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चीन 2.0 से एआई तक, बदलता शक्ति-संतुलन: दुनिया के मानक क्या चीन तय करेगा
Thu, 10 Sep 2026 07:42 AM IST
नितिन गौतम
रहीस सिंह, वैदेशिक मामलों के जानकार
रहीस सिंह, वैदेशिक मामलों के जानकार
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 10 Sep 2026 07:42 AM IST
सार
चीन के विकास का बुलबुला फटने की भविष्यवाणियां कोई आज से नहीं हो रही हैं। पर, अब एआई में चीन जिस तरह से छलांग लगा रहा है, उसे देखते हुए वह दिन दूर नहीं, जब वह वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी बदलने की कोशिश करेगा। असल समस्या की शुरुआत यहीं से होगी।
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चीन के विकास ने चौंकाया।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पश्चिमी दुनिया के आकलन, निष्कर्ष या घोषणाएं कितनी सच होती हैं और कितनी संदिग्ध, यह कहना मुश्किल है। फिर चाहे वह वैश्वीकरण को लेकर की गई घोषणाएं हों, सोवियत संघ के पतन के बाद ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा हो या चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर निकाले गए निष्कर्ष हों। हम देख रहे हैं कि वैश्वीकरण अब सबसे बुरे दौर में है, उदारवाद की जगह संरक्षणवाद आ चुका है और जिस इतिहास के अंत की बात की जा रही थी, वही आज उसके सामने चुनौती बनकर खड़ा है। सोवियत संघ नहीं रहा, पर रूस पूरे पश्चिम के लिए चुनौती बना हुआ है। ऐसे में, चीन को लेकर जो भविष्यवाणियां की गई थीं, उन्हें फिर से देखने की जरूरत है।
जब से चीन की आर्थिक चमत्कार की कहानी शुरू हुई, तभी से उसके अंत की भविष्यवाणियां भी होने लगी थीं। लेकिन, चीन विकास के मानक तय करने वाली दुनिया को ही अपना पिछलग्गू बनाने में सफल हो गया। आज यूरोप सहित पश्चिम के अधिकांश देश अमेरिका के बजाय चीन की तरफ देख रहे हैं। आखिर इस विरोधाभास के पीछे का सच क्या है?
उस समय इन धारणाओं के पीछे सोच यह थी कि पश्चिम उन्नत विनिर्माण क्षेत्र का अगुआ है और उस पर अपना प्रभुत्व बनाए रखेगा, जबकि चीन सस्ते श्रम आधारित विनिर्माण-जैसे टीवी असेंबल करने तक सीमित रहेगा। लेकिन, चीन दुनिया की फैक्टरी बन गया। दरअसल, डेंग शियाओपिंग के इस विचार के साथ चीन ने आगे बढ़ना शुरू किया कि ‘बिल्ली काली है या सफेद, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क तो इस बात से पड़ता है कि वह चूहा पकड़ पाती है या नहीं।’ सच में अर्थव्यवस्था का मॉडल तो वही अच्छा, जो अपने लोगों की जेब और पेट भरे। इसमें समय लगना था। यही कारण है कि पश्चिम की सोच गलत निकली और चीन फर्राटा मार गया।
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यह प्रक्रिया दो अलग-अलग चरणों में हुई। यह बात सही है कि चीन ने पहले चरण में कम लागत वाले विनिर्मित सामान पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां सस्ती श्रम लागत ने प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान की। उस दौर में अधिक मुनाफे की तलाश में कंपनियां पूर्वी एशिया की ओर चली गईं। इस तरह से ‘चाइना 1.0’ पूरा हुआ। ब्रिटेन के एक अखबार में एक लेखक ने लिखा कि इस तरह से चीन का पहला औद्योगिक चरण न हुआ होता, तो डोनाल्ड ट्रंप शायद न्यूयॉर्क के रियल एस्टेट डेवलपर ही बने रहते और ब्रेग्जिट शायद कभी हुआ ही नहीं होता।
संभवतः, चीन अपनी क्षमताओं को उसी दौर में पहचान गया था, जब पश्चिमी संस्थान उसके भविष्य की रेखाओं को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। चीन केवल कम लागत वाली उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादक बने रहने को तैयार नहीं था। उसे कुछ बड़ा करना था। वह यह मिथक तोड़ने में सफल हुआ कि चीन उच्च-स्तरीय विनिर्माण में प्रतिमान कायम नहीं कर सकता। उसने इस क्षेत्र में भारी निवेश किया और ‘चाइना 2.0’ में पश्चिम के भ्रम को तोड़ दिया कि चीन हमेशा एक विकासशील देश ही बना रहेगा।
