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नदी जोड़ परियोजना की उलझन
प्रदीप श्रीवास्तव
Updated Mon, 18 Jun 2018 05:44 PM IST
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प्रदीप श्रीवास्तव
बुंदेलखंड और विदर्भ जैसे इलाकों में पानी को लेकर मारकाट और उपद्रव कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसे में बुंदेलखंड में नदी जोड़ परियोजना पर काम शुरू हुआ है। एक तरफ तो इससे बाढ़ व सूखे की समस्या के स्थायी समाधान की बात कही जा रही है, जबकि पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर विरोध शुरू होना गया है।
देश की नदियों को जोड़ने की योजना पहली बार ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने 1858 में बनाया था। उनकी सोच थी कि नहरों के विशाल जाल से सभी नदियां आपस में जुड़ जाएं, जिससे पानी के रास्ते कच्चे माल का आयात-निर्यात आसान हो सके और सूखे और बाढ़ की समस्या से निपटा जा सके। कम संसाधनों, भारी निवेश व काल्पनिक परियोजना के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी। 1970 में सिंचाई मंत्री केएल राव ने एक राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन केंद्रीय जल आयोग ने इसे खारिज कर दिया।
वर्ष 2002 में भयंकर सूखे के कारण नदी जोड़ परियोजना पर फिर चर्चा शुरू हुई। एक बार फिर कार्य दल का गठन हुआ। पहले भाग में दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ कर 16 कड़ियों की एक ग्रिड बनाने और हिमालीय भाग में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियों के पानी को एकत्रित करने की योजना बनी। लेकिन, 2004 में यह योजना ठप हो गई। 2012 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नदी जोड़ परियोजना को लागू करने का निर्देश दिया। इसी का परिणाम है केन-बेतवा लिंक। इसकी सफलता के साथ ही देश में 30 नदी जोड़ परियोजनाएं परवान चढ़ेंगी।
लगभग 10 हजार करोड़ रूपये की लागत वाली इस परियोजना में मध्य प्रदेश से केन नदी के अतिरिक्त पानी को 231 किमी लंबी एक नहर के जरिये उत्तर प्रदेश में बेतवा नदी तक लाया जाएगा। इससे बुंदेलखंड की एक करोड़ की आबादी खुशहाल और 1.27 लाख हजार हेक्टेयर जमीन सिंचित हो जाएगी। विद्युत संयंत्र बनेंगे। 220 किलोमीटर लंबी नहरों का जाल बिछाया जाएगा। ये नहरें 60,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करेंगी।
बुंदेलखंड में दशकों से जल संचयन को लेकर कार्य कर रहे जन जल जोड़ों अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि इस परियोजना में सबसे बड़ी अड़चन कुदरत ही है। शताब्दियों पहले नदियों का एक स्वाभाविक ढाल बना, जिससे कृत्रिम तरीके से बदलना नामुमकिन है। कई उदाहरण हैं, जहां नदियों के पानी की दिशा नहरों के जरिये मोड़ी गई, तो उन्होंने आसपास की जमीन को खारा और दलदली बना दिया।
राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद अनसुलझे हैं। सतलुज-यमुना लिंक नहर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के विवाद जगजाहिर हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच अंग्रेजों के जमाने से कावेरी जल विवाद चला आ रहा है।
वहीं, दुनिया के कई देश भी नदी जोड़ योजना से तौबा कर चुके हैं। अमेरिका में कोलैराडो से लेकर मिसीसिपी नदी घाटी तक बड़ी संख्या में बनी ऐसी परियोजनाएं गाद भर जाने के कारण बाढ़ का प्रकोप बढ़ाने लगीं और उनसे बिजली का उत्पादन बंद हो गया। आखिर में बांध तोड़ने पड़े। गंगा या ब्रह्मपुत्र में हर साल आने वाली गाद की मात्रा मिसीसिपी नदी से दोगुनी है।
