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जाति की जद में राजनीति

Fri, 12 Jul 2013 10:24 PM IST
बद्री नारायण
बद्री नारायण Updated Fri, 12 Jul 2013 10:24 PM IST
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हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित किए जा रहे जातिगत सम्मेलनों पर रोक लगा दी है। यह फैसला ‘जनतांत्रिक नैतिकता’ को मजबूत करने की दिशा में क्या भूमिका निभा पाएगा, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा, परंतु इस फैसले के राजनीतिक निहितार्थ एवं परिणाम पर विचार करना जरूरी है।

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भारतीय जनतंत्र और ‘जाति भाव’ के बीच गहरा संबंध रहा है। यह विडंबना है कि जो ‘जाति भाव’ भारतीय समाज में असमानता एवं विभेद का कारण रहा है, वही भारतीय जनतंत्र, विशेषकर ‘चुनावी जनतंत्र’ का प्राणतत्व होकर उभरा है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रवाह में ‘जाति भाव’ समाप्त तो नहीं हो पाया, बल्कि बड़े सवालों के पीछे छिप गया था। पर यह 'भाव' राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में भी कहीं भीतर ही कुलबुला रहा था।
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शायद इसीलिए आजादी के पहले अनेक जाति सभाएं बन रही थीं। उनके सम्मेलनों में पहले ‘अपनी जाति’, फिर ‘समाज एवं राष्ट्र’ के विकास की दिशा में भी प्रयास करने की प्रतिबद्धता दिखाई जा रही थी। कायस्थ सभा, ब्राह्मण सभा, पिछड़ों का त्रिवेणी संघ, यादव सभा, कुर्मियों का जातीय संगठन, जाटव समाज जैसी अनेक सभाएं आजादी के पहले ही स्थापित हो चुकी थीं, जिनमें कई आज भी सक्रिय हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे प्रखर किसान नेता की राजनीति का भी जातिगत आधार औपनिवेशिक काल में दिखने लगा था।
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लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में जाति का प्रश्न फुटनोट की ही तरह रहा। आजादी के बाद चुनावी राजनीति में लगभग एक दशक तक जाति का प्रश्न गौण रहा, क्योंकि आजादी के बाद की ‘सत्ता’ एवं कल्याणकारी राज्य से सभी जातियों को बड़ी आशाएं थीं। दूसरे, ऊंची एवं कुछ मध्य जातियों को छोड़ दें, तो कई जातियों में नेतृत्व क्षमता एवं सत्ता की आकांक्षा विकसित नहीं हुई थी। साठ के दशक के बाद भारतीय राज्य से अनेक जातियों का मोहभंग हुआ, जिसने सत्ता में हिस्सेदारी के लिए उनमें जातिगत चेतना को प्रखर किया।

इस कालखंड में कांग्रेस के आधिपत्य को चुनौती देने और पिछड़ी जातियों की भागीदारी के नारों को बुलंद करने के क्रम में डॉ. राम मनोहर लोहिया एवं समाजवादी राजनीति ने भी पिछड़ी जातियों में जातिगत अस्मिता की धार को प्रखर किया। जनगणना की राज्य निर्देशित प्रक्रिया औपनिवेशिक काल से ही भारतीय समाज में जातिगत भाव को प्रखर कर रही थी। आजादी के बाद भी एससी, ओबीसी जैसे नए नामों से यह प्रक्रिया जारी रही। मीडिया के चुनाव विश्लेषण में दिए जाने वाले जातिगत आंकड़े औपनिवेशिक जनगणना पर ही आधारित थे, किंतु समय के साथ जातियों की संख्या में विस्तार की परिकल्पना कर उनमें नए आंकड़े जोडे़ जाते रहे।

बीती सदी के सत्तर के दशक में जब कांग्रेस में नेतृत्व की चुनौतियां बढ़ीं, तो इंदिरा गांधी ने दलित जातियों की विकासपरक जरूरतों को सत्ता की कल्याणकारी योजनाओं द्वारा पूरित करते हुए इन जातियों को राजनीति से जोड़ा। ब्राह्मण एवं मुस्लिम के साथ दलित गठजोड़ ने जातियों का एक प्रभावशाली समीकरण कांग्रेस के पक्ष में विकसित किया था। आजादी के बाद जातिगत संगठन एवं जाति सम्मेलन तो होते रहे, लेकिन उनका राजनीतिक दलों द्वारा आयोजन नहीं किया जाता था।

मंडल आयोग के लागू होने एवं राम जन्मभूमि आंदोलन की काट के लिए पूर्व समाजवादी पिछड़ी जाति के नेताओं यथा शरद यादव, लालू यादव, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार आदि ने 80 के दशक में पिछड़ी जातियों को सत्ता से जोड़ने के क्रम में जातिगत गोलबंदियां कीं। ये नेता जातिगत सम्मेलनों में तो जाते थे, किंतु इसका आयोजन खुद नहीं कराते थे। मंडल की चुनौती का सामना करने के लिए भाजपा ने भी ओबीसी एवं लोध, निषाद, जैसी पिछड़ी जातियों और आदिवासियों को राम के मिथक से जोड़ते हुए उनकी अस्मिता की राजनीति की।

कल्याण सिंह, विनय कटियार जैसे नेता उसी दौर की उपज हैं। अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति की शुरुआत करते हुए कांशीराम ‘जाति को जाति से काटो’ जैसे विचार के साथ आगे बढ़े। राम मनोहर लोहिया ने ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ जैसे नारों के साथ पिछड़ों को ताकतवर बनाने का जो नारा चलाया था, कांशीराम ने उसे दलितों तक पहुंचाया। लेकिन मायावती उनकी उस राजनीति में कोई सुधार किए बिना नए जातिगत समीकरणों के इस्तेमाल की रणनीति पर चलती रहीं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के इस निर्णय का असर यह होगा कि पब्लिक स्पेस में ‘जातिगत गर्व के गायन’ पर थोड़ा नियंत्रण लगेगा। पर भीतर ही भीतर गांव, बस्ती एवं छोटी सभाओं में हमारे दल जातिगत गर्व को सत्ता की राजनीति से जोड़ते रहेंगे। जातियों के नाम की जगह नई पहचान तलाश कर पिछड़ा, दलित अनुसूचित जातियों के सम्मेलन भी आयोजित किए जाते रहेंगे।


इस निर्णय से सबसे ज्यादा घाटा बसपा एवं सपा जैसी पार्टियों को होगा, जो जाति के आधार पर राजनीति करती हैं। उन्हें नई भाषा तलाशनी होगी। कांग्रेस और भाजपा जैसे पार्टियों को इस निर्णय से खतरा कम है, क्योंकि उनकी भाषा बड़े मुद्दों की आड़ में छिपी अस्मिताओं की राजनीति से बनती है। फिर भी अदालत के इस निर्णय ने भारतीय जनतंत्र के स्वरूप एवं जाति के प्रश्न पर हमें नए ढंग से विचार करने का मौका दिया है। न्यायालय ने उन विश्लेषकों के सामने भी एक चुनौती खड़ी की है, जो यह मानते हैं कि जाति की राजनीति से भारतीय जनतंत्र का गहरा रिश्ता है।

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