न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार थॉमस फ्रीडमैन ने अपनी पुस्तक वर्ल्ड इज फ्लैट में लिखा है कि अपने शंघाई दौरे के समय उन्होंने एक चीनी बोर्ड पर लिखा देखा था-‘वर्ल्ड इज सिंक्रोनाइज्ड।’ दरअसल, यह चीन की महत्वाकांक्षा थी और वह उसे हासिल करने में सफल रहा। गौर से देखिए, सोलर पैनलों का बाजार चीन ने अपने कब्जे में कर रखा है। बैटरियों और इलेक्ट्रिक वाहनों में वह दुनिया का अग्रणी देश बन चुका है। आपको हर जगह चीनी उत्पाद दिख जाएंगे। हालांकि, चीनी अर्थव्यवस्था में कई बार पूंजी और रियल एस्टेट के क्षेत्र में बुलबुले उठते भी दिखे हैं। बीच-बीच में वह भरोसे की कमी की चुनौती से भी जूझता रहा है। फिर भी, आज वह पश्चिम को पीछे छोड़ने या अमेरिका को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में पहुंच गया है।
इसमें कोई शंका नहीं कि चीन का आर्थिक मॉडल निवेश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है और इसमें भारी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है। चीन घरेलू स्तर पर जितना उपभोग कर सकता है, उससे कहीं अधिक सामान बनाता है। फलतः चीन केवल उसी दर से विकास जारी रख सकता है, जो बेरोजगारी को सामाजिक अशांति में बदलने से रोकती हो। यदि वह अपने अतिरिक्त माल को बाकी दुनिया में नहीं खपा पाया, तो उसकी अर्थव्यवस्था डगमगाएगी। लेकिन, अभी ऐसा दिख नहीं रहा है।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तगड़ी पैठा बना चुकी है। इतनी कि एक अमेरिकी अखबार ने यह लिखते हुए चिंता जाहिर की है कि एनवीडिया के 50 खरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली पहली कंपनी बनने की तमाम चर्चाओं, एलन मस्क की स्पेसएक्स की लिस्टिंग और एंथ्रोपिक तथा ओपनएआई के संभावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के बीच एक बात स्पष्ट है, एआई अब मुख्यतः शेयर बाजार की कहानी नहीं रह गया है। यह कर्ज की कहानी है और संघर्ष के नए संभावित क्षेत्रों की बेहद अमानवीय कहानी भी है। यदि एआई से पैदा होने वाली नौकरियों के महाविनाश की आशंकाओं को एक तरफ रख दें, तो कोई नहीं जानता कि सोचने वाली मशीनों का यह युग कितना प्रभावशाली साबित होगा। अब असल प्रश्न यह है कि इस तकनीक पर जिसने कब्जा कर लिया, वह दुनिया में कैसा तांडव करेगा। अर्थव्यवस्थाओं को कर्ज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहारे सरपट दौड़ाने का कार्य कितना जोखिमपूर्ण होगा, यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन, असल बात यह है कि एआई प्रतिस्पर्धा में अगर चीन आगे निकल गया, तो क्या होगा?
जुलाई में चीनी स्टार्टअप मूनशॉट एआई ने अपना ‘कीमी के3’ मॉडल लॉन्च किया और तत्काल सफलता हासिल कर ली। लॉन्च के महज दो दिन बाद ही कंपनी को नए सब्सक्रिप्शन बंद करने पड़े। बताया गया कि मांग उसकी कंप्यूटिंग क्षमता से कहीं अधिक हो गई थी। यह आश्चर्यजनक नहीं था, क्योंकि ‘कीमी के3’ को ऐसे पेश किया गया कि वह अमेरिका के नवीनतम एआई मॉडलों की बराबरी कर सकता है और वह भी बिना किसी शुल्क के। यह अचानक घटी घटना नहीं है। यहां बीजिंग एआई नीति के तीन प्रमुख आयाम दिख रहे हैं। पहले तकनीकी मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में पहुंचना, फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में तकनीकी पैठ और अंत में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मानक तय करना। यदि चीन इसमें सफल हो गया, तो वह न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को बाधित करने में सफल हो जाएगा, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी बदलने में कामयाब होने की कोशिश करेगा। असल समस्या की शुरुआत यहीं से होगी।
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जब से चीन की आर्थिक चमत्कार की कहानी शुरू हुई, तभी से उसके अंत की भविष्यवाणियां भी होने लगी थीं। लेकिन, चीन विकास के मानक तय करने वाली दुनिया को ही अपना पिछलग्गू बनाने में सफल हो गया। आज यूरोप सहित पश्चिम के अधिकांश देश अमेरिका के बजाय चीन की तरफ देख रहे हैं। आखिर इस विरोधाभास के पीछे का सच क्या है?
