से अधिकांश लोग निकट भविष्य में आर्थिक संकट से गुजरने वाले हैं, हालांकि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबंध हटाए जा रहे हैं। यह एक विकट परिदृश्य है और ऐसे में समर्थन और सलाह लेने के लिए अपने चारों तरफ देखना स्वाभाविक है।
हाल के हफ्तों में मैंने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि के कई विशेषज्ञों के इंटरव्यू राष्ट्रीय टेलीविजन पर देखे, जिनमें उनसे महामारी की प्रतिक्रिया के बारे में सलाह और विचार पूछे गए थे। लेकिन जहां तक प्रेरणा लेने की बात है, तो एशिया के पड़ोसी देशों पर नजर क्यों नहीं डाली जाती है?
मौजूदा स्थिति कितने समय तक रहेगी, इस बारे में कोई निश्चितता नहीं है, लेकिन जिस तरह दुनिया कोरोना वायरस महामारी से जूझ रही है, हम अपने पड़ोसी एशियाई देशों से कुछ सबक सीख सकते हैं, जो अमीर तो नहीं हैं, लेकिन हमारे देश की कई विशेषताएं उनमें हैं।
आइए, हम दो एशियाई देशों-थाईलैंड और वियतनाम की बात करते हैं, जिन्होंने कोरोना के खिलाफ अपनी तैयारियों को लेकर व्यापक प्रशंसा हासिल की है। दोनों उपयोगी सीख देते हैं। लगभग दस करोड़ की आबादी वाले वियतनाम में एक हजार से अधिक कोरोना संक्रमण के मामले सामने आए और 35 लोगों की मौत हुई।
6.9 करोड़ की आबादी वाले थाईलैंड में 35,000 के करीब संक्रमण के मामले सामने आए और 59 लोगों की मौत हुई। ये देश प्रेरित करते हैं, क्योंकि ये उतने समृद्ध नहीं हैं, जितना कि न्यूजीलैंड या जर्मनी या दक्षिण कोरिया हैं, जो महामारी से निपटने के लिए प्रशंसा हासिल कर चुके हैं।'
थाईलैंड और वियतनाम की आबादी काफी है, लेकिन ये दोनों उन देशों के क्लब का हिस्सा बनने में कामयाब रहे, जहां कोविड-19 से मौत के मामले दहाई अंकों में सीमित रहे। यह बताता है कि वहां की सरकारें गंभीर बीमारी और मृत्यु के जोखिम से जूझने वाले लोगों की रक्षा करने में बेहतर ढंग से सक्षम हैं।
आखिर उन्होंने क्या किया? हाल ही में एक प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में एक लेख प्रकाशित हुआ-एन एशियन पैनडैमिक सक्सेस स्टोरी, जिसमें बताया गया कि एक क्षेत्र के रूप में पूर्वी एशिया ने उन सबकों से सीखा, जो पहले वायरस के प्रकोप के दौरान प्रकट हुए थे। इस प्रभावशीलता के मूल में सार्स वायरस से सीखे गए सबक हैं।
सार्स की चपेट में आए एशियाई देशों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में भारी निवेश किया। उन्होंने ऐसी प्रणालियों और संस्थानों का निर्माण किया, जो अगली महामारी के खतरे का सामना करने के लिए सरकार की पूरी क्षमता को संवार सकते हैं।
कुछ देशों ने रोग की निगरानी, मामलों की रिपोर्टिंग और संपर्क का पता लगाने के लिए नए बुनियादी ढांचे का निर्माण किया। उन्होंने प्रयोगशालाओं के विकेंद्रीकृत नेटवर्क विकसित किए, और उन कर्मियों में निवेश किया, जो इन नई प्रणालियों के संचालन के लिए जरूरी होंगे।
वियतनाम का ही उदाहरण लें, जो एक महत्वपूर्ण देश है और जो केंद्रीय योजना से बाजार अर्थव्यवस्था में बदला है और हाल के दशकों तक दुनिया के निम्न-मध्य आयवर्ग वाले गरीब देशों में से एक था। इसने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च में वर्ष 2000 और 2016 के बीच हर साल औसतन नौ प्रतिशत की वृद्धि की है।
यह वह पहला देश था, जिसे 2003 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम या सार्स को नियंत्रित करने की मान्यता दी थी। उसके तुरंत बाद, इसने एच5एन1 बर्ड फ्लू से भी सफलतापूर्वक मुकाबला किया था। नई रणनीति के अलावा इन बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की गई कई रणनीतियों को कोविड-19 महामारी के दौरान भी उपयोग किया गया।
सार्स का सामना करने वाले देशों ने सीखा कि एक महामारी से लड़ने के लिए न केवल टॉप-डाउन सिस्टम (शीर्ष पर निर्णय लेने की व्यवस्था) की जरूरत है, बल्कि आबादी के व्यापक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। फॉरेन अफेयर्स के लेख में बताया गया है कि कुछ हद तक इस वजह से, और कुछ हद तक राजनीतिक उद्देश्यों के चलते सार्स प्रभावित देशों में से कई ने 2000 के दशक की शुरुआत से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को वित्तपोषित करने या मौजूदा कवरेज को बढ़ाने के लिए काम किया है। जैसे थाईलैंड ने सभी प्रवासियों के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज को बढ़ाया है।
उस लेख में एक और महत्वपूर्ण बात कही गई है कि सार्स के प्रकोप के बाद एशियाई नागरिकों ने स्वास्थ्य देखभाल को एक आवश्यक सार्वजनिक भलाई के लिए रूप में देखना शुरू किया। वियतनाम की तरह पड़ोसी थाईलैंड ने भी एक प्रारंभिक और प्रभावी प्रोटोकॉल स्थापित किया, जिसमें मास्क का उपयोग करना, स्कूलों को बंद करना और सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना शामिल था। आज 44 फीसदी अमेरिकियों की तुलना में 95 फीसदी थाई और 94 फीसदी वियतनामी मास्क पहनना पसंद करते हैं।
यह कोई जादू नहीं है या अपने आप नहीं हुआ है। यह संक्रामक रोगों से निपटने के अनुभव का खजाना है, सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण निवेश और प्रारंभिक कार्रवाई के लिए प्रतिबद्धता है। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज पर ध्यान केंद्रित करने से सरकारी सेवाओं के प्रति भरोसा पैदा करने में मदद मिली।
भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च जीडीपी के एक फीसदी से थोड़ा ज्यादा है, जो दुनिया में सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। हम अपने उन पड़ोसी एशियाई देशों से यह महत्वपूर्ण सबक सीख सकते हैं, जो मौत के आंकड़े को दहाई अंकों तक सीमित रखने में कामयाब रहे। महामारी ने सभी देशों को हैरान किया, लेकिन कुछ देश इससे निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार और सुसज्जित थे।