{"_id":"5c826e22bdec2214476319d7","slug":"congress-lagging-behind-in-coalition","type":"story","status":"publish","title_hn":"गठबंधन में पिछड़ती कांग्रेस","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
गठबंधन में पिछड़ती कांग्रेस
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
शीला और राहुल
सर्जिकल स्ट्राइक के दूसरे चरण (बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले) के बाद जुझारू और आत्मविश्वासी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी जहां गठबंधन सहयोगियों को जोड़ने तथा अनुप्रिया पटेल के अपना दल जैसे असंतुष्ट सहयोगियों को मनाने में सफल रही है, वहीं कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ सीटों पर तालमेल करने में विफल रही है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, दोनों प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिधिंया की प्रतीक्षा कर रही हैं, ताकि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की कहानी को फिर से नया रूप दिया जा सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख मौलाना ने बार-बार गैर-एनडीए पार्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की, लेकिन उनकी अपील को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की हताशा के संकेत के रूप में गलत मतलब निकाला गया।
पाकिस्तान के भीतर हवाई हमलों के बाद संयुक्त विपक्ष को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए का सामना करने के लिए अपनी संशोधित रणनीति बनाने की आवश्यकता है। अहंकार या एक ही व्यक्ति की श्रेष्ठता के बजाय गठबंधन और साझेदारी के लिए फिर से काम शुरू करने के लिए संघर्ष जरूरी है, खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में, जहां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सर्वाधिक चुनावी लाभ लेने के लिए तैयार है। ममता बनर्जी, शरद पवार और चंद्रबाबू नायडू चाहते हैं कि कांग्रेस जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात तक आमने-सामने की लड़ाई लड़े, जहां लोकसभा की 273 सीटों पर चुनाव होता है। इस समय इनमें से 220 से ज्यादा सीटें एनडीए के पास हैं। संयुक्त विपक्ष इनमें से कम से कम सौ सीटें छीनने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन 26 फरवरी को पाकिस्तान में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक-2 ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच वार्ता पवार, ममता और चंद्रबाबू की सलाह पर तय की गई थी। लेकिन शीला दीक्षित गठबंधन से बचने के लिए अड़ी रहीं, ताकि उनके अनुयायियों को लोकसभा चुनाव में टिकट मिल सके और वे विधानसभा चुनाव तक उनके साथ बने रहें। इसके अलावा शीला दीक्षित ने ऐसा इसलिए भी किया, ताकि उनके बेटे संदीप दीक्षित को उनकी राजनीतिक विरासत मिल सके। कपिल सिब्बल का मानना था कि आप गठबंधन के साथ चुनाव जीतना उनके लिए आसान था। अजय माकन भी सिब्बल के पक्ष में थे और वह भी नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे थे। दिल्ली के पुराने लोग हैरान थे कि राहुल गांधी ने दिल्ली में गठबंधन के लिए खुली और स्वतंत्र चर्चा क्यों की! अक्तूबर, 2016 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचारों को सुने बिना उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ एकतरफा गठबंधन किया था। ऐसा ही मामला पश्चिम बंगाल में हुआ, जहां कांग्रेस आला कमान ने विधानसभा चुनाव से पहले अपने बंगाल इकाई की बात सुने बगैर वाम दलों के साथ गठबंधन कर लिया।
यह समझना चाहिए कि भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार खड़े करने का विचार कहने में जितना आसान है, करने में नहीं। बंगाल में सीट समायोजन के लिए ममता बनर्जी या वाम दलों के साथ बहुत कम या कोई बातचीत नहीं हुई है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश या दिल्ली के विपरीत संभावित सहयोगी को कांग्रेस अथवा वाम दलों को कोई सुखद संदेश देने में कोई रुचि नहीं है। कुछ हद तक इससे भी बदतर स्थिति ओडिशा में है, जहां नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल के कांग्रेस के साथ आने की संभावना नगण्य है। आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी और कांग्रेस तेलंगाना में अपने गठबंधन को मिली चोट को सहलाने में व्यस्त हैं, जिसे हाल ही में विधानसभा चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा।
उत्तर प्रदेश में गठबंधन की कहानी अभी गंभीर है, पर खत्म नहीं हुई है। यह एक खुला रहस्य है कि बसपा सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को समायोजित नहीं करना चाहती हैं। बदले में कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और महाराष्ट्र आदि में सपा एवं बसपा को सीटें देने का अप्रिय विकल्प है। उत्तर प्रदेश में इज्जत बचाने के लिए सीट देने के बदले में इनके पास मजबूत संगठन नेटवर्क, चुनावी मशीनरी और जीतने वाले उम्मीदवार हैं।
विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश में गैर-भाजपा पार्टियों के पास साथ आने की संभावन शून्य से लेकर सौ फीसदी तक है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहां चाह, वहां राह। यदि सपा, बसपा और कांग्रेस पूरी ईमानदारी के साथ एक साथ आती हैं, तो एक-दूसरे के प्रति गर्मजोशी न होने के बावजूद अस्सी सीटों का चयन व बंटवारा कोई बड़ी समस्या नहीं है। यही वह क्षेत्र है, जहां सोनिया गांधी अपनी सद्भावना का उपयोग कर सकती हैं। अहमद पटेल और ए के एंटनी के जरिये वह सीटों का समायोजन करवा सकती हैं।
लेकिन इस अंकगणितीय गणना पर ही कांग्रेस की चिंता समाप्त नहीं होती है। एक प्रभावी रोड-शो के बाद प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने 72 घंटे के मैराथन दौरे (जिसमें मात्र सात घंटे उन्होंने आराम किया) के दौरान 200 प्रभावी नेताओं से मुलाकात की। लोगों की प्रतिक्रिया थी कि कांग्रेस में एक विश्वसनीय लड़ाई लड़ने और खुद को भाजपा का राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करने की क्षमता है। गठबंधन को जोड़ने की संभावनाएं छोटी थीं, और जाति आधारित पार्टियों का भी पता लगाया गया। लेकिन 26 फरवरी के हवाई हमले ने इन तमाम गणनाओं और विचारों को उलट दिया है। आशावादी कांग्रेस अब अगले पांच वर्षों के लिए विपक्ष की सीट पर बैठने की संभावना पर विचार कर रही है। मोदी को बाहर रखने के लिए अपने स्वार्थों को त्यागने का जुआ उलटा भी पड़ सकता है और रुककर विचार करने के लिए अब समय नहीं है।