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चीन का घटता दबदबा
हाइरोको तबुची
Updated Mon, 03 Aug 2015 08:17 PM IST
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पच्चीस वर्ष पहले नि मेइजुआन चीन के हांगझोऊ शहर की एक विशाल कपड़ा फैक्टरी में कताई मशीनों पर काम करके हर महीने 19 डॉलर कमाती थीं। अब साउथ कैरोलिना में बीते अप्रैल में खुले कीर समूह के कॉटन मिल में नि अमेरिकी श्रमिकों को उसी काम का प्रशिक्षण दे रही हैं, जो वह करती थीं।
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पूर्व के कम लागत वाले देशों में कभी बड़े पैमाने पर सस्ते में कपड़ा तैयार करने वाले उत्पादक अब अमेरिका में अपनी फैक्टरियां खोल रहे हैं। कभी कम और ज्यादा लागत वाले देशों के बीच जो सुस्पष्ट विभाजन रेखा थी, उस हकीकत को खत्म कर देने का यह एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसके बारे में एक दशक पहले कम ही लोगों ने सोचा होगा।
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वर्षों से बढ़ती मजदूरी, बिजली की ऊंची कीमत और परिवहन की बढ़ती लागत के साथ-साथ रुई के आयात पर सरकार द्वारा तय की गई सीमा के चलते चीन में वस्त्र उत्पादन एक गैर लाभप्रद उद्यम बन गया है। जबकि इसी दौरान अमेरिका में उत्पादन लागत अपेक्षाकृत ज्यादा प्रतिस्पर्धी हुई है। लैंकास्टर काउंटी में, जहां इंडियन लैंड स्थित है, कीर को कम मजदूरी पर भी काम करने को तैयार लोग मिले। साथ ही, वहां सस्ती और प्रचुर जमीन के अलावा किफायती ऊर्जा है। वहां भारी सब्सिडी पर रुई भी उपलब्ध है।
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अमेरिका में काउंटी से लेकर राज्य और संघीय सरकार के राजनेताओं में मैन्युफैक्चरिंग से संबंधित रोजगार को वापस लाने के लिए कीर को अनुदान और कर में छूट देने की होड़ लगी है, जिसके बारे माना जाता था कि यह हमेशा के लिए खत्म हो गया।
अमेरिका के नेतृत्व में एक व्यापक प्रशांत व्यापार समझौते की संभावना ने भी, जिसमें चीन शामिल नहीं है, चीनी धागा निर्माता कंपनियों को अमेरिका में अपने पांव पसारने के लिए प्रेरित किया है, ताकि ऐसा न हो कि आकर्षक अमेरिकी बाजार से वे वंचित रह जाएं। कीर की 21.8 करोड़ डॉलर की स्पिनिंग मिल रुई से काते धागों को पूरे एशिया के वस्त्र निर्माताओं को बेचता है। हालांकि कीर अब भी अधिकांश धागे की कताई चीन में ही करता है और कच्चा माल अमेरिका से मंगाता है, लेकिन धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन आ रहा है।
कीर के अमेरिका में आने का कारण क्या है? हाल ही में अमेरिका के दौरे पर आए कीर के चेयरमैन झु शैनक्विंग ने इसका जवाब दिया कि प्रोत्साहन, जमीन, व्यावसायिक माहौल और सस्ता श्रम इसकी प्रमुख वजह है। वह आगे कहते हैं, चीन में धागा निर्माण उद्योग घाटे में चल रहा है, जबकि अमेरिका में स्थिति अलग है।
1970 के दशक की शुरुआत में जबसे वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यावसायिक रिश्ते फिर से कायम हुए, अमेरिका ज्यादातर भारी व्यापार घाटे में रहा, क्योंकि सस्ते इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान और अन्य चीनी वस्तुओं की खरीद में अमेरिकियों ने अरबों डॉलर गंवा दिए। पर बढ़ती श्रम लागत और ऊर्जा कीमतों के कारण मैन्युफैक्चिरिंग के क्षेत्र में चीन की प्रतिस्पर्धी क्षमता खत्म हो रही है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में चीन में मजदूरी पिछले एक दशक में तीन गुना बढ़ी है। वर्ष 2004 में जो मजदूरी 4.35 डॉलर प्रति घंटे थी, वह पिछले वर्ष अनुमानतः 12.47 डॉलर प्रति घंटे हो गई। जबकि अमेरिका में इसी क्षेत्र में मजदूरी 2004 से 30 फीसदी से भी कम बढ़ी है और वह 22.32 डॉलर प्रति घंटा है। हालांकि अमेरिका में इसकी भरपाई प्राकृतिक गैसों की कम कीमत, सस्ते कपास और सब्सिडी से हो जाती है।
अमेरिका की तुलना में चीन में धागे की उत्पादन लागत 30 फीसदी ज्यादा है। बोस्टन कंसल्टिंग के एक वरिष्ठ साथी ने बताया कि हर कोई समझता है कि चीन हमेशा सस्ता रहेगा, लेकिन चीजें कल्पना से भी ज्यादा तेजी से बदल रही हैं। चीन में मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती लागत के कारण कुछ कंपनियां बांग्लादेश, भारत, वियतनाम जैसे कम लागत वाले देशों का रुख कर रही हैं। कई मामलों में तो इस पलायन को स्वयं चीन ने ही बढ़ाया है, जो आक्रामक तरीके से अपनी मैन्युफैक्चरिंग का आधार कहीं और स्थापित करना चाहता है।
न्यूयॉर्क स्थित रिसर्च कंपनी रोडियम ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में अमेरिका ने इन पलायन करने वाली कंपनियों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। 2004 से 2014 के बीच चीनी कंपनियों ने अमेरिका में नई परियोजनाओं एवं अधिग्रहण पर 46 अरब डॉलर का निवेश किया है। इनमें से ज्यादातर निवेश पिछले पांच वर्षों में हुआ है। पर ऐसा नहीं है कि अमेरिका के वस्त्र उद्योग में सिर्फ चीन से ही निवेश हो रहा है। पिछले वर्ष भारत की एक प्रमुख वस्त्र निर्माता कंपनी श्रीवल्लभ पित्तई ग्रुप ने जॉर्जिया के सिल्वानिया में सात करोड़ डॉलर का निवेश किया, जो पिछले चार दशकों में इस क्षेत्र का पहला मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है।
साउथ कैरोलिना में कीर के आगमन का इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता था। वर्ष 2007 में स्प्रिंग्स इंडस्ट्रीज ने, जिसकी कॉटन मिल एक समय दुनिया में सबसे बड़ी थी, जब यहां अपना आखिरी प्लांट बंद किया था, तब से कारीगरों की एक पीढ़ी अपना रोजगार खो चुकी है। लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार घटने का लाभ यह हुआ है कि लेंकास्टर काउंटी जैसी जगहों में लोग कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं। वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों ने पाया है कि साउथ कैरोलिना जैसी जगहों में यूनियनें भी नहीं हैं।
हालांकि अमेरिका आकर कीर ने जोखिम भी उठाया है। डॉलर के मजबूत होने से अमेरिका में भी उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसके अलावा एरिजोना और कैलिफोर्निया में पानी की कमी से कपास का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, कपास पर दी जाने वाली सब्सिडी पर तो अभी से खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा दो संस्कृतियों का फर्क भी दिखता है। नि अमेरिकी कामगारों की सुस्ती पर शिकायत करती हैं। उनके मुताबिक, चीन में सुस्त कामगारों के वेतन रोक दिए जाते हैं, लेकिन अमेरिका में लोगों को अनुशासित करना मुश्किल है। हालांकि नि को उम्मीद है कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।