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सियासत: जाति गणना से क्या होगा, विभाजित गुटों की नकारात्मकता की आशंका अधिक
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बिहार सीएम नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
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अमर उजाला
विस्तार
इस वर्ष अब तक हमारे देश में दो बड़ी घटनाएं हुई हैं- एक महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना और दूसरी बिहार में जाति गणना। ये दोनों घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के लिए राजनीतिक व सामाजिक महत्व की हैं। यह आशंका निराधार नहीं है कि अल्पसंख्यक जातियों पर बहुसंख्यक जातियां प्रभुत्व जमा सकती हैं और उनका शोषण कर सकती हैं। लेकिन गुणवत्तापूर्ण जीवन बगैर किसी भी जाति का केवल संख्या बल के आधार पर वर्चस्व स्थापित करना तो दूर, वाजिब हक पाना भी मुश्किल है।
हम सभी जानते हैं कि अल्पसंख्यक ब्रिटिशों ने बहुसंख्यक भारतीयों पर करीब दो-ढाई शतक तक राज किया। तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि जाति गणना की आंधी में अब तक वर्चस्वशाली रही जातियों के तंबू-डेरे उखड़ जाएंगे? सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संदभों में इस का कतिपय दूरगामी प्रभाव अवश्य होगा। इसलिए अच्छा यह हो कि विविधता के मद्देनजर देश सम्यक सुधार की नीति अपनाए।
असल में जाति गणना को राजनीतिक दल वोटों के समीकरण के हिसाब से देख रहे हैं, परंतु बौद्धिकों के लिए यह एक गंभीर अध्ययन का विषय है। जहां तक कथित छोटी या अनुसूचित जातियों की स्थिति में सुधार की बात है, वह केवल बढ़ती संख्या दिखने पर नहीं हो सकता। उनके पक्ष में कानून बनने पर भी तब तक सुधार संभव नहीं है, जब तक उन नीतियों पर अमल नहीं होता और सामाजिक न्याय को स्वीकार्यता नहीं मिलती है। संविधान लागू होने के बाद के सत्तर सालों का अनुभव सामने है। 95 फीसदी दलित तो ऐसे हैं, जिन्हें अंग्रेजी राज से लेकर आज तक कभी कोई आरक्षण नहीं मिला। वे ग्रामीण भारत में भूमिहीन कृषि मजदूर हैं और शहरों में बेघर असंगठित मजदूर।
दलितों के प्रति सवर्ण जातियों की दबंगई जगजाहिर है। उनके खिलाफ उत्पीड़न और अत्याचारों का ग्राफ भी बढ़ा है। बेशक अनुसूचित जातियों की भी संख्या बढ़ी है, फिर भी उन्हें इससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। चूंकि ‘पूना पैक्ट‘ के बाद अनुसूचित जाति के बीच से उनके राजनीतिक प्रतिनिधि संसद और विधानसभाओं में जाते रहे, लेकिन निर्णायक पदों पर उनकी अनुपस्थिति बनी रही। ऐसे में जाति गणना से कौन-सी गैर दलित जाति विलुप्त हो जाएगी?
जहां तक जातियों की प्रगति-दुर्गति का प्रश्न है, यह राजनीतिक समीकरण पर निर्भर करता है। डॉ. आंबेडकर संविधान में खूबियां गिना कर गए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘संविधान कितना भी अच्छा हो, उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो अच्छा संविधान भी अच्छा परिणाम नहीं देगा।' अंग्रेजों ने जनगणना से प्राप्त जाति विषयक जानकारियों का दस्तावेजीकरण किया। लेकिन दलितों के लिए तो खुद अंग्रेज अफसरों की नाक के नीचे जलाशय तक ‘ठाकुर का कुआं' बने रहे।
भारतीय संत परंपरा से लेकर संविधान तक ‘जाति' न पूछने की इच्छा व्यक्त की गई। लेकिन हमारी सेवाओं के आवेदनों में, साक्षात्कारों में, बेटी-बेटों के रिश्तों में, पूजा स्थलों पर प्रवेश के दौरान जाति पूछी, बताई और दर्शाई जाती रही। जातियां संविधानेतर व्यवस्थाओं में समान दर्जा न पाने के कारण लाभ-हानि की वजह बनती रहीं। जाति के कारण किसी ने अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया, तो जाति के ही कारण किसी को मानवाधिकारों से वंचित किया गया।
जनसंख्या में वृद्धि के लिए कई कारक जिम्मेदार रहे हैं। इसके लिए राजनीतिक वर्ग भी जिम्मेदार है, जिसने अपने चुनावी हित के लिए इसे प्रोत्साहित किया। इसके अलावा शिक्षा-ज्ञान को सीमित करने वाले और आर्थिक, सामाजिक असंतुलन को बढ़ाने वाले लोग भी जिम्मेदार हैं। ऐसे में वंचित लोगों के सामने भविष्य की सुरक्षा के लिए यही विकल्प रहा कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें।
जातियां टूटने पर ही राष्ट्रीयता जुड़ेगी। ‘हम भारत के लोग' कब तक जातियों के लोग बने रहेंगे? दलितों के प्रति समाज में उग्रता व आक्रामकता बरकरार है, उनमें और वृद्धि हो सकती है। जाति गणना को सकारात्मक दृष्टि से देखने के बजाय विभाजित गुटों की नकारात्मकता की आशंका अधिक है।
-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर हैं।