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चीन का नया पैंतरा : पैंगोंग झील के पास नया पुल बनाने की तैयारी, ऐसे में सीमा निर्धारण का नया तंत्र विकसित करना होगा

Fri, 20 May 2022 05:57 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Fri, 20 May 2022 05:57 AM IST
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सार
आज, जैसा कि हम मानते हैं कि चीन स्वीकृत एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर से पीछे हट जाएगा, लेकिन हमें लंबी अवधि के गतिरोध के लिए तैयार रहना चाहिए। चीन के नेता अपनी छवि खराब नहीं होने दे सकते। इसलिए वार्ता और शांति-निर्माण मॉडल के माध्यम से नई दिल्ली के राजनयिक दृष्टिकोण की समीक्षा की जानी चाहिए।
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Chinas new maneuver: Preparing to build a new bridge near Pangong Lake, in such a situation a new system of demarcation will have to be developed
पैंगोंग झील - फोटो : Social media

विस्तार

चीन द्वारा पैंगोंग झील के पास अपने कब्जे वाले क्षेत्र में एक और नया पुल बनाने की जानकारी हैरान करने वाली है। उपग्रह द्वारा ली गई तस्वीर से यह जानकारी सामने आई है। इससे भारतीय सीमा के पास चीन अपने हथियारबंद वाहन और टैंक आसानी से ला सकेगा। गौरतलब है कि इससे पहले भी वह पैंगोंग झील पर एक पुल बना चुका है। करीब 500 मीटर लंबा वह पुल लद्दाख में पैंगोंग झील के उत्तरी तट पर स्थित है, जिस पर चीन ने 1962 में अवैध रूप से कब्जा कर लिया था। जाहिर है, बातचीत के बावजूद चीन अपनी खतरनाक मंशा जारी रखे हुए है। 



थलसेना की पूर्वी कमान के प्रमुख आरपी कलिता ने पिछले ही दिनों यह खुलासा किया था कि चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (पीएलए) अरुणाचल प्रदेश के पास सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अपनी क्षमता बढ़ा रही है। तिब्बत क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के उस पार बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ा काफी काम हो रहा है। भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की ऐसी हरकतों से सवाल उठता है कि आखिर चीन ऐसा क्यों कर रहा है और उसकी मंशा क्या है। इसे समझने के लिए यह देखना होगा कि दांव पर आखिर कौन-कौन से मुद्दे हैं। 


पहला, भारत के उभार को सीमित करने और भारत के साथ अपनी सीमा को अपने हित में निर्धारित करने का लक्ष्य चीन का लंबे समय से रहा है, क्योंकि वह लद्दाख के पूर्वी हिस्सों में कथित सीमा रेखा से परे क्षेत्र पर धीरे-धीरे कब्जा कर रहा है। ऐसा वह इस क्षेत्र में अधिक से अधिक जमीन हथियाने के लिए करता है, ताकि वह अपने महत्वपूर्ण सड़क लिंक (राजमार्ग 219) को और आगे बढ़ा सके, जो सिंकियांग के काशगर को तिब्बत के ल्हासा से जोड़ता है। 

इसके अलावा, अक्साई चिन क्षेत्र गलवां नदी (जहां अभी वे डटे हैं) के उत्तर से काराकोरम दर्रा तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए चीन की बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जहां उन्होंने शक्सगाम घाटी के लिए एक प्रमुख संपर्क मार्ग बनाया है, जिस पर वह 1963 से कब्जा जमाए हुए है। दूसरा, चीन हमेशा से लद्दाख क्षेत्र में ज्यादा जल संसाधनों की तलाश कर रहा है, क्योंकि सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है और लद्दाख से पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) तक जाती है। 

चीन का एजेंडा इस क्षेत्र में अधिक से अधिक पानी तक पहुंच बनाना है, क्योंकि चीन को माइक्रोचिप्स बनाने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता है। चूंकि 30 वर्ग सेमी सिलिकॉन वेफर्स बनाने के लिए दस हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है, इसलिए चीन सिंधु नदी का पानी हासिल करना चाहता है और जिसे अपने भू-रणनीतिक एवं आर्थिक लाभ के लिए पाकिस्तान उसे दे सकता है। वर्ष 2018 में चीन ने अमेरिका, जापान और ताइवान से 230 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के माइक्रोचिप्स का आयात किया था। लेकिन अब वह इसे खुद बनाना चाहता है। 

