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मैं आम आदमी पार्टी या अरविंद केजरीवाल का समर्थक नहीं हूं। इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाला कोई भी आदमी यह देख सकता है कि 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के दौरान मेरे लेख केजरीवाल की आलोचना करते हुए थे। तब मैंने यहां तक कहा था कि स्वभाव के लिहाज से केजरीवाल नरेंद्र मोदी की तानाशाही शैली की मानसिकता वाले हैं। ये दोनों ही अपनी पार्टी के बहुत अच्छे नेता नहीं हैं, और आंतरिक लोकतंत्र बनाए रखने में भी बहुत भरोसा नहीं करते। इसके बावजूद मैं मानता हूं कि दिल्ली को आप को सरकार बनाने का एक और मौका देना चाहिए।
पिछले दो दशकों में, जब से शेयर बाजार खबरों के केंद्र में आया है, तब से सेंसेक्स को देश की वित्तीय सेहत का बैरोमीटर माना जाने लगा है। जब भी शेयर बाजार में नाटकीय उछाल आता है और सेंसेक्स अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंचता है, तब आर्थिक विशेषज्ञ 'बाजार के सुधरने' (मार्केट करेक्शन) का जुमला इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब यह है कि शेयर बाजार में आया अकारण उछाल जल्दी ही सामान्य हो जाएगा, जब बाजार टूटेगा। कई बार कुछ दिनों या सप्ताहों तक शेयर बाजार नीचे उतरता चला जाता है। उसी तरह मेरा मानना है कि देश को जनादेश सुधारने की जरूरत है-एक पार्टी का वर्चस्व भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की सेहत के लिए ठीक नहीं। दिल्ली में भाजपा और आप, दोनों में बराबरी की टक्कर है, पर नतीजे के बारे में मोदी के चेहरे पर दिखता भय फिलहाल लोकतंत्र की विजय से कम नहीं।
पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिला पूर्ण बहुमत एक चौंकाने वाला राजनीतिक घटनाक्रम था। उसने देश की तीन दशक की राजनीति को उलट-पुलट दिया था; 1996 से ही किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। पिछले साल आया लोकसभा चुनाव का जनादेश महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में भी बरकरार रहा, और अब भाजपा जम्मू-कश्मीर में सरकार साझा करने के करीब पहुंच गई है। पिछले कुछ महीनों से राजनीतिक विश्लेषक यह तर्क दे रहे हैं कि भाजपा ने उस कांग्रेस की जगह ले ली है, जिसका कभी पूरे देश में वर्चस्व था।
हाल ही में दिवंगत हुए दिग्गज राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी कांग्रेस के आधिपत्य को एक पार्टी वर्चस्व या भारतीय राजनीति की कांग्रेस प्रणाली कहते थे। इस व्यवस्था में कांग्रेस का पूर्ण नियंत्रण होता था-और हालांकि सबसे पहले यह एक राजनीतिक पार्टी थी, लेकिन असलियत में यह दल कई वैचारिक और एक जैसे हितों का समूह और जातियों का समुच्चय था। इसी कारण 1952 से 1967 तक कांग्रेस को चुनावी राजनीति में चुनौती नहीं मिली। 1980 में हालांकि इसने दोबारा अपना राजनीतिक वर्चस्व हासिल कर लिया, लेकिन 1989 में गठबंधन राजनीति की शुरुआत ने कांग्रेस को फिर नेपथ्य में धकेल दिया। बेशक 1991 से 1996 तक यह केंद्र की सत्ता में रही, पर तब यह अपने गौरवशाली अतीत की छाया भी नहीं रह गई थी।
विगत मई में लोकसभा चुनाव का नतीजा सामने आने के बाद नरेंद्र मोदी और उसके समर्थकों ने गठबंधन व्यवस्था को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा था कि इससे सरकारी कामकाज में सुस्ती आ जाती है। पिछले आठ महीने से यह कहा जा रहा है कि भारत को यदि मजबूत अर्थव्यवस्था बनना है, तो केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्यों में भी एक ही पार्टी का होना जरूरी है-क्योंकि राज्यों में अलग पार्टियों की सरकार का नुकसान यह है कि केंद्र के साथ उनका तालमेल नहीं बन पाता। इस तरह का तर्क उस संघीय व्यवस्था की अनदेखी करता है, भारत जिसके लिए प्रतिबद्ध है।
यह तर्क गलत है कि गठबंधन से सरकार कमजोर होती है। इसके विपरीत, अच्छे गठबंधन से समाज के सभी वर्गों के कल्याण होने की गारंटी होती है, क्योंकि उसमें अलग-अलग राजनीतिक दलों की भागीदारी होती है। याद रखना चाहिए कि पी चिदंबरम ने जब ड्रीम बजट पेश किया था, तब एच डी देवगौड़ा उस संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री थे, जिसके पास बहुमत नहीं था, और जो कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई थी। इसके बावजूद पी चिदंबरम ने आयात शुल्क कम करने का साहस दिखाया था, ताकि आसियान के स्तर तक पहुंचा जा सके।
वैश्विक स्तर पर यह माना जा चुका है कि 1996 में गठबंधन सरकार के दौर में आर्थिक मोर्चे पर जो शुरुआत हुई, वह इतनी अनिवार्य थी कि अगले दो वित्त मंत्रियों, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह, ने भी उस प्रक्रिया को जारी रखा। उन्हीं आर्थिक प्रयासों के जरिये भारत की विकास दर आठ से नौ फीसदी तक पहुंची। 2009 के चुनाव में कांग्रेस को 200 सीटें मिलीं। पर उसी दौरान वैश्विक मंदी ने भारत पर भी असर डाला पड़ा। राजनीतिक स्थिरता आर्थिक नुकसान को नहीं रोक पाई।
पिछले आठ महीनों में सरकार ने अध्यादेशों के जरिये कई कदम उठाए हैं। पर विधायिका को भरोसे में लेना भी जरूरी है, और सरकार को लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत काम करना पड़ता है। इस मोर्चे पर केंद्र की सरकार अब तक कमोबेश विफल रही है। वह राज्यसभा की अनदेखी नहीं कर सकती। मोदी को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर काम करना पड़ेगा।
दिल्ली विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी की सबसे मुश्किल परीक्षाओं में से है। नरेंद्र मोदी न सिर्फ दबंग व्यक्तित्व के हैं, बल्कि विगत में उनकी पहचान राष्ट्रपति प्रणाली का शासन चलाने की रही है, इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव के जनादेश को सुधारने की जरूरत है। मोदी को याद रखना चाहिए कि भारत के दिल को समन्वयवादी तरीके से जीता जा सकता है, सत्ता की ताकत का प्रदर्शन करके नहीं। वर्ष 1967 से हर दूसरे लोकसभा चुनाव में नए राजनीतिक घटनाक्रम ने चुनावी समीकरणों को बदला है। यह दिल्ली के मतदाताओं को तय करना है कि इस चुनाव में वे बदलाव की शुरुआत करते हैं या नहीं।
-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक