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पास-पड़ोस: नेपाल में चीन समर्थक सरकार ने बढ़ाई भारत की कूटनीतिक चुनौती

Thu, 29 Dec 2022 11:04 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 29 Dec 2022 11:04 AM IST
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सार
देउबा के शासन के दौरान दोनों देशों के संबंधों में गतिशीलता दिखी भी, लेकिन भारत विरोधी तत्वों के प्रभुत्व वाली नई सरकार में कुछ भी निश्चित नहीं है। जबकि
चीन को मात देने के लिए भारत और नेपाल के बीच संबंधों को सामान्य बनाना अनिवार्य है।
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China will benefit from capture of Nepali power by anti-India leaders
KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal - फोटो : Nepal Mountain News

विस्तार

भारत विरोधी ताकतों के नेपाली सत्ता पर काबिज होने से रोकने में नेपाली कांग्रेस के विफल होने के बाद अंततः चीन को फायदा होगा, जो भारत के लिए एक बुरी खबर है। चीन ने पिछली ओली सरकार के दौरान ही नेपाल की सड़कों और रेलवे में निवेश शुरू कर दिया था, जिसे प्रचंड के दोस्ताना शासन के दौरान तेज किया जाएगा, जिससे भारत के लिए एक बड़ा सुरक्षा जोखिम पैदा होगा। तराई क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और चीन अपनी परियोजनाओं को गति दे सकता है। नेपाल अपने उभयपक्षीय राजनीतिक रुख से समझौता कर सकता है, जिससे चीन को जबर्दस्त लाभ हो सकता है।



एक पूर्व माओवादी गुरिल्ला पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’, जिन्होंने नेपाल के हिंदू राजशाही के खिलाफ दशक भर लंबे विद्रोह का नेतृत्व किया, नेपाली कांग्रेस से शीर्ष पद छीनने में सफल रहे, क्योंकि नेपाली कांग्रेस में आंतरिक विरोधाभास था। अचानक घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि नेपाली कांग्रेस और सीपीएन के बीच बातचीत पहले प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर अटक गई और प्रचंड ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया, बल्कि उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए अपने धुर विरोधी से हाथ मिला लिया, जो भारत समर्थक ताकतों को हाशिये पर रखना चाहते हैं। भारतीय सेना के वरिष्ठ सेवानिवृत्त जनरलों को लगता है कि नेपाल के साथ भारत 1,800 किलोमीटर की सीमा साझा करता है, जो दोनों तरफ के नागरिकों की मुक्त आवाजाही के लिए खुली है। चीन की विशाल निवेश योजना को नए शासन द्वारा प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे भारत को चिंतित होना चाहिए। चीन भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल करता रहा है और अब नेपाल का भी इस्तेमाल कर सकता है। इससे आईएसआई के आतंकियों को बढ़ावा मिलेगा।


अमेरिका ने चीन को अलग-थलग करने के लिए काठमांडू में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए वित्तीय पहल की थी, जिसे ओली के नेतृत्व में नेपाल सरकार ने अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन बदली हुई राजनीतिक स्थितियों में अमेरिका पीछे हट सकता है, क्योंकि चीन कभी भी अमेरिकी वित्तीय पहल की अनुमति नहीं देगा, जिससे अंततः नेपाल के लोगों का ही नुकसान होगा। शेर बहादुर देउबा की गठबंधन सरकार ने एक अलग रुख अपनाया था, क्योंकि अमेरिका आमतौर पर मुफ्त सहायता या अनुदान के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जबकि चीन की ऋण जाल नीति उधार लेने वाले राष्ट्र को भारी कर्ज में डाल देती है। नेपाल की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए, अमेरिका के मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) ने 2017 में नेपाल के साथ 50 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किया था, ताकि नेपाल के बिजली संचरण बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जा सके और इसकी सड़क के रखरखाव में सुधार किया जा सके, लेकिन पिछली ओली सरकार ने इसे बाधित करने की कोशिश की थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि देउबा सरकार ने भारतीय सेना में 28,000 नेपाली युवकों की भर्ती के लिए अग्निवीर योजना के क्रियान्वयन को रोक दिया था। भारत को उम्मीद थी कि यदि भारत समर्थक देउबा के नेतृत्व वाला गठबंधन दोबारा सत्ता में आएगा, तो इसे लागू किया जा सकता है। लेकिन अब यह अनिश्चित है कि नेपाल में जनता का दबाव प्रचंड और सत्ता में उनके भागीदारों को अग्निवीरों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजबूर कर सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो दोनों देशों के संबंधों में और गिरावट आएगी।

