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उलझती आरक्षण की व्यवस्था
रोहित कौशिक
Updated Mon, 25 May 2015 07:15 PM IST
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राजस्थान में गुर्जर समुदाय एक बार फिर आरक्षण की मांग को लेकर मुखर हो गया है। हो सकता है कि वार्ता के बाद कुछ दिनों बाद यह आंदोलन टल जाए, पर इस मुद्दे को टालते रहने की रणनीति अंततः समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही है।
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यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हमारे देश में शुरू से ही आरक्षण की व्यवस्था पर राजनीति होती रही है। अब मुख्य मुद्दा पिछड़ों और दलितों का कल्याण नहीं रह गया है, बल्कि आरक्षण हो गया है। आरक्षण के तवे पर सभी अपनी रोटियां सेंकना चाहते हैं। लेकिन जिन जातियों व वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, वहां भी ये एक-दूसरे से ज्यादा आरक्षण पाने के लिए लड़-भिड़ रही हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि हम दलितों एवं पिछड़े वर्ग के उद्धार के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार करें।
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सरकार को यदि आरक्षण देना ही है, तो बजट का एक बड़ा भाग दलितों एवं पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित कर देना चाहिए, जिससे दलितों एवं पिछड़े वर्ग के लिए अच्छे हॉस्टल, पुस्तकालय और कोचिंग जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जा सके और वे पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में अगड़ी जातियों से आगे निकल सकें। दुखद है कि अभी तक निजी क्षेत्र ने दलितों एवं पिछड़ों को प्रोत्साहित करने के लिए सकारात्मक कदम नहीं उठाया है।
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बेशक आरक्षण ने समाज के बहुत से वंचित लोगों का जीवन स्तर सुधारा है, इसलिए इसके महत्व एवं उद्देश्यों पर शक नहीं किया जा सकता। मगर क्या आज भी आरक्षण का उद्देश्य वही रह गया है, जो शुरू में था? अगर हमारे नीति-निर्माताओं को वंचित लोगों की वाकई चिंता होती, तो ऐसी नीतियां बनाई जातीं, कि ऐसे लोग आत्मविश्वास से सराबोर होकर स्वयं ही आरक्षण जैसी व्यवस्था को नकार देते। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिन्होंने आरक्षण की सुविधा के तहत नौकरी तो प्राप्त कर ली, पर दूरदृष्टि एवं लगन के अभाव की वजह से कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर पाए। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने बिना आरक्षण के संघर्षों के बावजूद अपनी दूरदृष्टि, लगन एवं स्पष्ट कार्ययोजना के बल पर नई ऊंचाई छुई और औरों के लिए प्रेरणास्रोत बने। इसलिए आरक्षण को ही जिंदगी में सफलता का सूचक मान लेना तर्कसंगत नहीं है।
इन बातों का अर्थ आरक्षण का विरोध करना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि यदि आरक्षण को राजनीति से न जोड़ा जाता, तो यह दबे-कुचले लोगों के उत्थान का एक बहुत ही सशक्त माध्यम होता। आरक्षण की राजनीति के जरिये राजनीतिक वर्ग खुद को किसी खास जाति एवं वर्ग का मसीहा साबित कर वोट बटोरने की कोशिश करता है। इसका खामियाजा अंततः जनता को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि इससे विभिन्न जातियों के बीच आपसी संघर्ष बढ़ता जाता है।
दरअसल आकर्षक वेतन, काम के प्रति कम जवाबदेही और सुविधापूर्ण जीवन जीने की लालसा ने सरकारी नौकरी के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। निजी क्षेत्र में हर कार्य की जवाबदेही तय है, लेकिन दुर्भाग्य से सरकारी क्षेत्र में जवाबदेही की संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है। हमारा उद्देश्य आरक्षण न होकर दबे-कुचले लागों का उत्थान होना चाहिए। इसके लिए हमें आरक्षण के बजाय अन्य विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आरक्षण की राजनीति से देश को काफी नुकसान हो रहा है।