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राजनीति: बेमतलब है ऐसा विरोध, श्वेत और काले पत्रों पर सार्थक बहस जरूरी

Sun, 18 Feb 2024 07:38 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 18 Feb 2024 07:38 AM IST
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सार
श्वेत पत्र दिखाकर यूपीए के शासनकाल में किए गए कार्यों को खारिज कर देना सही नहीं होगा। कुछ काम एनडीए ने अच्छे किए हैं, तो कुछ यूपीए ने भी किए थे। केवल विरोध की राजनीति के बजाय श्वेत और काले पत्रों पर बहस होना ज्यादा सार्थक होगा।
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Congress P Chidambaram UPA Regime White Paper NDA Tenure Baseless opposition
यूपीए और एनडीए के कार्यकाल में तुलना को लेकर विरोध - फोटो : ANI

विस्तार

कभी-कभी पागलपन में भी एक पैटर्न दिखता है। आम चुनाव से ठीक पहले अपना आखिरी बजट पेश करने वाली सरकार ने अगले वित्त वर्ष की अप्रैल से जुलाई तक के लिए लेखानुदान के साथ अंतरिम बजट पेश किया। वित्तमंत्री का भाषण सरकार के पिछले रिकॉर्ड पर नजर रखने और भविष्य के लिए रास्ता तय करने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। वित्तमंत्री सीतारमण ने कुछ हद तक दोनों काम किए। लेकिन उनका बजट आठ फरवरी, 2024 को कांग्रेस द्वारा जारी काले पत्र और सरकार द्वारा जारी श्वेत पत्र से बर्बाद हो गया। उम्मीद थी कि भाजपा के दस साल के शासन के अंत में श्वेत पत्र उसके कार्यकाल पर होगा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह वर्ष 2004 से 2014 के बीच के यूपीए के कार्यकाल पर था। इस श्वेत पत्र का उद्देश्य उन दस वर्षों को एक ही रंग ‘काले’ में रंगना था, लेकिन इसने यूपीए की उपब्धियों को भी चर्चा में ला दिया। अनिवार्य रूप से यूपीए और एनडीए की तुलना होने लगी। ऐसी किसी भी तुलना में कुछ मानदंडों पर यूपीए का एनडीए से बेहतर होना एकदम तय है। इसी वजह से मैंने कहा कि यह पागलपन ही है, लेकिन राजनीतिक के चतुर-सयाने इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करना जानते हैं।


बड़ा फर्क है
एक आंकड़ा, जिस पर सभी का ध्यान गया, वह था स्थिर कीमतों पर औसत सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर। यूपीए ने इस मामले में बड़ी सफलता हासिल की। पुराने आधार वर्ष 2004-05 के अनुसार, दस वर्षों में औसत जीडीपी वृद्धि दर 7.5 फीसदी थी। वर्ष 2015 में भाजपा सरकार ने यूपीए की उपलब्धि को धूमिल करने के लिए आधार वर्ष को बदलकर 2011-12 कर दिया, फिर भी औसत विकास दर 6.7 फीसदी थी। इसकी तुलना में एनडीए के कार्यकाल के दस वर्षों में औसत विकास दर 5.9 फीसदी रही। यह फर्क कोई छोटा नहीं है। दस वर्षों की अवधि में प्रति वर्ष 1.6 फीसदी (या 0.8 फीसदी) का फर्क सकल घरेलू उत्पाद के आकार, प्रति व्यक्ति आय, वस्तु और सेवाओं की मात्रा, निर्यात की मात्रा/मूल्य, राजकोषीय एवं राजस्व घाटा एवं अन्य मानदंडों पर काफी बड़ा प्रभाव डालता है। एक चीज ने दूसरी चीजों को जन्म दिया और तुलना का खेल शुरू हो गया। कृपया इस सारणी को देखिए-


कई पैमानों पर एनडीए का प्रदर्शन खराब रहा। मेरे विचार से सबसे नुकसानदायक बिंदु, जिन्होंने एनडीए की गलत नीतियों और अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन को उजागर किया, उनमें कुल राष्ट्रीय ऋण, घरेलू बचत में कमी, बैंक कर्जे की माफी में उछाल, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च और केंद्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या में गिरावट शामिल हैं। बेशक कुछ पैमाने हैं, जिन पर एनडीए का प्रदर्शन बेहतर था।

सफेद झूठ
सरकार का श्वेत पत्र दरअसल एक सफेद झूठ था। इसने यूपीए सरकार की कई उपलब्धियों को धुंधला कर दिया और एनडीए सरकार की बड़ी विफलताओं (नोटबंदी और सूक्ष्म एवं लघु क्षेत्र के विनाश सहित) को छिपा दिया। श्वेत पत्र को सफेद झूठ पत्र कहा जाए, तो हैरत नहीं। श्वेत पत्र खासकर यह स्वीकारने में विफल रहा कि जन-धन (पहले नो फ्रिल एकाउंट), आधार और मोबाइल क्रांति का विचार और उत्पत्ति यूपीए सरकार की देन है।

यूपीए के कथित कुप्रबंधन की अवधि (जैसा कि श्वेत पत्र में सारणियों और ग्राफ में देखा जा सकता है) मुख्यतः 2008 से 2012 थी। वर्ष 2008 के मध्य सितंबर में वित्तीय सुनामी के कारण अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजार ध्वस्त हो गया था, जिसने हर देश को तबाह कर दिया। सभी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपनाई गई 'मात्रात्मक सुगमता' की नीति के हिस्से के रूप में भारी उधार लेने और खर्च करने से मुद्रास्फीति बढ़ गई। जनवरी, 2009 से जुलाई, 2012 तक प्रणब मुखर्जी वित्तमंत्री थे, जो मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे का चरम दौर था। मुखर्जी के बचाव में मैं कहना चाहूंगा कि उन्होंने प्रचलित बुद्धिमत्ता का पालन किया और विकास एवं रोजगार को समर्थन दिया, लेकिन उसकी कीमत मुद्रास्फीति एवं राजकोषीय घाटे के रूप में चुकानी पड़ी।

विरोध ही राजनीति
कांग्रेस द्वारा जारी काला पत्र भी एकतरफा था। स्वभाविक रूप से इसमें कृषि क्षेत्र में गंभीर संकट, लगातार उच्च मुद्रास्फीति, बेरोजगारी की अप्रत्याशित दर, और भाई-भतीजावाद जैसे खंड शामिल थे। अन्य खंडों में जांच एजेंसियों को हथियार बनाने, संस्थानों के विनाश, भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ और मणिपुर संकट शामिल थे। जैसा इसका नाम था, यह वाकई एनडीए के लिए एक काला पत्र ही था।

श्वेत और काला, दोनों पत्रों के उद्देश्य आर्थिक के बजाय राजनीतिक ज्यादा थे। हालांकि इसके आर्थिक पहलू ज्यादा स्पष्ट थे। दोनों पत्रों में जिन मुद्दों का उल्लेख था, उन पर पिछले दस साल में संसद के दोनों सदनों में बहस होनी चाहिए थी। लेकिन यह नहीं हो सकता क्योंकि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस की अनुमति कभी नहीं देगी। लेकिन चुनावी माहौल में इन दोनों पत्रों ने बहस की गुंजाइश जरूर पैदा की है। बाकी समय ही बताएगा कि चुनावों के नतीजे सार्थक बहसों से या फिर पैसा, धर्म, नफरती भाषण और सत्ता के दुरुपयोग से निर्धारित होंगे ?
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