सरकार है तो विवाद भी है
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लगा था कि पुरानी सरकार गई, तो विवाद भी गए। झगड़े-झंझट खत्म हुए। नई सरकार बहुमत से आई है, तो न कोई विवाद होगा, न कोई झंझट। पर जी, विवाद तो अब भी हैं। वे खत्म ही नहीं हो रहे। किसी सरकार के पांच साल के हिसाब-किताब में कुछ विवाद भी हों, तो बात समझ में भी आती है, पर किसी सरकार के डेढ़-दो महीने के कार्यकाल में ही इतने विवाद शामिल हों, तो मुश्किल होती है। मुश्किल सरकार के लिए भी होती है और जनता के लिए भी। आसानी सिर्फ टीवी चैनलों के लिए होती है कि प्राइम टाइम पर चर्चा कराने के लिए उन्हें मसाला मिल जाता है। आसानी एक्सपर्टों के लिए भी होती है कि उन्हें ज्ञान देने का मौका मिल जाता है।
अब देखिए न, सरकार बनते ही पहले एक मंत्री की क्वालीफिकेशन पर विवाद हो गया। कहा गया कि मानव संसाधन विकास मंत्री की शैक्षणिक योग्यता उतनी नहीं है। किसी ने नई मंत्री की इस योग्यता को नहीं देखा कि प्रधानमंत्री उन्हें छोटी बहन मानते हैं। उनकी योग्यता यह भी है कि उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा है। फिर उनकी असली योग्यता यह है कि वह सास-बहू वाली अभिनेत्री हैं, जो इतने आंसू बहा सकती हैं कि मानसून की कमी पूरी हो जाए।
फिर विवाद हुआ सेनाध्यक्ष की नियुक्ति पर। सरकार ने नया सेनाध्यक्ष नियुक्त किया, तो पूर्व सेनाध्यक्ष और अब मंत्री ने अपनी ही सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। सेनाध्यक्ष रहते हुए वह देश के लिए तो लड़े ही थे, अपने लिए भी कोई कम नहीं लड़े। किसी तरह वह विवाद ठंडा हुआ, तो राजस्थान की एक अदालत ने बलात्कार के मामले में सरकार के एक मंत्री को तलब कर लिया। और जब प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर थे, तो वैदिक जी की महत्वाकांक्षा ने सरकार को संसद में परेशानी में डाल दिया। देखिए जी, सरकार होगी, तो विवाद भी होंगे। पर इतने कम समय में इतने ज्यादा विवाद लोगों को आश्चर्य में डाल रहे हैं। कहते हैं, पूत के पांव पालने में दिखाई दे जाते हैं। क्या यह सरकार दूसरों से अलग साबित होने जा रही है!