फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   China's moon mission

चांद पर जाने की नई ललक

Tue, 31 Dec 2013 08:08 AM IST
मुकुल व्यास
मुकुल व्यास Updated Tue, 31 Dec 2013 08:08 AM IST
विज्ञापन
China's moon mission

चांद पर चीन के चांग-ई 3 मिशन की सफलता ने पृथ्वी के इस कुदरती उपग्रह के प्रति वैज्ञानिकों के मन में एक नई दिलचस्पी पैदा कर दी है। अंतरिक्ष के पुराने दिग्गज और नए खिलाड़ी 2020 तक करीब एक दर्जन रोबोटिक यान और रोवर चांद पर भेजने की तैयारी कर रहे हैं। उभरते हुए अंतरिक्ष खिलाड़ियों की सूची में दक्षिण कोरिया शामिल है, जिसने 2020 तक वहां अपना मिशन भेजने की योजना बनाई है। कुछ निजी कंपनियां भी पहली बार चांद पर अपने यान उतारने की कोशिश करेंगी।

विज्ञापन


चंद्रमा पर पानी खोजने वाले चंद्रयान-1 मिशन की सफलता के बाद भारत अब 2017 तक अपना दूसरा मिशन, चंद्रयान -2 भेजना चाहता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, इस मिशन में एक लैंडर, एक रोवर और एक ऑर्बिटर को शामिल किया जाएगा। इस मिशन के जरिये नई टेक्नोलॉजी को परखा जाएगा और नए प्रयोग किए जाएंगे। पहिये वाली रोवर चंद्रमा की सतह पर चहलकदमी करेगी और वहां की मिट्टी या चट्टान के नमूने एकत्र करके मौके पर ही उनका रासायनिक विश्लेषण करेगी। चांद से एकत्र सारे आंकड़े चंद्रयान -2 के ऑर्बिटर के जरिये पृथ्वी को सम्प्रेषित किए जाएंगे। भारत का यह मिशन बहुत ही चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि रूस के पीछे हटने के बाद इसरो को अकेले ही इसे अंजाम देना होगा।
विज्ञापन


चंद्रमा सुदूर अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण अड्डा बन सकता है। उसके बहुमूल्य खनिज किसी दिन पृथ्वी के काम भी आ सकते हैं। समझा जाता है कि चांद पर यूरेनियम, टिटेनियम और दूसरी बहुमूल्य धातुओं के भंडार हैं। वहां सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए भी समुचित अवसर हैं। कुछ चीनी सैन्य विशेषज्ञ चांद पर एक ऐसा सामरिक अड्डा बनाने का भी ख्वाब देख रहे हैं, जहां से पृथ्वी पर शत्रुओं के ठिकानों पर मिसाइल दागी जा सके। पिछले दिनों चंद्रमा पर उतरने वाले चीन के युतु रोवर का मुख्य मकसद वहां के खनिज भंडारों की टोह लेना है। उसकी छानबीन से चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में भी नई जानकारी मिल सकती है। चंद्रमा के विकास को समझ कर हम अपनी पृथ्वी की उत्पत्ति की गुत्थियों को भी सुलझा सकते हैं। समझा जाता है कि करीब 4.5 अरब वर्ष पहले मंगल के आकार के एक पिंड के पृथ्वी से टकराने से उत्पन्न मलबे से चंदमा की उत्पत्ति हुई थी। बहुत से वैज्ञानिक चांद को पृथ्वी का ही हिस्सा मानते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


भविष्य में चंद्रमा पर भेजे जाने वाले अधिकांश मिशनों में उसके ध्रुवों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अभी कोई लैंडर चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में नहीं पहुंचा है, लेकिन परिक्रमा यानों से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि दोनों ध्रुवों की चट्टानों और छायादार क्रेटरों में अरबों टन बर्फ मौजूद है। इस बर्फ और उसमें जमा पदार्थों के विस्तृत विश्लेषण से हमें इस सवाल का जवाब मिल सकता है कि पृथ्वी का पानी कहां से आया और जीवन निर्माण की सामग्री कहां से आई। जलयुक्त चंद्रमा भविष्य के भावी रोबोटिक और मिशनों के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है। इसका उपयोग विकिरण से बचाव के लिए भी किया जा सकता है। रॉकेट ईंधन में इस्तेमाल के लिए पानी को विखंडित कर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन निकाली जा सकती है। अभी ईंधन की वजह से रॉकेट का वजन बहुत भारी हो जाता है। ईंधन का स्रोत चांद पर ही उपलब्ध होने से भविष्य में बड़े मानव मिशनों की प्लानिंग करना आसान हो जाएगा। यदि हमें मंगल या कहीं आगे जाना है, तो हमें पृथ्वी से ईंधन ले जाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।


अमेरिका की शेकलटन एनर्जी कंपनी चांद पर रोबोटों और मानव खनिकों की टीमें भेजना चाहती है, जो चांद पर मौजूद बर्फ से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन निकालकर उसे ईंधन में बदलना चाहती है। कुछ वैज्ञानिकों को संदेह है कि कोई निजी कंपनी इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए धन जुटा पाएगी। लेकिन भावी मिशनों की सफलता के लिए चांद पर ईंधन के खनन के महत्व को सभी समझते है। नासा को छोड़ कर अधिकांश अंतरिक्ष एजेंसियां चांद पर मानव उतारना चाहती हैं। इस दिशा में चीन आगे निकल सकता है। हो सकता है वह 2025 के बाद वहां मानव मिशन भेजने में कामयाब हो जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed