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कोरोना: भारत खुद को निकाल ले जाएगा

Wed, 08 Apr 2020 01:20 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Wed, 08 Apr 2020 01:20 AM IST
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Coronavirus : India will expel itself
कोरोना वायरस के खात्मे की तैयारी - फोटो : PTI

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना वायरस की वजह से दुनिया इतिहास की सबसे बड़ी मंदी की ओर आगे बढ़ती हुई नजर आ रही है। यह मंदी वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी से कई गुना खतरनाक है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने अपनी ट्रेड रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया आर्थिक महामंदी की ओर आगे बढ़ रही है, जिससे दुनिया के अधिकांश विकासशील देश बेहद मुश्किलों में आ जाएंगे, लेकिन कोरोना का चीन और भारत पर तुलनात्मक रूप से बहुत कम असर होगा। दुनिया के कुछ और आर्थिक संगठनों ने भी अपनी रिपोर्ट में कमोबेश यही बातें कही हैं।


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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना वायरस की वजह से दुनिया इतिहास की सबसे बड़ी मंदी की ओर आगे बढ़ती हुई नजर आ रही है। यह मंदी वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी से कई गुना खतरनाक है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने अपनी ट्रेड रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया आर्थिक महामंदी की ओर आगे बढ़ रही है, जिससे दुनिया के अधिकांश विकासशील देश बेहद मुश्किलों में आ जाएंगे, लेकिन कोरोना का चीन और भारत पर तुलनात्मक रूप से बहुत कम असर होगा। दुनिया के कुछ और आर्थिक संगठनों ने भी अपनी रिपोर्ट में कमोबेश यही बातें कही हैं।

दरअसल भारत में कोरोना से निपटने के लिए पिछले कुछ समय से उपयुक्त प्रयास किए जा रहे हैं। इस कारण अपने यहां कोरोना का आर्थिक असर अमेरिका और यूरोप की तुलना में कम है। इसके अलावा भारत की अर्थव्यवस्था कमोबेश आत्मनिर्भर है और वैश्विक व्यापार पर भारत की निर्भरता भी कम है। इसी कारण लॉकडाउन के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में पटरी पर लौटने की संभावना अधिक बताई जा रही है। कोरोना संकट और लॉकडाउन की चुनौतियों के बीच देश में पांच महत्वपूर्ण आर्थिक अनुकूलताएं उभरती दिखाई दे रही हैं, जो न केवल देश की गिरती अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकती हैं, बल्कि करोड़ों लोगों को जीवन-यापन में अधिक मुश्किलों से भी बचा सकती हैं।

इनमें पहली अनुकूलता है, भारत की अर्थव्यवस्था का बहुत कुछ आत्मनिर्भर होना और वैश्विक व्यापार पर भारत की निर्भरता का कम होना। ऐसे में लॉकडाउन के बाद भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में पटरी पर लौटने की संभावनाएं अधिक रखती है। दूसरी अनुकूलता देश के सर्विस सेक्टर में आईटी उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका से संबंधित है। इस समय भारत पूरी दुनिया में सॉफ्टवेयर की दृष्टि से पहले क्रम पर है।

देश में लॉकडाउन के बीच भी देश की सभी आईटी कंपनियां वर्क फ्रॉम होम के तहत सफलतापूर्वक काम करते हुए दिखाई दे रही हैं। तीसरी अनुकूलता देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार से संबंधित है। चौथी अनुकूलता वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी से संबंधित है। पांचवीं बड़ी अनुकूलता देश में सोने के आयात में भारी कमी से संबंधित है। इससे देश के विदेश व्यापार की अत्यधिक प्रतिकूलताओं से बचा जा सकेगा।

देश का वर्तमान खाद्यान्न भंडार

देश का वर्तमान खाद्यान्न भंडार करीब डेढ़ वर्ष तक लोगों की खाद्यान्न संबंधी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है। इस महीने तक देश के सरकारी भंडारों में करीब 10 करोड़ टन खाद्यान्न का भंडार होगा। देश में चल रही विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं और राशन कार्ड रखने वाले लोगों को साल में करीब छह करोड़ टन अनाज वितरित किया जाता है।

