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कारोबार के साथ सरोकार भी
मुख्तार केंट
Updated Sun, 28 Sep 2014 04:14 PM IST
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मेरे पिता जब तुर्की के राजदूत बनकर भारत आए, तब मैं छोटा था। हम दो साल नई दिल्ली में रहे। उन दिनों की मुझे ज्यादा याद नहीं, पर यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, रंग-बिरंगे वस्त्रों और फूलों के साथ-साथ यहां के रहस्यमय संगीत, मसालेदार सालन और चटनियों की खुशबू मुझे याद है। आज एक बिजनेसमैन के रूप में जब मैं ग्लोबल कंपनियों को भारत की तरफ आकर्षित होते हुए देखता हूं, तो मुझे लगता है कि बचपन में मेरे साथ भी यही हुआ था।
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कोका कोला भारत में 1950 में शुरू हुई थी, लेकिन 1977 में हमें जाना पड़ा। भारत में आर्थिक सुधारों के बाद 1993 में हमारी वापसी हुई। पर जैसा हमने सोचा था, उसके बजाय परेशानी ही हुई। हमें प्रतिभावान कर्मचारियों को खोजने के लिए संघर्ष करना पड़ा। हमें यह भी लगा कि ग्लोबल ब्रांड्स अपनाने के बावजूद भारतीय उपभोक्ता ग्लोबल कॉरपोरेट प्रभुत्व के खिलाफ हैं। यह समझने में हमें वक्त लगा कि छोटी दुकानें भी, जिनमें से कई घरों के बाहर खुली होती हैं, आर्थिक अवसर प्रदान करती हैं। आज भारत हमारे लिए दुनिया के दस बड़े बाजारों में से एक है। पिछले दिनों हमने घोषणा की थी कि हम और हमारे बॉटलिंग पार्टनर 2012 से 2020 के बीच भारत में पांच अरब डॉलर का पूंजी निवेश करेंगे। तब तक भारत हमारे लिए विश्व के पांच सबसे बड़े बाजारों में से एक होगा।
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भारत में हमारी सबसे पहली चुनौती सही टीम गठित करने की थी। वापसी के बाद के कई वर्षों में कोका कोला छोड़ने वालों की संख्या काफी थी। इसलिए हमने प्रशिक्षण और प्रतिभावान कर्मचारियों की नियुक्ति पर बल दिया। हमने अपने उत्पादनों के लिए संसाधन जुटाने के लिए कड़ी मेहनत की, ताकि भारतीय बाजार के साथ हमारे रिश्ते गहरे हों। जैसे, हमने आम उगाने शुरू किए और नींबू के फार्मों में पैसा लगाया। इससे भारतीयों को लगा कि हम उन्हें सिर्फ बेचते नहीं, उनसे खरीदते भी हैं। भारत के लोग आत्मनिर्भरता और टिकाऊपन को बहुत पसंद करते हैं। हमने पता लगाया कि हमारे ज्यादातर ग्राहक सुपर मार्केट के बजाय छोटी पारिवारिक दुकानों से हमारे उत्पाद खरीदते हैं। हमने यह भी देखा कि किस तरह युवा पीढ़ी वायरलेस टेक्नोलॉजी अपना रही है और मोबाइल कॉमर्स में विश्व क्रांति का नेतृत्व कर रही है। हमें लगा कि छोटी-छोटी दुकानों को कोक के पहचान चिह्न देना और उन्हें अपने उत्पादों को सजाने का तरीका सिखाना ही काफी नहीं है। कई दुकानों पर बिजली न होने के कारण वे हमारे पेय ठंडे नहीं रख पाते। फिर भारत में छोटी दुकानें प्रायः महिलाएं चलाती हैं, जिन्हें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा दिक्कतें आती हैं।
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ऐसे में, जब हमारे बॉटलिंग प्लांट की वजह से आसपास के गांवों तक पानी की आपूर्ति शुरू हो जाती है, तो महिलाओं को कुओं से पानी नहीं लाना पड़ता। जब हमारा सामान बेचने वाली दुकानों तक बिजली पहुंचती है, तो सिर्फ हमारे पेय ही ठंडे नहीं मिलते, पूरे गांव को बिजली मिलती है। हाल ही में हमने ‘5 बाई 20’ नामक योजना शुरू की, जिसका लक्ष्य 2020 तक दुनिया भर में 50 लाख महिला उद्यमियों को ट्रेनिंग देना और वित्तीय अवसर उपलब्ध कराना है।
हम भारतीय बाजार के लिए विशेष हल खोजने की कोशिश करते रहते हैं और इस बारे में मेरा एक पसंदीदा उदाहरण ‘इकोकूल’ है। सौर ऊर्जा से चलने वाले इस मोबाइल कूलर को हमने उन लाखों गांवों में उपयोग के लिए विकसित किया है, जहां बिजली नहीं पहुंची है। हमने 2013 तक ग्रामीण दुकानदारों को एक हजार इकोकूल ठेले बांटे हैं। यह बात समझ लेनी चाहिए कि हमारा भविष्य उन समुदायों के साथ जुड़ा है, जहां हम काम करते हैं। अगर भारत फले-फूलेगा, तो हमारे लिए भी व्यापार के बेहतर और टिकाऊ अवसर मिलेंगे।
(लेखक कोका कोला कंपनी के चेयरमैन और सीईओ हैं और यह ‘मैकेंजी ऐंड कंपनी द्वारा संपादित पुस्तक ‘रीइमैजिनिंग इंडिया’ में प्रकाशित उनके लेख का संपादित अंश है)