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संतुलन साधने की चुनौती

Wed, 04 Jun 2014 07:15 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Wed, 04 Jun 2014 07:15 PM IST
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Challenge of balancing between farmers and consumers

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की अर्थव्यवस्था को कौन-सी दिशा देना चाहते हैं, इसका संकेत आने वाले हफ्ते में वित्त मंत्री अरुण जेटली के पहले बजट से मिलेगा। अपने तमाम चुनावी भाषणों में मोदी ने गुजरात के अपने अनुभवों पर आधारित एक नए 'विकास मॉडल' पर जोर दिया था। गुजरात मॉडल से संबंधित अतिरंजित दावों को यदि हम खारिज भी कर दें, तो मोदी गुजरात की इस उपलब्धि पर गर्व कर सकते हैं कि उनके दस वर्षों के कार्यकाल के दौरान गुजरात ने औसतन दस फीसदी के करीब उच्च कृषि विकास दर हासिल की। इससे कृषि क्षेत्र की आय में चौतरफा वृद्धि हुई। कृषि क्षेत्र में सफलता की यह कहानी खेती के लिए सिंचाई संसाधनों के विकास और किसानों को विस्तार सेवाएं, जिसमें प्रौद्योगिकी भी शामिल है, मुहैया कराकर लिखी गई है।

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इसलिए अरुण जेटली के बजट में निश्चित रूप से एक बड़ा हिस्सा गुजरात में मोदी द्वारा अपनाए गए कृषि-अर्थव्यवस्था संबंधी विचारों के लिए होगा, जिसे केंद्र देश के बाकी हिस्सों के सामने पेश करेगा। हाल ही में एक चर्चा के दौरान प्रकाश जावड़ेकर ने इस लेखक को भाजपा के कृषि संबंधी नए दृष्टिकोण के बारे में बताया कि उनकी पार्टी हर खेत को पानी पहुंचाने के लिए एक योजना तैयार करेगी। इसे एक अभियान की तरह चलाया जाएगा। इसके लिए पूरे देश में सिंचाई संबंधी नए ढांचे के निर्माण के लिए निवेश की जरूरत होगी।
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'हर खेत को पानी' यह सुनने में तो सामान्य लगता है, लेकिन वास्तव में यह एक बेहद मुश्किल काम है। यहां तक कि आज भी देश की करीब 60 फीसदी खेती वर्षा पर निर्भर है। चूंकि कृषि राज्य से संबंधित मामला है, इसलिए अरुण जेटली को कृषि ढांचा संबंधी एक नई नीति बनानी होगी, जिसमें वह राज्यों के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं के जरिये सिंचाई ढांचे में निवेश के लिए प्रोत्साहन नीति तैयार करेंगे। ताजा प्रोत्साहन के रूप में सरकार केंद्रीय खरीद कार्यक्रम से अलग नकदी फसलों और अन्य कृषि उत्पादों की खरीद के लिए एक नई केंद्रीय क्रय नीति ला सकती है। अपनी सार्वजनिक रैलियों में मोदी ने स्पष्ट रूप से वायदा किया कि उनकी सरकार किसानों को कुल लागत से 50 फीसदी ज्यादा मुनाफा देगी। साफ है कि सरकार किसानों के लिए एक नई खरीद नीति लाना चाहती है।
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हालांकि किसानों को ज्यादा खरीद मूल्य देने से मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ेगी। अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि यूपीए लगातार 10 फीसदी से ऊपर रही खाद्य मुद्रास्फीति पर इसलिए नियंत्रण नहीं कर सकी, क्योंकि हाल के वर्षों में उसने किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में सालाना औसतन 20 फीसदी की बढ़ोतरी की। यूपीए को निरंतर किसानों और उपभोक्ताओं की परस्पर विरोधी मांगों का सामना करना पड़ा। जब किसानों को उनके उत्पाद का उच्च मूल्य मिला, तो उपभोक्ताओं को उच्च खाद्य मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ा। राजनीतिक रूप से इन दोनों के बीच संतुलन साधना काफी कठिन होता है और आने वाले वर्षों में अरुण जेटली को भी इस समस्या का सामना करना पड़ेगा। किसान और उपभोक्ता, दोनों राजनीतिक रूप से मुखर हैं। खाद्य चीजों की महंगाई की वजह से ही कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ।

अरुण जेटली ने भारतीय खाद्य निगम की गोदामों से अनाज निकालकर गरीबों में बांटकर मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की बात की है, लेकिन मुद्रास्फीति ज्यादातर अंडा, दूध, मांस उत्पाद के साथ-साथ फलों और सब्जियों जैसी प्रोटीन वाली वस्तुओं की खपत से बढ़ती है। सवाल है कि इन चीजों में मुद्रास्फीति पर किस तरह नियंत्रण किया जाएगा। एक सुझाव है कि इन चीजों पर आयात शुल्क, जो अभी 30 फीसदी है, उसे घटाकर शून्य कर दिया जाए, इससे इनकी कीमत 30 फीसदी घट जाएगी। लेकिन यदि आप ऐसा करेंगे, तो पॉल्ट्री और डेयरी क्षेत्र के किसान विरोध करेंगे। इस तरह फिर से किसानों और उपभोक्ताओं के बीच विवाद होगा। ऐसे में, इस राजनीतिक सवाल का समाधान मुश्किल होगा। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि के लिए गुजरात मॉडल को कैसे लागू किया जाएगा।

बड़े कॉर्पोरेट घरानों और वैश्विक निवेशकों को भी जेटली के बजट से बड़ी अपेक्षाएं हैं। मगर तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा सुस्ती व्यापक रूप से वैश्विक आर्थिक स्थितियों से जुड़ी है, जो अब भी अनिश्चित है। कॉर्पोरेट जगत चाहेगा कि बजट में उनके लिए रियायतों का नया पैकेज निर्धारित किया जाए, जो उनका मुनाफा बढ़ाने में मददगार साबित हो। पर जेटली को अपने बजट के व्यापक राजनीतिक संदेश के प्रति भी सावधान रहना होगा।


वित्त मंत्री वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में अप्रत्यक्ष कर सुधार से संबंधित रोडमैप बनाकर कुछ सकारात्मक संकेत दे सकते हैं। हालांकि भाजपा शासित राज्यों, खासकर नरेंद्र मोदी, ने पहले इसकी त्वरित प्रगति को अवरुद्ध कर दिया था। अब भाजपा केंद्र और राज्यों द्वारा अप्रत्यक्ष करों के संग्रह और बंटवारे को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए सांविधानिक संशोधन लाने संबंधी महत्वपूर्ण कदम उठाने का श्रेय ले सकती है। जीएसटी एक स्वाभाविक वित्तीय प्रोत्साहन है। अगर जेटली केंद्र एवं राज्यों के बीच बराबर बंटने वाली एकल जीएसटी दर 16 फीसदी रखने का साहस दिखा पाते हैं, तो इससे अप्रत्यक्ष करों में कम से कम सात फीसदी की कमी आएगी। कॉर्पोरेट जगत को राहत देने के लिए एक नया सरल आयकर कानून भी लाया जा सकता है। जेटली अगले दो-तीन वर्षों की वित्तीय नीति का रोडमैप बनाने के लिए भी बजट का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि सब्सिडी के राजनीतिक स्वरूप को देखते हुए वित्तीय घाटे को रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता है।

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