असल में कश्मीर के पानी पर चीन की नजर 1950 के दशक से ही रही है, इसलिए उसने 1954 में अक्साई चीन पर कब्जा किया था। अब चीन पीओके में सिंधु नदी पर पांच प्रमुख बांधों के वित्तपोषण पर सहमत हो गया है। लगता है कि चीन ने यह मान लिया है कि भारतीय सैनिक उस पर गोली नहीं चलाएंगे, क्योंकि अतीत में इस तरह की घुसपैठ होने पर भारत ने राजनयिक माध्यम से इसे हल करने की कोशिश की थी। लेकिन जब चीनी सैनिक हमारे जवानों, हमारे सड़क बनाने वाले निहत्थे कर्मचारियों, को धमकाएं, तो यह मानक प्रक्रिया नहीं हो सकती कि चीनी हरकतों के बाद हम बातचीत करें और फिर घोषणा करें कि सब कुछ ठीक हो गया है। 

अफसोस की बात यह है कि भारत ने चीन के मोर्चे पर दशकों तक अपनी सीमा के बुनियादी ढांचे को यह सोचकर विकसित नहीं किया था कि सीमाओं पर खराब सड़कें होने से 1962 की तरह आक्रमण होने की स्थिति में भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिकों की पहुंच बाधित होगी! तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है। ध्यान रखना चाहिए कि भारत की सेना अब पहले जैसी नहीं है, जिसे चीन ने 1962 में कुचल दिया था, जब पंडित नेहरू और कृष्णा मेनन ने इसे सामरिक लड़ाई लड़ने की अनुमति नहीं दी थी। 

हालांकि, हेंडरसन ब्रूक्स की रिपोर्ट, जिसमें 1962 में केवल सैन्य पराजय के कारणों को देखा गया था (राजनीतिक विफलताओं को नहीं), देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक रहस्य है। साउथ ब्लॉक में इसकी प्रतिलिपि है और हमारे जनरलों की इस तक पहुंच है, और उन्होंने इससे काफी सबक सीखा है। इसलिए 1967 में नाथू ला पर भारत का सख्त रुख (जिससे कई चीनी और भारतीय सैनिक मारे गए) और फिर सोमडुरुंग चू में चीनी घुसपैठ होने पर 1987 में जनरल सुंदरजी द्वारा सैनिकों के तेजी से एयरलिफ्ट की घटना को दोहराया जा सकता है। 

दोनों ही मामलों में चीन को पीछे हटना पड़ा था। आज, जैसा कि हम मानते हैं कि चीन स्वीकृत एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर से पीछे हट जाएगा, लेकिन हमें लंबी अवधि के गतिरोध के लिए तैयार रहना चाहिए। चीन के नेता अपनी छवि खराब नहीं होने दे सकते। इसलिए वार्ता और शांति-निर्माण मॉडल के माध्यम से नई दिल्ली के राजनयिक दृष्टिकोण की समीक्षा की जानी चाहिए। विशेष रूप से लद्दाख मोर्चे पर सीमा निर्धारण में इससे कोई फायदा नहीं होने वाला है, क्योंकि किस रेखा का पालन करना है, इसको लेकर मतभेद है। 

अब समय आ गया है कि हम सीमा निर्धारण के लिए एक नया तंत्र विकसित करें, क्योंकि कई दौर की बातचीत के बावजूद कोई हल नहीं निकला है। यदि नहीं, तो क्या सख्त रवैये वाली मोदी सरकार चीनी नेता से बात करने के लिए तैयार है? और क्या इससे कारगिल जैसा एक और संघर्ष होगा? इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि चीन तभी आपका सम्मान करेगा, जब आप ताकत के साथ बात करेंगे।

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