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चंदा, गुल्लक और गुडलक

Thu, 05 Feb 2015 08:22 PM IST
निर्मल गुप्त
निर्मल गुप्त Updated Thu, 05 Feb 2015 08:22 PM IST
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Chanda, piggy bank and Good Luck

उनके पास चंदा खुद-ब-खुद आ रहा है। दबे पांव आ रहा है। बिना किसी पूर्व सूचना के आ रहा है। सात समंदर पार से चला आ रहा है। चेक रूपी कागज की नाव में सवार होकर आ रहा है। नकद नारायण की धज के साथ भी आ रहा है। निष्काम आकांक्षा के साथ आ रहा है। निरपेक्ष भाव से आ रहा है। वह लगातार आ रहा है। आता ही चला जा रहा है।

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चंदा आने की बात सबको पता है। लेकिन आने के बाद चंदा जाता कहां है, इसका पता कुछेक लोगों को ही होता है। बंदा चंदा देता है और उसका जिक्र तक किसी से नहीं करता। चंदा पाने वाला उसे याद रखता है। वह उसकी रसीद दे या न दे, लेकिन उसका हक किसी न किसी रूप में अदा अवश्य करता है। चंदा अपने मंतव्य में कभी विफल नहीं होता। लोकतंत्र चंदे के कंधे पर टंगकर नयनाभिराम बनता है। वह ईमानदारी के सिर माथे पर सौभाग्यवश टिककर सुरक्षित रहता है।
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एक समय वह भी था, जब चंदा धर्मस्थलों के गुल्ल्कों में बने सूराख में गिरता था। लोग उसमें चंदा इस आस के साथ गिराते थे कि उनकी यह दक्षिणा गुडलक के रूप में तब्दील हो जाएगी। गुल्लक भर जाता था, तो उन्हें फोड़ दिया जाता था। सबके मुकद्दर का आना पाई हिसाब हो जाता था। ऐसे मामलों में कभी उधारी का चलन नहीं था। खाता बेबाक रहता था। इसके बावजूद भूल- चूक, लेनी-देनी की गुंजाइश रखी जाती थी।
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आज समय बदल गया है। चंदा अब दान दक्षिणा के रूप में नहीं, कूट संकेतों में आता है। पारदर्शी स्वरूप में आता है। कभी-कभी किसी के हाथ में आने से पहले ही उनके हाथों को मल्टीकलर बना देता है। चंदा मिल पाए, इससे पहले ही वे रंगे हाथ धर लिए जाते हैं। इसके बावजूद चंदा हाथोंहाथ जिसकी जेब तक पहुंचना होता है, बड़े आराम से पहुंच जाता है।


चुनावी राजनीति के हम्माम में चंदे की रकम से खरीदे गए पर्दे टंग चुके हैं। इसलिए अब न कोई इसमें नंगा नहाता हुआ शरमाता है और न ही मुंह चुराता है। चंदे के प्रताप से खरीदी गई विजय पताका हवा के अभाव में भी खूब फरफराती है।

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