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हताशा को उम्मीद में बदलें

Mon, 30 Apr 2018 06:43 PM IST
भगवान अटलानी
भगवान अटलानी Updated Mon, 30 Apr 2018 06:43 PM IST
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Change frustration to hope
भगवान अटलानी
पद पर आने के बाद प्रत्येक व्यक्ति अपनी कुछ वरीयताएं तय करता है। इन वरीयताओं की पृष्ठभूमि में योजनाएं बनाता है। उन्हें लागू करने की प्रक्रिया में कितना सफल या विफल होता है, उसके आधार पर कार्यकाल की समाप्ति के बाद उस व्यक्ति विशेष का वह स्वयं या अन्य लोग आकलन करते हैं। बड़े पद पर आने के बाद वरीयता स्थापन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

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नरेंद्र मोदी मई, 2014 में जब देश के प्रधानमंत्री बने, तो मीडिया और भाषणों के माध्यम से उनकी वरीयताएं जग थीं। अर्थनीति, विदेश नीति, पड़ोसी देशों से संबंध, विकास, जीवन पद्धति, गांव और गरीब आदि के बारे में वह इतना कुछ कह चुके थे कि एक तूफान-सा चलता प्रतीत होता था, जो परिवर्तन की भूमिका बनकर उभरने वाला था।

यह परिवर्तन लाने की ईमानदार कोशिश उन्होंने सत्ता की बागडोर संभालते ही शुरू कर दी। योजनाएं केवल बनाई या घोषित ही नहीं की गईं, उन्हें लागू करने की दिशा में भी पूरी ताकत से प्रयत्न हुए। नोटबंदी, जीएसटी और सर्जिकल स्ट्राइक भले ही सर्वाधिक चर्चा में रहे हों, पर उनकी एक भी योजना कागजी नहीं थी। अपेक्षाएं उफान पर थीं, इसलिए त्वरित परिणामों की मांग थी।

निर्माण और बदलाव समय साध्य होते हैं। योजनाओं के नतीजे तुरंत सामने आएं, यह संभव नहीं होता। मगर बातों, दावों और घोषणाओं के कारण जो वातावरण देश में बन चुका था, उसकी पृष्ठभूमि में सामान्य जन के हाथों से धैर्य का दामन जैसे छूट गया है। चार साल गुजर जाने के बाद नरेंद्र मोदी से की गई अपेक्षाओं का ज्वार अनेक लोगों के मनोसमुद्र में भाटा बन चुका है।

सांसदों, विधायकों आदि को वेतन, भत्तों, पेंशन, चिकित्सा, बिजली, यात्रा में छूट जैसी विपुल सुविधाएं जनमानस को उद्धेलित करती हैं। शैक्षणिक योग्यता व आयु जैसी बाध्यताओं के अभाव के बावजूद लोकसेवकों को करदाताओं के ऊपर लादने की प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। संसद की कैंटीन में खान-पान की सामग्री की दरें चौंकाती हैं। यही स्थिति विधानसभाओं में है। इन व्यवस्थाओं को तुरंत प्रभाव से बदलने की जरूरत है। 

जब प्रधानमंत्री वरिष्ठ नागरिकों को रेलयात्रा में रियायत लेने से स्वैच्छिक इन्कार का आग्रह करते हैं, तब लोकसेवकों को खुले हाथ दी जाने वाली सुविधाओं की पृष्ठभूमि में मजाक लगती है। इसी तरह जब नरेंद्र मोदी गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान करते हैं, तो लगता है कि जरूरतमंद को देशहित का पाठ पढ़ाते हुए त्याग के नाम पर उनकी जेब से छोटी-छोटी रकम निकालकर वे करोड़ व अरबपति सांसदों-विधायकों की रुपयों से भरी जेबों में डाल रहे हैं। कथनी और व्यवहार का यह अंतर खोखला महसूस होने लगता है।

कभी प्रधानमंत्री रहते हुए लालबहादुर शास्त्री ने स्वयं सोमवार का उपवास प्रारंभ कर देश को सप्ताह में एक दिन अन्न बचाने के लिए कहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान का प्रभाव व्यवहार में विसंगति के कारण कमतर हो जाता है।

कहा जा सकता है कि सुविधाएं छिन जाने पर सांसद और विधायक बागी हो जाएंगे। सरकार गिर जायेगी। लेकिन प्रधानमंत्री जब नोटबंदी, जीएसटी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक कदम उठा सकते हैं, तो यह काम भी करके देखें। 

नरेंद्र मोदी का कार्यकाल स्वयं के लिए नहीं, देश के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे से ओतप्रोत है। उनके जैसे संकल्पवान और देशहित को वरीयता देने वाले प्रधानमंत्री सोच लें, तो पैदा हो रही निराशा को खत्म करने में भी वह अवश्य सफल होंगे।
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