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नागरिकता कानून: पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के हित में है संशोधन, साथ ही अवधारणा बदलने का आग्रह

Thu, 14 Mar 2024 06:30 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Thu, 14 Mar 2024 06:30 AM IST
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सार
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में मजहबी आधार पर सताए गए लाखों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई तथा पारसी समाज के लोगों को मानवीय आधार पर भारतीय नागरिकता प्रदान करना ही नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य है। 
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CAA Indian citizenship on humanitarian grounds religious persecution in Pakistan Bangladesh Afghanistan
CAA - फोटो : Amar Ujala/ Sonu Kumar

विस्तार

नागरिकता संशोधन कानून की नियमावली लागू कर दी गई है। इसमें इस कानून के तहत आवेदन करने और उसकी जांच तथा फिर नागरिकता मिलने की प्रक्रिया बताई गई है। केंद्र सरकार ने इसके लिए पोर्टल भी सृजित कर दिया है, जिस पर नागरिकता के लिए आवेदन किया जा सकता है। इससे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के सताए हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में सम्मानजनक ठौर मिल सकेगा। करीब चार साल पहले ही इसे पारित किया गया था। हालांकि लगातार इसके बारे में भ्रम फैलाया जाता रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय द्वारा पुष्टि के बाद भी यह थमा नहीं है। इससे न तो किसी की नागरिकता को कोई खतरा है और न ही अन्य लोगों द्वारा नागरिकता पाने की पुरानी प्रक्रिया में कोई बदलाव हुआ है।


इसमें कहा गया है कि जो लोग 31 दिसंबर, 2014 या उससे पहले भारत आ चुके हैं और भारत में पांच वर्ष तक रह चुके हैं, तो उन्हें अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। उन्हें नागरिकता पाने का अधिकार दिया गया है। कुछ विपक्षी दल तथा लोग इसे संविधान विरोधी कह रहे हैं। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 में उपलब्ध आस्था के अधिकार तथा अनुच्छेद 21 में उपलब्ध दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। कुछ लोग इसे मुस्लिमों के साथ भेदभाव मानते हैं, क्योंकि उन्हें इस कानून में मिलने वाले अधिकार से वंचित रखा गया है। उनका कहना है कि यह समता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।


समानता का नियम कोई जड़ अवधारणा नहीं है। न्याय के दूसरे सिद्धांत की तरह इसमें भी देश, काल, परिस्थितियों के मुताबिक संशोधन और परिवर्द्धन होता रहता है। समता के सिद्धांत की मूल अवधारणा यह है कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए। यदि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों को एक जैसा मानकर सबके लिए समता का सिद्धांत लागू कर दिया जाए, तो हम अन्याय को ही पोषित करेंगे। इसलिए समता के सिद्धांत में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के लिए अलग नियम को मान्यता दी गई है।

संविधान के अनुच्छेद 14 में दिया गया समानता का अधिकार भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसमें सुनिश्चित किया गया है कि किसी के साथ भेदभाव न हो। किंतु समता के सिद्धांत को पुष्ट करने के लिए यह अनुच्छेद तार्किक वर्गीकरण की अनुमति देता है।

भेदभाव और तार्किक वर्णीकरण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए न्यायालय ने सिद्धांत दिया है कि इसके लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहला कि वर्गीकरण का अधार स्पष्ट होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से समझा जा सके कि किसे सुविधा पाने वालों की श्रेणी में और किसे उससे बाहर रखा गया है। दूसरी शर्त यह है कि वर्गीकरण के आधार पर और उससे हासिल होने वाले उद्देश्य के बीच तार्किक संबंध हो। यानी वर्णीकरण करने वाले को यह साबित करना होगा कि उक्त वर्गीकरण से उसके न्यायपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति होगी।

नागरिकता संशोधन कानून में तीन पड़ोसी देशों के छह मतावलंबियों को नागकिता देने का प्रस्ताव है। चूंकि दोनों आधार स्पष्ट हैं। उन्हे समझना आसान है, इसलिए अनुच्छेद 14 में अनुमन्य तार्किक वर्गीकरण की शर्त पूरी होती है। इसमें बताया गया है कि बीते वर्षों में इन पड़ोसी देशों में लाखों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई तथा पारसी समाज के लोग पूजा-पद्धति के आधार पर प्रताड़ित किए गए और उन्हें मजबूर होकर अपना देश छोड़ना पड़ा। इसलिए उन्हें न्याय देने के लिए इसे लाया गया है। इन तीनों देशों में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव के पर्याप्त प्रमाण हैं।

अतः वहां के अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने से इस कानून के उद्देश्य की पूर्ति होती है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता। विधेयक के विरोधियों को इसे मुस्लिम, गैर-मुस्लिम बनाने के बजाय इसे गैर-प्रताड़ित और प्रताड़ित मानने की जरूरत है। जिस तरह जाति के अधार पर होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए जाति को ध्यान में रखना जरूरी है, उसी तरह पूजा-पद्धति के आधार पर भेदभाव के शिकार लोगों को प्रताड़ित और गैर-प्रताड़ित समुदाय मानने की जरूरत है, जो इस कानून द्वारा किया गया है।
 
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