अब नेपाल के कम्युनिस्ट चीन के नियंत्रण में होंगे, जो भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। ऐसा तब भी देखा गया था, जब पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने नेपाल का नया नक्शा तैयार करके भारत को शर्मिंदा किया था और भारत के कुछ क्षेत्रों के नेपाल में होने का दावा किया था। ओली ने सीमा सड़क संगठन द्वारा कैलास पर्वत तक सड़क के निर्माण पर भी आपत्ति जताई थी, जिसका बाद में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उद्घाटन किया था। नए सत्तारूढ़ गठबंधन में प्रचंड के हावी होने की संभावना है, जो चीन और भारत से समान दूरी का विकल्प चुन सकते हैं, हालांकि कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण उनका स्वाभाविक झुकाव चीन की ओर होगा।

प्रचंड और ओली का गठबंधन भारत के लिहाज से घातक हो सकता है, हालांकि जब प्रचंड की पार्टी ने करीब एक वर्ष तक गठबंधन सरकार के सहयोगी के रूप में शासन किया था, तब प्रचंड भारत के प्रति नरम थे।  चीन ने नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल देकर ओली गुट को अपने पक्ष में कर लिया था, जब 2017 में नेपाली कांग्रेस को हराकर ओली सत्ता में आए थे। अब नई सरकार को चीन के साथ पुराने संबंधों को मजबूत करने और सुधारने में कोई बाधा नहीं आएगी, जो प्रचंड-ओली गठबंधन का सबसे प्रमुख कार्य होगा। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ओली शासन के दौरान दो बार नेपाल का दौरा किया था, जिसके परिणामस्वरूप अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता की घोषणाएं हुई थीं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चीन द्वारा नेपाल के तराई क्षेत्र में भारी निवेश करने का दोहरा मकसद है। बड़े पैमाने पर निवेश से उसे अच्छा रिटर्न मिलेगा और इस तरह नेपाल को भारत से दूर किया जा सकता है। यह नेपाल में चीन के पक्ष में राजनीति माहौल बनाने में भी मदद करता है। फिर भारत के साथ नेपाल की खुली सीमा से बड़े पैमाने पर भारत में चीनी सामानों की तस्करी हो सकती है। प्रचंड चीन को नाराज नहीं कर सकते, हालांकि चीन नेपाल को कर्ज के जाल में फंसा रहा है। पूर्व चीनी राजदूत ने ओली सरकार को बचाने के लिए प्रचंड गुट पर एकजुट होने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की थी, जब विपक्ष ने संसद में ओली की हार सुनिश्चित की थी, लेकिन चीन की वह कोशिश नाकाम हो गई थी। अब दोनों गुट एकसाथ आ गए हैं, जिससे शी जिनपिंग खुश होंगे तथा भारत के लिए और परेशानी खड़ी करेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक छह बार नेपाल का दौरा किया है, जो तनावपूर्ण संबंधों को सहज बनाने की भारत की उत्सुकता को दर्शाता है। देउबा के अल्पकालिक शासन के दौरान दोनों देशों के संबंधों में गतिशीलता दिखी भी, लेकिन भारत विरोधी तत्वों के प्रभुत्व वाली नई सरकार में कुछ भी निश्चित नहीं है। जबकि चीन को मात देने के लिए भारत और नेपाल के बीच संबंधों को सामान्य बनाना अनिवार्य है।    

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