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हार-जीत की बदलती परिभाषाएं: विचारधाराओं के उधार लिए गए चश्मे से देखा जा रहा ईरान युद्ध, सत्य के विरुद्ध अपराध

Fri, 24 Apr 2026 06:55 AM IST
Devesh Tripathi एस प्रसन्नराजन, ओपन मैगजीन के संपादक
एस प्रसन्नराजन, ओपन मैगजीन के संपादक Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 24 Apr 2026 06:55 AM IST
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सार
वैचारिक रूप से ध्रुवीकृत दुनिया में परिस्थितियां हार और जीत का स्वरूप बदल देती हैं। तभी तो, अमेरिका के साथ संघर्ष में तकरीबन बर्बाद हो चुके ईरान को भी इस तरह देखा जा रहा है, मानो उसने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया हो।
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changing definitions of victory and defeat iran us conflict ideological narrative
पश्चिम एशिया संघर्ष - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

जो कोई भी मरने वालों की गिनती कर रहा था, उस सभ्यता पर छाए काले धुएं से डर रहा था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी पूरी तरह मिटाने को तैयार थे, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल के जहाजों के निर्बाध गुजरने को लेकर शंका में था और लंदन व न्यूयॉर्क के विकल्प के तौर पर दुबई के फिर से उभरने पर संदेह कर रहा था। जब ट्रंप अपनी हताशा को गालियों और शब्दों के खेल के जरिये जाहिर कर रहे थे, तब जो लोग दूसरों की मुसीबत में मजा ले रहे थे, उनके लिए जीत और हार या फिर एक उम्मीद भरी गतिरोध की हद सिर्फ शब्दों के अर्थों से ही तय हो रही थी।


चैटरूम में, अखबारों में और रेडियो-टीवी पर परिभाषाएं गढ़ी और बेची जा रही थीं। ये सब, उन देशों के प्रति आपकी वैचारिक चिढ़ या खानदानी नफरत को दिखा रहा था, जो अब भी अपने बुरे इतिहास से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। और इसीलिए, जीत को तबाही की तस्वीरों, मारे गए नेताओं की सूची, और बहुत कमजोर पड़ चुकी सैनिक और परमाणु क्षमताओं के जरिये बेहतर ढंग से समझाया जा सकता है।


ये तस्वीरें एक ऐसे विचार की पृष्ठभूमि बनाती हैं, जिसे कोई भी महाशक्ति नहीं हरा सकती-एक ऐसी महाशक्ति, जिसकी सैनिक श्रेष्ठता, उसकी नैतिक हीनता के आगे बेअसर हो जाती है। तकलीफों के बीच, ईरान ने एक पीड़ित के तौर पर अपनी साख और मजबूत की है-एक ऐसा पीड़ित, जिसका इतिहास लंबी लड़ाइयों पर जीत हासिल करने का रहा है। मौत के बाद भी, उसकी जिंदगी कई गुना बढ़ जाती है। यह एक सशक्त कहानी है, जिसमें आस्था और दृढ़ता के इर्द-गिर्द एक नई फारसी पौराणिक कथा गढ़ी जा रही है। इसमें विजय को उसी धार्मिक आस्था की शब्दावली में पुनर्परिभाषित किया गया है, जिसे आमतौर पर दमन से जोड़ा जाता है।

जब गाजा से आने वाले बेदखली और मौत के संदेशों की जगह एक गौरवशाली देश के जले-भुने अवशेष ले लेते हैं, तब जो बात सबसे अधिक मायने रखती है, वह है एक ऐसे विचार का बने रहना, जो उदारवादी मन को सुकून देता है। यह एक ऐसा विचार है, जिस पर हमला हो रहा है, जो साम्राज्यवादी अहंकार के सामने खड़ा है और यह अहंकार खुद यहूदी राष्ट्र के उस वहम से और भी ज्यादा भड़क उठता है, जिस पर वह राष्ट्र टिका हुआ है। जीत की नई परिभाषा में, ईरान (जो ईश्वर के अपने शस्त्रागार से लैस है) राक्षस के प्रकोप को चुनौती देते हुए राख से उठ खड़े होने और अपने उत्पीड़क को थका देने की एक प्रेरणादायक गाथा है। यह एक जरूरी परिभाषा है, क्योंकि कुछ जीतें भी उस समय जरूरी होती हैं, जब हार को इस बात से नहीं मापा जाता कि आपने क्या खोया है, बल्कि इस बात से कि आपने क्या हासिल नहीं किया है।

