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कूटनीति: साझा सैन्याभ्यास के निहितार्थ, चिंताजनक है चीन और पाकिस्तान की कदमताल
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China-Pakistan joint naval exercise
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सोशल मीडिया
विस्तार
चीन और पाकिस्तान ने विगत 11 से 17 नवंबर तक अरब सागर में समुद्र संरक्षक नाम से संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किया। इस युद्धाभ्यास के लिए चीन ने अपने बड़ी क्षमता वाले एयरक्राफ्ट करियर और नौसेना के लड़ाकू जहाजों को पनडुब्बियों के साथ कराची बंदरगाह पर भेजा था। इनके साथ पाकिस्तान की पूरी नौसेना ने इस अभ्यास में हिस्सा लिया। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य हिंद, अरब तथा प्रशांत महासागरों में अपनी गश्त बढ़कर चीन और पाकिस्तान द्वारा अपना दबदबा स्थापित करना था। चीन ने निश्चय किया है कि इसके बाद दोनों देशों की नौसेना पूरे साल इन समुद्रों की चौकसी के लिए पेट्रोलिंग करेगी।
वर्ष 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित होने के बाद माओ ने विस्तारवादी नीति अपनाते हुए अपने 16 पड़ोसी देशों की भूमियों पर अवैध कब्जा किया था। इसी के अंतर्गत चीन ने दक्षिणी चीन सागर और हिंद महासागर में अन्य देशों के नौ द्वीपों पर कब्जा करके इनमें अपने नौसेना के ठिकाने स्थापित कर दिए। अपनी विस्तारवादी नीति के अनुसार चीन अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं और उनके व्यापार पर भी कब्जा करना चाहता है, जैसा कि उसने श्रीलंका और पाकिस्तान में किया है।
आज के युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि दुश्मन देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर हमला करके परोक्ष रूप से भी लड़ा जा सकता है, जैसा कि चीन ने श्रीलंका और बहुत से अफ्रीकी देशों के साथ किया है, और अब पाकिस्तान में अपनी साझा आर्थिक गलियारा योजना के रूप में कर रहा है, जो उसकी बहुचर्चित बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव का ही हिस्सा है।
अपनी विस्तारवादी नीति के कारण चीन ने दक्षिणी चीन, हिंद और प्रशांत महासागर के बहुत से देशों के द्वीपों पर कब्जा किया है, जिनमें वियतनाम, मंगोलिया, कजाकिस्तान, ताइवान और इंडोनेशिया का नाम आता है। वर्ष 1985 से चीन और जापान के बीच एक द्वीप पर विवाद चल रहा है, जिस पर चीन अपना दावा कर रहा है।
चीन द्वारा दक्षिणी चीन सागर और हिंद महासागर के बहुत से क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय यातायात नियमों की अक्सर धज्जियां उड़ाई जाती है। इसी को देखते हुए हमारे नौसेना प्रमुख ने पिछले दिनों कहा था कि इन समुद्रों में व्यवस्थित और सुचारू यातायात व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो गया है। उनका इशारा चीन की तरफ ही था।
हिंद महासागर का तटीय देश होने के कारण पूरे विश्व को भारत से आशा है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में सभी को सुरक्षा देने वाला क्षेत्र बने। इस कारण भारत ने भी अपनी नौसैनिक तैयारी पर पूरा जोर दिया है। इसके लिए भारतीय नौसेना में ड्रोन तथा आधुनिक पनडुब्बियों को शामिल किया गया है। चीन और भारत की जमीनी सीमाओं पर होने वाले टकरावों को देखते हुए हो सकता है भविष्य में महासागरों में दोनों के गश्ती दलों में टकराव हो। इससे दोनों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका है।
इस समय पाकिस्तान अपनी आर्थिक व्यवस्था की बदहाली के कारण पूरी तरह चीन के कब्जे में आ चुका है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह की तरह पाकिस्तान ने भी अपने ग्वादर बंदरगाह को चीन के हवाले कर दिया है, जिस कारण दक्षिणी चीन सागर के साथ-साथ अब चीन की नौसेना की गतिविधियां भारत के आसपास भी उतनी ही बढ़ गई हैं।
चीन की उपरोक्त गतिविधियों को देखते हुए कुछ दिन पहले दिल्ली में आसियान देशों के रक्षा मंत्रियों की विशेष बैठक बुलाई गई थी, जिसमें सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्र में यातायात भयमुक्त और निर्धारित नियम-कानून के अनुसार सुगमता से चलना चाहिए। इसको देखते हुए चीन को अपनी विस्तारवादी नीतियों पर अंकुश लगाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्था रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी हिंसा पर अभी तक रोक नहीं लगा पाई है। तिस पर चीन की आक्रामक गतिविधियां विश्व शांति के लिए बड़ा खतरा हैं। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र को कुछ न कुछ तो करना ही होगा।