केंद्र सरकार का मानना है कि लॉकडाउन के मौजूदा दौर में राज्यों द्वारा करीब तीन करोड़ टन खाद्यान्न की मांग तुरंत की जा सकती है। इससे सभी राज्य छह महीने तक खाद्यान्न की जरूरतें सरलता से पूरी कर सकते हैं। इस साल खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है और कृषि विशेषज्ञों ने आगामी मानसून की अच्छी संभावनाएं भी जताई हैं।

पिछले कई साल से देश के आयात बिल में पहला क्रम कच्चे तेल का और दूसरा क्रम सोने का रहा है। चूंकि कोरोना संकट और वैश्विक सुस्ती के कारण कच्चे तेल की मांग में भारी कमी आती जा रही है, ऐसे में, विश्व बाजार में इसकी कीमत घट रही है। कच्चे तेल उत्पादक देशों के सबसे प्रमुख संगठन ओपेक और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईए) ने कहा है कि सबसे बड़े तेल आयातक देश चीन में कोरोना के प्रकोप से कच्चे तेल की कीमत तीस साल बाद सबसे कम रह गई है। गोल्डमैन सैक्स ने इस साल की दूसरी और तीसरी तिमाही के लिए कच्चे तेल की कीमत का अनुमान घटाकर 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है।

पेट्रो उत्पादों के दाम घटने से..

पेट्रो उत्पादों के दाम घटने से भारतीय ग्राहकों को फायदा मिलने की संभावना बन गई है। केंद्र सरकार इस मौके का फायदा अपना राजस्व बढ़ाने के रूप में कर रही है। उसने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि कर दी है, जिससे राजस्व संग्रह के मोर्चे पर चुनौती झेल रही सरकार को भारी लाभ होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में भारी कमी से ढांचागत विकास के लिए फंड जुटाने में मदद मिलेगी तथा राजकोषीय घाटे में कमी आएगी। 

सोने की कीमत बढ़ने से अपने यहां इस साल सोने की मांग करीब 30 प्रतिशत घटकर 500 से 550 टन रह जाने तथा सोने की बिक्री पिछले 25 साल में सबसे कम रहने की संभावना है। सोने के आयात में कमी से देश का व्यापार घाटा कम होकर अप्रैल से जनवरी तक की अवधि में 133.27 अरब डॉलर रहा, जबकि एक साल पहले की इसी अवधि में यह 163.27 अरब डॉलर था।

स्पष्ट है कि सोने के आयात में कमी देश की अर्थव्यवस्था के लिए राहत भरी है। यह उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार देशव्यापी लॉकडाउन और कोरोना संकट की आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों के बीच देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार के मद्देनजर देश के आम आदमी तक खाद्यान्न की उपयुक्त आपूर्ति लगातार सुनिश्चित करेगी।

यह भी उम्मीद करनी चाहिए..

यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी का लाभ जहां सरकार बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में करेगी, वहीं देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उपयुक्त कमी करके राहत देते हुए दिखाई देगी। इसी तरह सरकार सोने के आयात को नियंत्रित रखते हुए देश के आयात बिल को कम करने का प्रयास करेगी। इससे इस साल निश्चित रूप से सरकार का वित्तीय बोझ कम होगा।

यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार देश में सर्वाधिक रोजगार देने वाले छोटे उद्योग-कारोबार को मुश्किलों से बचाने के लिए उपयुक्त नए आर्थिक पैकेज का एलान शीघ्र ही करेगी। सरकार ने अब तक कोरोना से जंग के पहले चरण में बचाव के लिए जिस तरह जनता कर्फ्यू, देशव्यापी लॉकडाउन और राहत पैकेज जैसे सफल कदम उठाए हैं, अगले चरण में भी वह ऐसे रणनीतिक कदमों को आगे बढ़ा सकती है, जिनसे देश के उद्योग-कारोबार सहित संपूर्ण अर्थव्यवस्था को आसन्न मंदी के दौर से बचाया जा सकेगा। इससे देश के करोड़ों लोगों को कोरोना के खौफ से बहुत कुछ आर्थिक-सामाजिक राहत दिलाई जा सकेगी।
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