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तालिबान से बात करने की मजबूरी

Wed, 06 Mar 2013 09:49 PM IST
Updated Wed, 06 Mar 2013 09:49 PM IST
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compulsion of talk to taliban

पाकिस्तानी संसद की अवधि खत्म होने में चंद दिन ही शेष रह गए हैं। आम चुनाव की घोषणा किसी भी समय हो सकती है। दूसरी तरफ वहां तेजी से हिंसा फैल रही है। कबाइली क्षेत्र, खैबर पख्तूनखा प्रांत, कराची और बलूचिस्तान जबर्दस्त हिंसा की चपेट में है। प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाक संगठन ने सरकार से चंद सख्त शर्तों के साथ शांति वार्ता करने का इरादा जाहिर किया है। राजनीतिक और मजहबी पार्टियां भी चाहती हैं कि अमन कायम करने के लिए सरकार को तालिबान की बातचीत की पेशकश को संजीदगी से लेना चाहिए, क्योंकि शांति बातचीत के जरिये ही कायम हो सकती है, जंग से नहीं।

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इस्लामाबाद में 28 फरवरी को ही 30 राजनीतिक और मजहबी पार्टियों की एक मिली-जुली कॉफ्रेंस हुई, जिसमें तय पाया गया कि इस बारे में सरकार पर दबाव बनाया जाए। मगर सरकार अभी तक बातचीत के लिए तैयार नजर नहीं आ रही, क्योंकि तालिबान तो लोकतंत्र में यकीन ही नहीं रखते। आम ख्याल है कि अगर बातचीत हुई भी, तो कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलेगा। इन हालात को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि चुनाव से पहले पाक-तालिबान तथा दूसरे आतंकवादी गुट विध्वंसक कार्रवाइयां तेज कर देंगे, जिससे चुनाव प्रभावित होगा।
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पाकिस्तान के हिंसाग्रस्त व अशांत प्रांत बलूचिस्तान में चुनाव कराना और भी मुश्किल होगा, जहां गत 13 जनवरी से राज्यपाल शासन लागू है। इसे तभी खत्म किया जा सकता है, जब वहां बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमानों व अल्पसंख्यक शिया बिरादरी में जारी सांप्रदायिक हिंसा बंद हो। काबिले गौर है कि 1974 में जनरल जियाउल हक ने अहमदिया मुसलमानों को गैर मुस्लिम घोषित कर दिया था। उस समय शिया-सुन्नी, दोनों समुदायों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन जिया ने शरिया कानून पर अमल शुरू किया, तो सुन्नी-शिया में मतभेद उजागर होने लगे। 80 के दशक में यह मतभेद खूनी रूप धारण कर चुका था। ईरान ने शियाओं की मदद की, तो सऊदी अरब ने सुन्नियों को सहायता दी। अब सुन्नी पिछले कई वर्षों से सरकार पर बराबर दबाव बनाए हुए हैं कि वह शियाओं को भी गैर मुस्लिम घोषित करें।
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बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में गत 10 जनवरी को दो बम धमाकों में 117 शिया मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। शिया बिरादरी ने शवों को दफनाने से इंकार करते हुए धरना दिया था और बलूचिस्तान में राज्यपाल का राज कायम करने की मांग की थी। राज्यपाल-राज लागू होने के बाद भी क्वेटा में 16 फरवरी को एक बम विस्फोट में शिया बिरादरी के 90 लोग मारे गए। मरने वालों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। इस बार भी शिया बिरादरी ने शव दफनाने से इंकार किए और क्वेटा में फौज तैनात करने की मांग तथा उग्रवादियों के खिलाफ लक्षित अभियान चलाने पर जोर दिया। इन दोनों हमलों की जिम्मेदारी प्रतिबंधित सुन्नी चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-झंगवी ने ली, जिसका मुख्यालय पंजाब में है और जिसके कोई तीन हजार सदस्य देशभर में विध्वंसक कार्रवाइयां कर रहे हैं।

ऐसे हालात में बलूचिस्तान से शियाओं का दूसरे शहरों और विदेश में पलायन जारी है। इसके लिए बलूचिस्तान के राज्यपाल पाक गुप्त एजेंसियों की नाकामी बता रहे हैं। जबकि पुलिस भी ऐसे तत्वों को गिरफ्तार करने में नाकाम रहती है। आम ख्याल है कि यदि पाक सरकार हालात न संभाल सकी, तो बलूचिस्तान से अल्पसंख्यक शिया का नामोनिशान ही मिट जाएगा। तस्वीर का एक रुख यह है कि लश्कर-ए-झंगवी ने धमकी दी है कि उनके मुजाहिदीन शियाओं को निशाना बनाते रहेंगे, भले ही राज्यपाल का राज जारी रहे या सेना तैनात कर दी जाए।


पाकिस्तान की स्थापना के समय उसके संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने विधानसभा में अपने भाषण में कहा था कि वह पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष, उदार व लोकतांत्रिक देश बनाना चाहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, बल्कि उनके जीवनकाल में ही धार्मिक कट्टरपंथियों ने गैर मुसलमानों के अधिकार छीनने शुरू कर दिए थे। यही कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के उक्त हालात इस बात के सुबूत हैं कि वह बिखरने के कगार पर है। देखना होगा कि आम चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान पाक के हालात क्या रुख अख्तियार करते हैं।

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