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सच्चाई से दूर भागती कांग्रेस

Wed, 12 Jun 2019 07:05 PM IST
नीरजा चौधरी नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार
नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: नीरजा चौधरी Updated Wed, 12 Jun 2019 07:05 PM IST
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Congress rushing away from reality
सच्चाई से दूर भागती कांग्रेस - फोटो : google
ऐसा लगता है कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली पराजय ने भाजपा को मिली जीत से कहीं अधिक प्रभाव डाला है। कांग्रेस निरंतर पतन की ओर है और राष्ट्रीय विपक्ष या फिर किसी ऐसी पार्टी का अभाव जिसके इर्द-गिर्द दूसरी गैर-एनडीए पार्टियां एकजुट हो सकें, ताकि मोदी की अगुआई में भाजपा के विजयी रथ पर नजर रखी जा सके, हमारे जैसे संसदीय लोकतंत्र के लिए संकट से कम नहीं।

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इसीलिए कांग्रेस की आज जो हालत हो गई है, वह सिर्फ इस पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि उन 12 करोड़ लोगों के लिए भी दुख का कारण है, जिन्होंने मोदी लहर के बावजूद इस पार्टी को वोट दिया और ऐसे तमाम लोगों के लिए भी, जो जीवंत लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कांग्रेस का पुनरुत्थान जरूरी मानते हैं। नतीजे आने के बाद कांग्रेस पांच साल बाद सिर्फ आठ सीटों का इजाफा कर 52 सीटें ही हासिल कर सकी। उसे 20 फीसदी से भी कम वोट मिले, जैसा कि कुछ वर्ष पहले तक भाजपा को हासिल होते थे। ऐसी हालत में देश की सबसे पुरानी पार्टी को गहरा धक्का लगा है।

पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन पार्टी अभी तक उस पर कोई फैसला नहीं ले सकी है। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया, लेकिन राहुल इस पर अड़े हुए हैं। तीन महीने बाद जब तीन राज्यों महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के चुनाव हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इन राज्यों के पार्टी नेताओं के साथ रणनीतिक बैठकें कर चुके हैं, वहीं कांग्रेस इसकी तैयारी में जुटने के बजाए असमंजस में है। नेतृत्व के सवाल को सुलझाने में हो रही देरी से पार्टी के भीतर असुरक्षा गहराती जा रही है, जिससे ऐसे लोग पार्टी छोड़कर जाने को प्रेरित हुए हैं, जिन्हें बाहर अधिक संभावनाएं नजर आ रही हैं। तेलंगाना में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक टीआरएस में शामिल हो चुके हैं; महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता आर विखे पाटिल पाला बदलकर भाजपा में जा चुके हैं। राजस्थान और हरियाणा में पार्टी के भीतर इस कदर झगड़ा चल रहा है कि जब हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से राज्य में पार्टी की हार के बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'मुझे गोली मार दो।'  

कांग्रेस में हताशा और अव्यवस्था को देखते हुए पार्टी को जितनी जल्दी हो सके नेतृत्व के सवाल को सुलझाना चाहिए और पार्टी प्रमुख का पद छोड़ने के राहुल गांधी के निर्णय का सम्मान करना चाहिए। यदि वह राहुल को पद पर बने रहने को विवश करती है, तो इसे सिर्फ नौटंकी की तरह देखा जाएगा। इस संकट से उबरने में नाकाम रहने पर कांग्रेस के प्रति देश में निराशा का भाव ही बढ़ेगा, जोकि आज अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। इससे राहुल गांधी की स्थिति भी दयनीय होगी। यदि वह इस्तीफे पर अड़े रहते हैं, तो उन्हें कुछ वर्ग का समर्थन मिल सकता है और वह आगे संघर्ष के लिए तैयार हो सकते हैं।  

2019 के चुनाव में खासतौर से युवा मतदाताओं के बीच 'वंशवाद' एक मुद्दा था और नरेंद्र मोदी के 'नामदार बनाम कामदार' के उपहास ने बहुतों को प्रभावित किया और ऐसे में जवाबदेही के सिद्धांत पर अड़े रहकर राहुल जनादेश का ही सम्मान करेंगे। पार्टी के नए अध्यक्ष के अधीन राहुल महासचिव के रूप में काम कर सकते हैं और यह उनके पक्ष में ही जाएगा जिससे वह यह प्रदर्शित कर सकेंगे कि वह कामदार के रूप में काम कर सकते हैं। उन्होंने सीडब्ल्यूसी से यह भी आग्रह किया है कि उनकी जगह उनकी बहन प्रियंका वाड्रा को भी अध्यक्ष न बनाया जाए जो अंततः गांधी परिवार से ही हैं। प्रियंका को पहले ही उत्तर प्रदेश के 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी दी जा चुकी है।

ऐसी आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के नेतृत्व के बिना कांग्रेस बिखर सकती है यहां तक कि उसमें विभाजन भी हो सकता है। नेहरू-गांधी परिवार ने पार्टी को न केवल एकजुट रखा था, बल्कि वह वोट भी जुटाता रहा। यह एक और वजह है, जिसके कारण कांग्रेसजन खुद में से किसी और के बजाए उनके नेतृत्व पर भरोसा करते रहे। पार्टी के भीतर ऐसे कई नेता हैं, जिनमें अध्यक्ष का पद संभालने की क्षमता है और संभव है कि पार्टी दक्षिण भारत से किसी नाम पर विचार करे, क्योंकि उत्तर और पूर्व के बजाए दक्षिण भारत ने कांग्रेस का कहीं अधिक साथ दिया है। यदि नया अध्यक्ष सहमति की प्रक्रिया से चुना जाए और उसे नेहरू-गांधी परिवार का समर्थन भी हासिल हो, तो कोई कारण नहीं है कि कांग्रेस में विभाजन हो।

अभी पार्टी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का तो चयन करना नहीं है। अभी जरूरत है एक-एक कर ऐसे राज्यों में कठिन परिश्रम करने की जहां चुनाव हैं, ताकि पार्टी को दोबारा खड़ा किया जा सके। गैर नेहरू-गांधी अध्यक्ष ऐसे लोगों की कांग्रेस में वापसी का सबब भी बन सकता है, जिन्होंने भिन्न समयों में पार्टी से नाता तोड़ लिया था। मसलन शरद पवार की एनसीपी, जिसे लेकर हाल ही में चर्चा चली, जब राहुल गांधी ने पवार के साथ दो घंटे की बैठक की थी। वहीं भारी जीत के बाद जगन रेड्डी एनडीए के करीब जाते दिख रहे हैं, क्योंकि उन्हें केंद्र से मदद की जरूरत होगी। अलबत्ता दबावों से गुजर रही ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ किसी तरह की समझ बना सकती हैं, बशर्ते की पार्टी खुद को संभाल ले।

नए कांग्रेस अध्यक्ष को उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के चार कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति करने से कोई रोकेगा नहीं, लेकिन आज उसे जरूरत होगी रेस के घोड़ों की जो कड़ी मेहनत कर सकें और बेहतर प्रदर्शन दे सकें। भारत बदल रहा है, इसलिए कांग्रेस को भी बदलना चाहिए। भाजपा में हाई कमान संस्कृति चल सकती है, क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पार्टी को विजय दिलाई है और उन पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। मगर कांग्रेस को फिर से खड़ा होना है, तो उसे भिन्न रणनीति अपनानी होगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण करना होगा। 
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