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सच की अनदेखी करती कांग्रेस

Wed, 16 Jul 2014 01:23 AM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Wed, 16 Jul 2014 01:23 AM IST
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Congress is ignoring the truth

डेनमार्क के मशहूर लेखक हैंस क्रिश्चियन एंडरसन ने 1837 में एक अद्भुत कहानी लिखी, जिसका शीर्षक था, 'दि एंपरर्स न्यू क्लोथ्स'(राजा के नए कपड़े)। यह एक ऐसे राजा की कहानी है, जिसे अपनी शख्सियत और वेशभूषा पर इतना घमंड था, कि वह दिन के हर घंटे में अपनी पोशाक बदल देता था।

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एक दिन खुद को चमत्कारी जुलाहा बताने वाले दो ठग शहर में आए। उन्होंने राजा को बताया कि वे ऐसी जादुई पोशाक बना सकते हैं, जो केवल उन्हीं को दिखाई देगी, जिनका हृदय और आत्मा पूरी तरह पवित्र हो। राजा उनकी बातों में आ गया। और उसने जुलाहों से तुरंत काम शुरू करने को कहा।
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ठगों को मनुष्य के मूल स्वभाव की गहरी समझ थी। उन्होंने खाली करघे पर स्वांग करना शुरू कर दिया। उनके काम का मुआयना करने कई मंत्री वहां आते थे, मगर उन्हें कुछ नहीं दिखता था। इसके बावजूद वे कपड़े की तारीफ करते हुए लौट जाते थे। जब राजा अपनी नई पोशाक को देखने गया तो वह पेशोपेश में पड़ गया। मगर फिर औरों की तरह उसने भी जुलाहों के काम की तारीफ की।
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अपनी इस नई पोशाक में, जो दरअसल थी ही नहीं, राजा अपनी जनता के सामने आया। चूंकि सभी को जुलाहे की कहानी पता थी, और हर कोई खुद को साफ हृदय वाला दिखाना चाहता था, इसलिए सभी ने राजा का स्वागत किया। तभी एक बच्चे की चीख ने सभी को स्तब्ध कर दिया। दरअसल बच्चे ने वह सच कह दिया, जिसे हर कोई छिपाना चाह रहा था। राजा निर्वस्त्र था।

स्वतंत्रता के बाद से अब तक भारत में हुए चुनावों की अपनी सबसे करारी हार का स्वाद चखने के बाद कांग्रेस जैसा बरताव कर रही है, उससे मेरे जेहन में इस राजा की कहानी कौंध जाती है। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उनके सुपुत्र राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस कार्यसमिति ऐसे व्यवहार कर रही है कि मानो कुछ हुआ ही न हो। और तो और काफी विवेकशील माने जाने वाले ए के एंटनी भी बदले-बदले से नजर आ रहे हैं।

ईमानदारी और बेबाकी से अपनी राय रखने वालों में शामिल माने जाने वाले पूर्व रक्षा मंत्री एंटनी ने 2014 के चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर अपनी रिपोर्ट में सोनिया और राहुल का बचाव करते हुए चुप्पी साध लेना ज्यादा सही समझा। इस रिपोर्ट में कांग्रेस की हार के लिए अंदरूनी मतभेदों, हतोत्साहित कार्यकर्ताओं, चुनाव से पहले प्रभावी गठबंधन न हो पाना, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराया गया। दरअसल इस रिपोर्ट में वही सब कुछ था, जो सोनिया गांधी सुनना चाहती थीं। इसी वजह से इसमें पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं या मतदाताओं को प्रेरित करने में राहुल की गांधी की नाकामयाबी पर कुछ भी नहीं कहा गया।

वर्तमान लोकसभा में भी कांग्रेस का रवैया बेहद उदासीन रहा है। फुटबॉल विश्वकप की ऐसी दीवानगी की इसकी वजह से राहुल लोकसभा में झपकी लेते नजर आए। बेशक, इसके लिए लोग उन्हें माफ कर दें। मगर रेल बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए संसद के बाहर उनका बस यह कहना, कि यह एक निराशाजनक बजट है, और इसमें कुछ राज्यों की अनदेखी की गई है, उन तमाम लोगों को निराश कर गया, जो उनसे कहीं ज्यादा सार्थक प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहे थे।

अमित शाह की सांप्रदायिक और आपराधिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कांग्रेस के प्रवक्ता ने उनके भाजपा के नए प्रमुख बनने पर काफी कुछ कहा। मगर कांग्रेस से सहानुभूति रखने वालों और पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए इन शब्दों के कोई मायने नहीं थे। वह तो इस सवाल का जवाब चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र समेत पूरे भारत में अमित शाह की राजनीतिक शैली से निपटने के लिए सोनिया और राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस के पास कोई ठोस योजना है, या नहीं। इसके अलावा वह यह भी जानना चाहते हैं कि क्या महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नाम पर इतराने वाली भारत की यह ग्रांड ओल्ड पार्टी (कांग्रेस) धार्मिक कट्टरता, जातिवादी और देश को बांटने वाली राजनीति से लड़ने की अपनी इच्छा खो चुकी है ?

धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द पार्टी के बुनियादी मुद्दे रहे हैं। तो फिर असम से महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर से केरल तक देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करने के लिए कोई जन आंदोलन खड़ा करने से आखिर कांग्रेस क्यों हिचक रही है। असम में कांग्रेस का शासन रहने के बावजूद वहां सांप्रदायिक और नस्लीय हिंसा होती रहती है।

महाराष्ट्र में भी शिवसेना और भाजपा के उदय को कांग्रेस सरकार नहीं रोक पाई। जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ सत्ता को साझा कर रही है, मगर इसके बावजूद सदियों से वहां के निवासी रहे स्थानीय कश्मीरियों और पंडितों  के बीच एकता और सौहार्द की भावना को विकसित कर पाने में उसे नाकामयाबी ही मिली है। इसके अलावा पार्टी पर भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगे हैं।


गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार व्यापम (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) घोटाले के आरोपों के शिकंजे में है, मगर राहुल गांधी को थोड़ा सा वक्त निकाल कर भोपाल में किसी धरने का नेतृत्व करने की फुर्सत नहीं मिली है। खुद कांग्रेस के लोग भी अचंभे में हैं कि कांग्रेस के युवा उपाध्यक्ष आखिर दिन भर करते क्या हैं। क्या इसकी वजह महज उनका आई-फोन है, या फिर किसी जन आंदोलन का नेतृत्व करने में उनकी अरुचि। अफसोस की बात यह है कि हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की कहानी की तरह कांग्रेस में कोई भोला-भाला बच्चा नहीं है, जो चीख कर सबसे कह सके कि सोनिया और राहुल जैसा रवैया अपना रहे हैं, वह पूरी तरह से गलत है।

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