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चीन को सबक जरूरी

Tue, 23 Jun 2020 04:14 AM IST
Ashwani Mahajan अश्विनी महाजन
Updated Tue, 23 Jun 2020 04:14 AM IST
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China needs lessons
प्रतीकात्मक तस्वीर

आज दुनिया भर के लगभग सभी देश चीन से आए वायरस से जूझ रहे हैं। दुनिया में एक मत यह भी है कि चीन अपनी प्रयोगशाला में बायोलॉजिकल युद्ध की दृष्टि से इस वायरस पर शोध कर रहा था, जो अचानक लीक हो गया और वह चीन के वुहान शहर से होता हुआ पूरी दुनिया में फैल गया।


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यदि इसे चीन का षड्यंत्र न माना जाए, तो भी यह तो सर्वविदित ही है कि चीन ने इसकी भयावहता को दुनिया से छिपाया और अपनी वैश्विक विमान सेवाओं को जारी रखते हुए जान-बूझकर संक्रमित लोगों को दुनिया भर में पहुंचा दिया।

चीन के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से दुनिया भर में न केवल लोग स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं, बल्कि एक भयंकर आर्थिक संकट का भी उन्हें सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में हालांकि दुनिया भर के लोगों ने अपनी सामान्य आवश्यकताओं के अलावा सभी खरीद स्थगित कर रखी है, लेकिन कुछ जरूरी सामान की खरीद के लिए विश्व अब भी चीन पर ही निर्भर दिखाई दे रहा है।

इसका कारण यह है कि पिछले लगभग 20 वर्षों में जब से चीन डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना है, उसने अपने सस्ते सामान के द्वारा दुनिया भर के बाजारों पर कब्जा कर लिया है। चीन ने इस बीच अपनी सामरिक शक्ति को भी विस्तार दिया है। वर्ष 2001 के बाद से उसने अपनी विस्तारवादी नीति को तेजी से बढ़ाना शुरू किया है।

चीन के अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद हैं। हालांकि अमेरिका ने पहले से ही चीन की धोखेबाजीपूर्ण व्यापार नीति के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ रखा है और उसकी हुआवे जैसी कंपनियों को भी अपने टेलीकॉम क्षेत्र से बाहर कर रहा है। कोरोना संकट के बाद तो लगभग हर देश चीन से किनारा कर रहा है।

भारत समेत कई अन्य यूरोपीय देशों ने भी चीन की घटिया और नकली टेस्ट किट्स की खेपों को वापस भेज कर अपनी नाराजगी स्पष्ट कर दी है। जहां अमेरिका का चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध बदस्तूर जारी है, उधर यूरोपीय समुदाय के देशों ने भी चीन पर विशेष आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है।

यूरोपीय समुदाय के देश यह मानते हैं कि चीन अपने निर्यातों पर प्रोत्साहन राशि देकर उनको सस्ता कर यूरोप में भेजता है, जिससे उनके उद्योगों को नुकसान हो रहा है। पाकिस्तान द्वारा हथियाई गई कश्मीर की भूमि पर चीन ने भारत के विरोध के बावजूद चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के नाम से सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बना दिया है, जिसके कारण भारत ने चीन की विस्तारवादी बेल्ट रोड योजना का बहिष्कार और विरोध किया।  उसके बावजूद पहले 67 देश उस में भागीदार बन गए थे।

लेकिन उनमें से कई देश तो पहले ही चीन के विस्तारवादी मंसूबों को समझकर उससे कन्नी काटने लगे थे। मलयेशिया ने पहले से ही अपने परियोजना को काफी छोटा कर दिया है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को हथिया लेने के बाद श्रीलंका की जनता और सरकार चीन से अत्यधिक नाराज है। मालदीव, मंगोलिया, मोंटेगरो, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, लाओस समेत कई देश चीन के कर्ज जाल में फंस चुके हैं।