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उस समय इन धारणाओं के पीछे सोच यह थी कि पश्चिम उन्नत विनिर्माण क्षेत्र का अगुआ है और उस पर अपना प्रभुत्व बनाए रखेगा, जबकि चीन सस्ते श्रम आधारित विनिर्माण-जैसे टीवी असेंबल करने तक सीमित रहेगा। लेकिन, चीन दुनिया की फैक्टरी बन गया। दरअसल, डेंग शियाओपिंग के इस विचार के साथ चीन ने आगे बढ़ना शुरू किया कि ‘बिल्ली काली है या सफेद, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क तो इस बात से पड़ता है कि वह चूहा पकड़ पाती है या नहीं।’ सच में अर्थव्यवस्था का मॉडल तो वही अच्छा, जो अपने लोगों की जेब और पेट भरे। इसमें समय लगना था। यही कारण है कि पश्चिम की सोच गलत निकली और चीन फर्राटा मार गया।
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संभवतः, चीन अपनी क्षमताओं को उसी दौर में पहचान गया था, जब पश्चिमी संस्थान उसके भविष्य की रेखाओं को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। चीन केवल कम लागत वाली उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादक बने रहने को तैयार नहीं था। उसे कुछ बड़ा करना था। वह यह मिथक तोड़ने में सफल हुआ कि चीन उच्च-स्तरीय विनिर्माण में प्रतिमान कायम नहीं कर सकता। उसने इस क्षेत्र में भारी निवेश किया और ‘चाइना 2.0’ में पश्चिम के भ्रम को तोड़ दिया कि चीन हमेशा एक विकासशील देश ही बना रहेगा।
न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार थॉमस फ्रीडमैन ने अपनी पुस्तक वर्ल्ड इज फ्लैट में लिखा है कि अपने शंघाई दौरे के समय उन्होंने एक चीनी बोर्ड पर लिखा देखा था-‘वर्ल्ड इज सिंक्रोनाइज्ड।’ दरअसल, यह चीन की महत्वाकांक्षा थी और वह उसे हासिल करने में सफल रहा। गौर से देखिए, सोलर पैनलों का बाजार चीन ने अपने कब्जे में कर रखा है। बैटरियों और इलेक्ट्रिक वाहनों में वह दुनिया का अग्रणी देश बन चुका है। आपको हर जगह चीनी उत्पाद दिख जाएंगे। हालांकि, चीनी अर्थव्यवस्था में कई बार पूंजी और रियल एस्टेट के क्षेत्र में बुलबुले उठते भी दिखे हैं। बीच-बीच में वह भरोसे की कमी की चुनौती से भी जूझता रहा है। फिर भी, आज वह पश्चिम को पीछे छोड़ने या अमेरिका को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में पहुंच गया है।
इसमें कोई शंका नहीं कि चीन का आर्थिक मॉडल निवेश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है और इसमें भारी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है। चीन घरेलू स्तर पर जितना उपभोग कर सकता है, उससे कहीं अधिक सामान बनाता है। फलतः चीन केवल उसी दर से विकास जारी रख सकता है, जो बेरोजगारी को सामाजिक अशांति में बदलने से रोकती हो। यदि वह अपने अतिरिक्त माल को बाकी दुनिया में नहीं खपा पाया, तो उसकी अर्थव्यवस्था डगमगाएगी। लेकिन, अभी ऐसा दिख नहीं रहा है।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तगड़ी पैठा बना चुकी है। इतनी कि एक अमेरिकी अखबार ने यह लिखते हुए चिंता जाहिर की है कि एनवीडिया के 50 खरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली पहली कंपनी बनने की तमाम चर्चाओं, एलन मस्क की स्पेसएक्स की लिस्टिंग और एंथ्रोपिक तथा ओपनएआई के संभावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के बीच एक बात स्पष्ट है, एआई अब मुख्यतः शेयर बाजार की कहानी नहीं रह गया है। यह कर्ज की कहानी है और संघर्ष के नए संभावित क्षेत्रों की बेहद अमानवीय कहानी भी है। यदि एआई से पैदा होने वाली नौकरियों के महाविनाश की आशंकाओं को एक तरफ रख दें, तो कोई नहीं जानता कि सोचने वाली मशीनों का यह युग कितना प्रभावशाली साबित होगा। अब असल प्रश्न यह है कि इस तकनीक पर जिसने कब्जा कर लिया, वह दुनिया में कैसा तांडव करेगा। अर्थव्यवस्थाओं को कर्ज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहारे सरपट दौड़ाने का कार्य कितना जोखिमपूर्ण होगा, यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन, असल बात यह है कि एआई प्रतिस्पर्धा में अगर चीन आगे निकल गया, तो क्या होगा?
जुलाई में चीनी स्टार्टअप मूनशॉट एआई ने अपना ‘कीमी के3’ मॉडल लॉन्च किया और तत्काल सफलता हासिल कर ली। लॉन्च के महज दो दिन बाद ही कंपनी को नए सब्सक्रिप्शन बंद करने पड़े। बताया गया कि मांग उसकी कंप्यूटिंग क्षमता से कहीं अधिक हो गई थी। यह आश्चर्यजनक नहीं था, क्योंकि ‘कीमी के3’ को ऐसे पेश किया गया कि वह अमेरिका के नवीनतम एआई मॉडलों की बराबरी कर सकता है और वह भी बिना किसी शुल्क के। यह अचानक घटी घटना नहीं है। यहां बीजिंग एआई नीति के तीन प्रमुख आयाम दिख रहे हैं। पहले तकनीकी मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में पहुंचना, फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में तकनीकी पैठ और अंत में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मानक तय करना। यदि चीन इसमें सफल हो गया, तो वह न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को बाधित करने में सफल हो जाएगा, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी बदलने में कामयाब होने की कोशिश करेगा। असल समस्या की शुरुआत यहीं से होगी।