ट्रंप का बार-बार एक घिरे हुए ‘टर्मिनेटर’ के रूप में नजर आना, जो ईरान के अंत की घोषणा करता है, हार का ही एक भड़कीला और दिखावटी रूप है। और अमेरिकी राष्ट्रपति ने वामपंथी टीकाकारों और रूढ़िवाद के अलग-थलग पड़े खेमे को निराश नहीं किया। उन्होंने एक विक्षिप्त साम्राज्यवादी की भूमिका को पूरी तरह से निभाया। हो सकता है कि आंकड़ों ने बुरी तरह से तबाह हो चुके इस्लामी गणराज्य के बारे में उनके दावे का समर्थन किया हो; लेकिन सौंदर्यबोध ने उन्हें हरा दिया। ईरानी मलबे से हार का अमेरिकी वॉर रूम में हस्तांतरण, एक ‘अनुकूल विजेता’ गढ़ने की उदारवादियों की बेसब्री के कारण और भी आसान हो जाता है।

परिभाषाओं की इस उथल-पुथल में, विरोधाभास मिट जाते हैं। अमेरिका को ही लें, जिसने अकेले ही एक युद्ध लड़ा। हालांकि, इस्राइल भी वहां मौजूद था। फिर इस्राइल तो हमेशा ही वहां था, अपने अस्तित्व के अधिकार के लिए लड़ता हुआ। इस युद्ध के सबसे आदर्शवादी रूप में, अमेरिका ने स्वतंत्रता की खातिर लड़ाई लड़ी। ट्रंप जो चाहते थे, वह था सत्ता परिवर्तन, ताकि ईरानियों को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के तानाशाही शासन से मुक्ति मिल सके, लेकिन सिर्फ इसलिए कि यह बात ट्रंप जैसे व्यक्ति ने कही थी, इसमें विश्वसनीयता की कमी थी।

इस ‘युद्ध-राष्ट्रपति’ के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में न केवल विल्सन जैसी परिष्कृत सोच का अभाव था, बल्कि उनके चरित्र की कमियां उन दरारों से कहीं ज्यादा साफ नजर आती थीं, जिन्हें वे पश्चिम-एशिया से मिटाना चाहते थे। अमेरिका-विरोध, तथाकथित ‘ट्रंप डेरेन्जमेंट सिंड्रोम’ के साथ मिलकर, एक आंशिक जीत को भी पूरी तरह हार में बदल सकता है। क्रांतिकारी गणतंत्र में भी एक नैतिक उलटफेर हुआ है। जैसे-जैसे युद्ध तेज हुआ और ईरान का रक्षा तंत्र ढह गया, एक विजेता उभरने लगा। साम्राज्यवादी अमेरिका के शिकार को हारने नहीं दिया जा सकता था; जीत की परिभाषा को ईरान के अनुकूल बनाने के लिए संशोधित कर दिया गया। अचानक आईआरजीसी, राजनीतिक इस्लाम की सबसे घातक मशीन नहीं, बल्कि प्रतिरोध का लोकप्रिय साधन बन गया। ईरानी युवा (जिन्हें चुप रहने के लिए समय-समय पर क्रूरता का शिकार बनाया जाता था) आईआरजीसी के नहीं, बल्कि अमेरिका के पीड़ित थे।

ईरानी क्रांति, जिसने इस्लाम का ‘गुलाग’ (जेल तंत्र) खड़ा किया और पश्चिम-एशिया में अमेरिका-विरोध को संस्थागत रूप दिया, पश्चिम की प्रगति और लोकतंत्र के विचार के प्रति एक सांस्कृतिक जवाब बन गई। ईरान के भयतंत्र का अस्तित्व बनाए रखना, अमेरिकी साम्राज्य को घुटनों पर लाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। जैसे-जैसे अच्छाई व बुराई, तथा जीत व हार की परिभाषाएं और भी अधिक अवास्तविक होती गईं, इस्लामी विचारधारा के एकमात्र साम्राज्य को नैतिक अस्त्रों की अबाध आपूर्ति प्राप्त होती रही। पुनः उपयोग की जाने वाली परिभाषाएं, अपनी कथात्मक महत्वाकांक्षा के तहत, स्वयं इतिहास को ही पुनर्परिभाषित करने का लक्ष्य रखती हैं।

जैसे-जैसे वैचारिक रूप से ध्रुवीकृत दुनिया, एक अधूरे लड़े गए युद्ध के वाक्पटुतापूर्ण औजारों से विजेताओं और पराजितों को गढ़ती है, क्या यह वास्तव में एक नए शक्ति-समीकरण की शुरुआत है, जिसमें अमेरिका का अलगाव, ट्रंप से भी कहीं अधिक व्यापक है? विचारधाराओं का नैतिक निरपेक्षता के साथ (और विस्तार से कहें तो, स्वतंत्रता के साथ भी) एक तनावपूर्ण रिश्ता होता है। विजेताओं और पराजितों की उलटी परिभाषाओं वाला यह अनिर्णायक युद्ध, ईरान की स्वतंत्रता को भी अनिर्णायक ही छोड़ देता है। हर युद्ध जब विचारधाराओं के उधार लिए गए चश्मे से देखा जाता है, तो वह सत्य के विरुद्ध एक अपराध होता है।
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