कोरोना काल में मिथकों से टूटता मोह
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अब तक हमारा भारतीय समाज मिथकों की जकड़ में था। लेकिन कोरोना ने समाज के बहुत से मिथकों को बदलकर रख दिया। कई कुरीतियां जो अब तक बेखौफ चल रही थीं, उस पर अंकुश लगाने का काम इस कोरोना काल में हुआ। इस बदलाव से न तो व्यक्ति आहत हुआ और न ही समाज का कोई तबका। हर किसी ने इसे सहजता से स्वीकार भी किया। सभी बदलाव तो चाहते थे, पर पहल कौन करे, इस प्रश्न को लेकर हर कोई दुविधा में था। कोरोना ने इस दुविधा को दूर कर दिया। लोग धीरे-धीरे समझने लगे कि इन कुरीतियों को हमें पहले ही त्याग देना था। पर एक सामाजिक प्राणी होने के नाते चाहकर भी उसे खत्म नहीं कर पाए। कोरोना ने इसे आसान कर दिया। जो काम समाज सुधारक लाख कोशिशों के बाद नहीं कर पाए, उसे इस कोरोना से बहुत ही आसानी से कर दिखाया
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बदले हुए हालात में इस दौरान कोई शादी हो, उसमें किसी अपने को न बुलाया गया, तो वह अपना बेहद खुश हो गया। चलो, अच्छा हुआ जान छूटी। यह एक अलग ही अनुभव था। इसके बाद लोगों का ध्यान किसी की मृत्यु के बाद होने वाले कार्यक्रमों की ओर गया। इसमें सबसे पहला प्रहार उठावना वाले कार्यक्रम पर पड़ा। अब किसी के घर जाया तो नहीं जा सकता। इसलिए आभासी संवेदनाएं व्यक्त करने का मौका तलाशा गया। पहले तो सरकार ने उठावना वाले कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बहुत ही कम लोगों को अनुमति दी। इससे लोगों ने टेलिफोनिक संवेदना व्यक्त करने के लिए ड्राइव-यू, वॉक-यू या जूम जैसे प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया। इसमें भले ही लोगों ने दिलचस्पी न दिखाई हो, पर यह वक्त का तकाजा था, इसलिए इस नई परंपरा को स्वीकार कर लिया। अब लोग टेलिफोनिक उठावना करने लगे हैं। इसमें बहुत ही कम शब्दों में मृतक परिवार के लोगों को दिलासा देने का काम किया जाता है। कम समय इसलिए दिया जाता है कि अन्य लोग भी उन्हें दिलासा देने के लिए लाइन पर लगे होते हैं। ऑनलाइन मीटिंग प्लेटफार्म जूम पर उठावना कार्यक्रम आयोजित किया जाने लगा है। इसमें सभी को आमंत्रित किया जाता है। लोग घर-बैठे जूम पर शामिल होते हैं। इसमें लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं। साथ ही अन्य लोग क्या कह रहे हैं, उसे भी सुन सकते हैं। आमने-सामने चर्चा भी कर सकते हैं। इस जूम में एक ही कमी है कि इसमें अधिक लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता। इसमें शामिल होने के लिए एडवांस में समय तय किए जाते हैं। उसके बाद पासवर्ड भेजा जाता है। जो थोड़ा पेचीदा है।
किसी की मृत्यु के बाद कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। पर कोरोना ने इस मामले में सभी को एक कतार में खड़ा कर दिया है। हर समाज में मृत्यु के बाद दो धार्मिक अनुष्ठान अनिवार्य रूप से सम्पन्न होते ही थे। पहला मृत्यु भोज और दूसरा गरुड़ पुराण या गीता पाठ का आयोजन। इसकी परंपरा इसलिए चल निकली कि शोक में डूबे मृतक के परिजनों को अकेलापन महसूस न हो। पर अब इस पर भी अंकुश लग गया। अब पूरे धार्मिक अनुष्ठान एक ही दिन में पूरे किए जाने लगे हैं। संसाधनों की व्यवस्था भी इतनी चुस्त हो गई है कि इंसान एक शहर से सुबह जाकर शोक व्यक्त कर शाम तक घर पहुंचने लगा है। यह स्पीड का जमाना है। नई पीढ़ी ने इसे पूरी तरह से अपना लिया है। कुछ समय पहले इसी युवा पीढ़ी को एक-एक चीज बताई जाती थी। नदी पर जाकर कई अनुष्ठान किए जाते थे। पर कोरोना ने इन सारी कुप्रथाओं को एक सिरे से खारिज कर दिया। समाज सुधारक इन ढकोसलों को दूर करने का काफी समय से प्रयास कर रहे थे। जो अब जाकर दूर हो पाई।
इसके पहले मृत्यु के बाद होने वाले कार्यक्रमों में दिखावा अधिक होता था। जिसमें मृतक के परिजन अपनी शान दिखाना नहीं भूलते थे। उठावना कार्यक्रम स्थल पर जो नजारा देखने को मिलता था, उसमें एक हॉल को सजाया जाता है। वहां धीमें स्वरों में कर्णप्रिय संगीत बजता रहता है। झक सफेद कपड़ों में लोग उसमें शामिल होते हैं। ऐसे लोगों को जाते समय कुछ उपहार भी दिए जाते थे। जिसमें गीता या फिर पौधे शामिल होते थे। उसके बाद मृतक परिजन बड़ी शान से बताते थे कि हमारे कार्यक्रम में इतने लोग शामिल हुए। इससे यह उठावना कार्यक्रम काफी खर्चीला बन जाता था। पर कोरोना के आगे ये मृत्यु बहुत ही मामूली चीज बन गई। अब तो यह हालत है कि इस तरह के कार्यक्रम में लोग शामिल ही नहीं होना चाहते। पर अब जूम ने इस डर को दूर कर दिया। अब लोग आभासी संवदेनाएं व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते।
एक तरह से जूम ने समाज में एक क्रांति ही ला दी है। एक-दूसरे से मिलना अब लोगों का कम हो गया है। सभी की कोशिश होती है कि आभासी दुनिया में ही रहें। वहीं से लोगों से बात करें, सांत्वना दें, हाल-चाल पूछें। मृत्यु भोज जैसे कार्यक्रमों को दूर से ही सलाम करने लगे हैं। अपना घर भला, तो हम भले, इस नारे के साथ सभी यह समझ गए है कि अब तक दकियानूसी तौर पर जी रहे थे, अब नहीं जीएंगे। यही तो है, एक नए समाज की शुरुआत। टूटते मिथकों के बीच ऊग रहा है आशाओं का सूरज...।