सोवियत संघ के जमाने में साइबेरियाई नदियों को नहरों के जाल के जरिये कजाकिस्तान और मध्य एशिया की नदियों की ओर मोड़ने का काम हुआ था। योजना का मुख्य हिस्सा 2200 किलोमीटर लंबी एक नहर थी। जहां-जहां भी नहर पहुंची वहां-वहां दलदली जमीन और खारे पानी ने किसानों की कमर तोड़ दी। 80 के दशक में इस योजना को बंद कर दिया गया।
-लेखक एनएफआई-ऑक्सफेम फेलो हैं।
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देश की नदियों को जोड़ने की योजना पहली बार ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने 1858 में बनाया था। उनकी सोच थी कि नहरों के विशाल जाल से सभी नदियां आपस में जुड़ जाएं, जिससे पानी के रास्ते कच्चे माल का आयात-निर्यात आसान हो सके और सूखे और बाढ़ की समस्या से निपटा जा सके। कम संसाधनों, भारी निवेश व काल्पनिक परियोजना के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी। 1970 में सिंचाई मंत्री केएल राव ने एक राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन केंद्रीय जल आयोग ने इसे खारिज कर दिया।
वर्ष 2002 में भयंकर सूखे के कारण नदी जोड़ परियोजना पर फिर चर्चा शुरू हुई। एक बार फिर कार्य दल का गठन हुआ। पहले भाग में दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ कर 16 कड़ियों की एक ग्रिड बनाने और हिमालीय भाग में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियों के पानी को एकत्रित करने की योजना बनी। लेकिन, 2004 में यह योजना ठप हो गई। 2012 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नदी जोड़ परियोजना को लागू करने का निर्देश दिया। इसी का परिणाम है केन-बेतवा लिंक। इसकी सफलता के साथ ही देश में 30 नदी जोड़ परियोजनाएं परवान चढ़ेंगी।
लगभग 10 हजार करोड़ रूपये की लागत वाली इस परियोजना में मध्य प्रदेश से केन नदी के अतिरिक्त पानी को 231 किमी लंबी एक नहर के जरिये उत्तर प्रदेश में बेतवा नदी तक लाया जाएगा। इससे बुंदेलखंड की एक करोड़ की आबादी खुशहाल और 1.27 लाख हजार हेक्टेयर जमीन सिंचित हो जाएगी। विद्युत संयंत्र बनेंगे। 220 किलोमीटर लंबी नहरों का जाल बिछाया जाएगा। ये नहरें 60,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करेंगी।
बुंदेलखंड में दशकों से जल संचयन को लेकर कार्य कर रहे जन जल जोड़ों अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि इस परियोजना में सबसे बड़ी अड़चन कुदरत ही है। शताब्दियों पहले नदियों का एक स्वाभाविक ढाल बना, जिससे कृत्रिम तरीके से बदलना नामुमकिन है। कई उदाहरण हैं, जहां नदियों के पानी की दिशा नहरों के जरिये मोड़ी गई, तो उन्होंने आसपास की जमीन को खारा और दलदली बना दिया।
राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद अनसुलझे हैं। सतलुज-यमुना लिंक नहर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के विवाद जगजाहिर हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच अंग्रेजों के जमाने से कावेरी जल विवाद चला आ रहा है।
वहीं, दुनिया के कई देश भी नदी जोड़ योजना से तौबा कर चुके हैं। अमेरिका में कोलैराडो से लेकर मिसीसिपी नदी घाटी तक बड़ी संख्या में बनी ऐसी परियोजनाएं गाद भर जाने के कारण बाढ़ का प्रकोप बढ़ाने लगीं और उनसे बिजली का उत्पादन बंद हो गया। आखिर में बांध तोड़ने पड़े। गंगा या ब्रह्मपुत्र में हर साल आने वाली गाद की मात्रा मिसीसिपी नदी से दोगुनी है।
सोवियत संघ के जमाने में साइबेरियाई नदियों को नहरों के जाल के जरिये कजाकिस्तान और मध्य एशिया की नदियों की ओर मोड़ने का काम हुआ था। योजना का मुख्य हिस्सा 2200 किलोमीटर लंबी एक नहर थी। जहां-जहां भी नहर पहुंची वहां-वहां दलदली जमीन और खारे पानी ने किसानों की कमर तोड़ दी। 80 के दशक में इस योजना को बंद कर दिया गया।
-लेखक एनएफआई-ऑक्सफेम फेलो हैं।