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कोविड-19 और कानूनी विवाद

Mon, 18 May 2020 05:10 AM IST
योगेश साहू मृणाल कंवर
मृणाल कंवर Published by: योगेश साहू Updated Mon, 18 May 2020 05:10 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : Covid-19 and Legal Disputes, Central government
supreme court - फोटो : ANI

कोरोना के कारण दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्था ठप हो गई है, जिससे व्यापारियों की नींद उड़ गई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि पहले किए गए व्यावसायिक करारों का पालन करने से कैसे बचें। इस संकट के दौरान एक शब्द जो हर व्यापारिक सलाहकार की जुबान पर है, वह है 'फोर्स मेज्योर।'


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यह एक शर्त (क्लॉज) है, जो कई व्यावसायिक करारों में छिपी पाई जाती है, और अनपेक्षित तथा आकस्मिक स्थितियों में करार से मुक्त होने के लिए इस शर्त का आह्वान किया जाता है। मौजूदा संकट को देखते हुए कई कंपनियां अब 'फोर्स मेज्योर' की शर्त के सहारे माल या सेवाओं की सप्लाई को अस्वीकार कर रही हैं। इस क्लॉज का सहारा पट्टों (लीज एग्रीमेंट्स) से बाहर निकलने के लिए भी हो रहा है। पर उन समझौतों का क्या, जहां 'फोर्स मेज्योर' की शर्त है ही नहीं?

'फोर्स मेज्योर' आम तौर पर आकस्मिक बाहरी घटना से संबंधित है, जिसमें किसी पार्टी के लिए किए गए करार के तहत दायित्वों को पूरा करना असंभव हो जाता है। इसकी शर्त आपूर्ति समझौतों और अन्य व्यावसायिक सौदों की एक सामान्य विशेषता है। भूकंप, तूफान, बाढ़, युद्ध, राजनीतिक अशांति, आतंकी हमले और श्रमिक हमले जैसी गतिविधियां भी 'फोर्स मेज्योर' घटनाओं के रूप में निर्दिष्ट हैं।

सवाल यह है कि क्या कोरोना पर 'फोर्स मेज्योर' की शर्त लागू होती है। इस महामारी के परिणामस्वरूप कई व्यापार अस्थायी रूप से बंद हो गए हैं। ऐसे में, कोरोना के प्रतिकूल प्रभाव की तुलना बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदा से की जा सकती है। वित्त मंत्री द्वारा हाल ही में की गई प्रेस कांफ्रेंस, जिसमें रियल एस्टेट परियोजनाओं के संदर्भ में कोरोना महामारी को 'फोर्स मेज्योर' घटना घोषित किया गया है, इस व्याख्या का समर्थन करती है।

इस महामारी और लॉकडाउन के पैमाने को देखते हुए इस शर्त का उपयोग (यदि वह करार में मौजूद है) किसी भी व्यावसायिक करार से बचने के लिए किया जा सकता है। बाधित सप्लाई एग्रीमेंट इसका स्पष्ट उदाहरण है। एक और व्यापक चिंता व्यावसायिक किरायेदारों द्वारा किराया भुगतान कर पाने की अक्षमता है, क्योंकि सरकारी आदेशों के तहत उनकी दुकानें और कार्यालय बंद हैं।

हालांकि एक पार्टी दूसरी पार्टी के 'फोर्स मेज्योर' के आह्वान को अदालत में चुनौती दे सकती है। अदालत का निर्णय व्यावसायिक करार की विशिष्ट भाषा पर निर्भर करेगा, जो कि करार करते समय पार्टियों की नीयत और करार के उद्देश्य पर प्रकाश डालती है। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 यह निर्धारित करता है कि किन परिस्थितियों में करार के अंतर्गत वादे कानूनी रूप से बाध्यकारी होंगे।

जिन व्यावसायिक समझौतों में 'फोर्स मेज्योर' की शर्त नहीं है, वहां भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 56 उपयोग में आती है। यह धारा 'फ्रस्टेशन ऑफ कॉन्ट्रैक्ट' से संबंधित है-यानी ऐसी स्थिति, जहां करार करने के बाद करार की शर्तों का पालन करना असंभव या गैरकानूनी हो जाता है।

लेकिन धारा 56 के तहत 'असंभव कार्य' का मतलब हड़ताल या आर्थिक/ व्यावसायिक कठिनाइयों के कारण कार्य करने की असंभवता नहीं है। यह वैसी स्थितियों में लागू होती है, जब एक अप्रत्याशित घटना करार की नींव को नष्ट कर देती है। कोई ऐसी घटना, जिससे करार का उद्देश्य काफी हद तक बेकार हो जाता है, और पार्टी के लिए करार की शर्तें पूरी कर पाना अव्यावहारिक हो जाता है।

यह स्पष्ट है कि इस महामारी के बाद ऐसे कई कानूनी मामले सामने आएंगे, जिनमें कंपनियों पर ये आरोप लगाए जाएंगे कि उन्होंने भुगतान या करार के तहत अपने दायित्वों से बचने के लिए 'फ्रस्टेशन ऑफ कॉन्ट्रैक्ट' की धारा का इस्तेमाल किया है। इस तरह के कानूनी मामलों में कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके व्यवसाय में बड़े पैमाने पर नुकसान वित्तीय कठिनाई और सामान्य मंदी के कारण नहीं, बल्कि इस महामारी के प्रकोप के कारण हुआ है।

इस महामारी के दौरान अगर आप किसी व्यावसायिक करार का पालन करने में असमर्थ रहे हैं, और ऐसा लग रहा है कि मामला अदालत तक पहुंचेगा, तो करार के तहत नुकसान को कम करने के लिए स्वयं द्वारा उठाए गए कदमों का प्रमाण संयोजित कर लें।

साथ ही, अपनी अक्षमता की वास्तविकता साबित करने के लिए यह दिखाने के लिए भी तैयार रहें कि कोविड-19 ने किस प्रकार पहले किए गए व्यावसायिक करार के तहत दायित्व-निभाने की आपकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। (लेखक सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट हैं।)

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