मुद्दा: खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा हैं मौसमी घटनाएं, विमर्श का हिस्सा बने जलवायु परिवर्तन
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विस्तार
भारत में अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। हैरानी की बात नहीं कि इससे जुड़ी हुई खबरों को ही मीडिया में प्राथमिकता मिलती है। लेकिन क्या हमें उन दूसरे 'बड़े' मुद्दों पर ध्यान नहीं देना चाहिए जो कि अक्सर सत्ता और विपक्ष के बीच चलने वाली राजनीतिक बयानबाजी में दबे रह जाते हैं? मसलन, हाल ही में दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में बारिश हुई। भारी बारिश के कारण शहर के कुछ हिस्सों में जलजमाव हो गया और उससे बचने के लिए लोगों को भागते हुए देखा गया। लोगों को सड़कों पर चलते हुए ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ा। बारिश के चलते तापमान गिर गया और हमें शानदार नीले आसमान के दर्शन हुए। सोशल मीडिया पर गर्म चाय और पकौड़े की खूब बातें हुईं। मैं ऐसे सुखद पलों के लिए किसी को दोष नहीं दे रही हूं, क्योंकि मैंने भी इन सबका लुफ्त उठाया, लेकिन बारिश को रोमांटिक वातावरण से अलग हटकर देखना जरूरी है।
हममें से कितने लोगों को उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत में ओलावृष्टि के साथ हाल की बारिश के बारे में प्रमुखता से खबरें देखने-पढ़ने को मिलीं? इसलिए हमें ध्यान देना चाहिए कि हाल ही में हुई बारिश ने रबी फसलों, विशेष रूप से कटाई के लिए तैयार गेहूं, चना और सरसों की फसलों पर कहर बरपाया है।
भारत के मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार, गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों में दर्ज की गई बारिश अकेले 18 मार्च को सामान्य से 137 प्रतिशत या उससे अधिक दर्ज की गई। उससे पहले इसी क्षेत्र में इससे बहुत ज्यादा बारिश हुई थी। भारी बारिश ने सिर्फ फसलों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि इसके कारण मौतें भी हुईं। मैंने पिछले दिनों एक खबर पढ़ी, जिसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में भारी बारिश और ओलावृष्टि के चलते चार महिलाओं और एक बच्चे सहित पांच लोगों की मौत हो गई।
आईएमडी ने अब जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में किसानों को पकी फसलों की कटाई रोकने की सलाह दी है। सलाह में किसानों से यह भी कहा गया है कि वे पहले से ही काटी गई उपज को सुरक्षित स्थानों पर भंडारित कर लें और यदि फसलें खेत में हैं, तो उन्हें तिरपाल से ढक दें।
बेशक किसान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, लेकिन यह सब सिर्फ प्रभावित जिलों के किसानों तक सीमित नहीं है। यह हम सबको प्रभावित करता है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम और अनियमित मौसमी घटनाएं भारत की खाद्य सुरक्षा को संभावित रूप से खतरे में डाल सकती हैं और खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती हैं। और यही सब कुछ नहीं है। जरा इस तथ्य पर विचार करें कि भारत के लोग जो गेहूं का उपभोग करते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा मात्र पांच राज्यों से आता है-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान। बेमौसम और भारी बारिश सहित फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले अनिश्चित मौसम के गंभीर परिणाम हो सकते हैं और उसका असर इन राज्यों से परे भी हो सकता है। इसलिए हमें इन जगहों पर भंडारण सुविधाओं पर बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए। हमने देखा है कि बारिश के पानी में भीगने वाली कटी हुई फसल किसानों को कैसे बर्बाद कर सकती है।
सुधीर पंवार जैसे कृषि विशेषज्ञ सार्वजनिक रूप से फसल के नुकसान का त्वरित मूल्यांकन और किसानों को तत्काल मुआवजे की आवश्यकता के बारे में बोलते रहे हैं, क्योंकि किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा, फसलों के लिए जलवायु लचीलापन विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन आ गया है और यदि हमारी कृषि इसकी अनिश्चितताओं से निपटने में सक्षम नहीं है, तो किसानों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। बाकी हम लोगों पर भी।
इसलिए भी हमें जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) की नवीनतम रिपोर्ट पर अधिक ध्यान देना चाहिए। जलवायु विज्ञान के लिए जिम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था ने हाल ही में एक सिंथेसिस रिपोर्ट जारी की, जो छठे मूल्यांकन चक्र (एआर6 एसवाईआर) की अंतिम रिपोर्ट है।
यह रिपोर्ट सिर्फ शिक्षाविदों और विद्वानों के लिए नहीं है, बल्कि रिपोर्ट के प्रमुख संदेशों को सबको समझने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 'जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं और उससे नुकसान होता है। इसने प्रकृति और लोगों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिसका असर विभिन्न व्यवस्थाओं, क्षेत्रों और वर्गों पर अलग-अलग पड़ता है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले आर्थिक नुकसान का पता कृषि, वानिकी, मत्स्यपालन, ऊर्जा और पर्यटन जैसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में लगाया गया है। इससे व्यक्तिगत आजीविका भी प्रभावित हुई है, जैसे-घरों और बुनियादी ढांचे का विनाश, संपत्ति और आय का नुकसान, मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा की हानि, लिंग और सामाजिक समानता पर प्रतिकूल प्रभाव।'
यह बताता है कि शहरी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन ने मानव स्वास्थ्य, आजीविका और प्रमुख बुनियादी ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है और शहरों में चरम गर्मी में तीव्रता आई है। जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से हर कोई प्रभावित है, लेकिन आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन से प्रेरित चरम मौसमी घटनाओं ने आपूर्ति शृंखलाओं को भी प्रभावित किया है। भारत एक अत्यधिक संवेदनशील स्थान पर है और अभी जुबानी जंग में लगे राजनेताओं को स्थिति की गंभीरता को समझना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा तो बनना ही चाहिए, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के नीति निर्माताओं को आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिसमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, निकासी योजना और संवेदनशील आबादी की रक्षा के लिए बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है। जनता को भी उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह भविष्य में मिलने वाले झटके की कहानी नहीं है, बल्कि यह अभी घटित हो रहा है।