इटली सरीखे यूरोपीय देश भी, जो अमेरिका के विरोध के बावजूद, पहले बेल्ट रोड योजना में शरीक हो गए थे, चीन से आने वाले कामगारों से संपर्क के कारण जो कोरोना महामारी की चपेट में आ गए, अब चीन के द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जाने पर पुनर्विचार करने लगे हैं।

अफ्रीकी देश, लेटिन अमेरिकी देश और ऑस्ट्रेलिया, सभी अब चीन से खफा हैं। भारत समेत पूरी दुनिया के देश चीन के माल का बहिष्कार कर रहे हैं। चीन दुनिया भर में जनता के गुस्से, बहिष्कार और वहां की सरकारों के चीन के प्रति बढ़ते विरोध के चलते भारी चिंता में है।

चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के लेख इस और स्पष्ट इंगित कर रहे हैं। भारत में अब भी कुछ लोग हैं, जो यह मानते हैं कि चीन का बहिष्कार फलीभूत नहीं हो पाएगा, क्योंकि हमारी चीन पर अत्यधिक निर्भरता है।

मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा उद्योगों के कच्चे माल (एपीआई), स्वास्थ्य उपकरण, केमिकल्स, धातुओं, खिलौनों, उद्योगों के लिए कलपुर्जों और कच्चे माल समेत हमारे देश की निर्भरता चीन पर इतनी अधिक है कि चीन का बहिष्कार संभव नहीं, और चीन के आयात पर रोक भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती है।

उनका यह भी कहना है कि चीन के माल का पूर्ण बहिष्कार कर भी दिया जाए, तो भी उससे चीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, क्योंकि उसके कुल निर्यात 2,498 अरब डॉलर के मुकाबले भारत द्वारा उसको निर्यात मात्र 68.2 अरब डॉलर ही हैं यानी मात्र 2.7 फीसदी।

हमें समझना होगा कि हमारे देश से चीन को कुल 50 अरब डॉलर का व्यापार अतिरेक प्राप्त होता है, जो उसके कुल व्यापार अतिरेक (430 अरब डालर) का 11.6 प्रतिशत है। साथ ही, नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका का चीन से व्यापार घाटा 360 अरब डॉलर का है जो चीन के व्यापार अतिरेक का 83 फीसदी से ज्यादा है।

यदि भारत और अमेरिका मिलकर चीन के माल को अपने देशों से बाहर कर दें, तो चीन का सारा व्यापार अतिरेक समाप्त हो जाएगा। भारत की क्षमता को कम आंकना भी सही नहीं है। आज से 15 साल पहले तक दवाओं के कच्चे माल (एपीआई) का 90 फीसदी भारत में ही बनाया जाता था, लेकिन चीन द्वारा डंपिंग के कारण हमारी एपीआई इंडस्ट्री प्रभावित हुई।

उसे पुनः स्थापित करने हेतु सरकार ने 3,000 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा पहले से ही कर दी है। चीन से आने वाले कई उत्पाद जीरो टेक्नोलॉजी के हैं, जिनका उत्पादन भारत में तुरंत शुरू किया जा सकता है। हाल ही में मात्र दो महीनों में भारत पीपीई किट्स, टेस्टिंग किट्स समेत कई मामलों में आत्मनिर्भर हो चुका है और अभी तक 50,000 से ज्यादा वेंटिलेटर भी भारत में तैयार हो चुके हैं।

चीन से आने वाले उत्पादों की कीमत के आधार पर ही हम उसके आयातों को अनुमति दें, यह सही नहीं होगा। उसके आयातों के कारण देश में उद्योगों के पतन, बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी पर भी विचार करना होगा। सस्ते के नाम पर हम अपनी अर्थव्यवस्था को गर्त में नहीं डाल सकते। करोना के बाद आज एक चुनौती आई है, उसे अवसर में बदलने का नाम ही भारत का आत्मनिर्भरता अभियान है। (लेखक स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक हैं।)

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