फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   c rangarajan did not meet sugarcane farmers expectations

मिठास नहीं घोल पाए रंगराजन

Sat, 27 Oct 2012 09:22 PM IST
हरवीर सिंह
हरवीर सिंह Updated Sat, 27 Oct 2012 09:22 PM IST
विज्ञापन
c rangarajan did not meet sugarcane farmers expectations

देश के कई राज्यों में चीनी और गन्ने के दामों के सहारे चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के आर्थिक और राजनीतिक हालात में बदलाव गन्ना और चीनी उद्योग काफी अहम माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात में सहकारी चीनी मिलों के सहारे राजनीतिक ताकत बटोरी जाती रही है, तो उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में राजनीतिक दल गन्ना किसानों और चीनी उद्योग के सहारे अपने हित साधते रहे हैं। करीब पांच करोड़ गन्ना किसान कोई छोटी संख्या भी नहीं है। केंद्र भी इस मामले में पीछे नहीं है। वह अपने स्तर पर इस उद्योग का उपयोग करता है।

विज्ञापन

 
यहां इन बातों का ताजा संदर्भ है प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में चीनी उद्योग के विनियंत्रण के लिए बनाई गई समिति की 12 अक्तूबर, 2012 को जारी की गई रिपोर्ट। समिति की कई सिफारिशें उद्योग के पक्ष के आधार पर तर्कसंगत हैं। लेकिन किसानों के हितों और खास तौर से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और पंजाब के गन्ना किसानों के मामले में समिति की सिफारिशें बहुत व्यावहारिक नहीं हैं।
विज्ञापन


यह बात सही है कि उद्योग को लाइसेंस परमिट की प्रक्रिया से जब से छूट मिली है, उसका फायदा उद्योग और किसान, दोनों को हुआ है। इस मामले में चीनी की 10 फीसदी लेवी समाप्त करने की सिफारिश काफी हद तक जायज है। रंगराजन समिति ने खुद स्वीकार किया है कि इसे समाप्त करने पर उद्योग को करीब 3,000 करोड़ रुपये सालाना का फायदा होगा। वैसे भी इस समय केंद्र सरकार राशन में चीनी वितरण के लिए मिलों से 19.04 रुपये प्रति किलो चीनी खरीद रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकार राशन में गेहूं और चावल भी बांटती है और इस साल खाद्य सबसिडी बिल करीब एक लाख करोड़ रुपये रहेगा। बेहतर होगा कि सरकार चीनी भी बाजार से खरीदे और खुद इसका पूरा बोझ उठाए। इससे गन्ना किसानों को चीनी मिलें अधिक भुगतान कर सकेंगी।

खुले बाजार में चीनी के कोटे को हर माह जारी करने की प्रक्रिया समाप्त करने में भी सरकार को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इसी तरह चीनी के आयात निर्यात की नीति में स्थायित्व होना चाहिए। हाल के वर्षों में होता यह रहा है कि सही आंकड़ों के अभाव में सरकार ने घरेलू बाजार में कीमत रोकने के लिए आनन-फानन निर्यात पर रोक लगाई और नतीजा अधिक चीनी उत्पादन, गिरती कीमत और किसानों के मिलों पर बकाया भुगतान के रूप में सामने आया। इसी तरह चीनी उद्योग के सह उत्पादों पर केंद्र और राज्य सरकारों का बहुत नियंत्रण है।

इस रिपोर्ट का सबसे कमजोर पक्ष है गन्ना मूल्य का निर्धारण और गन्ना आरक्षण क्षेत्र को समाप्त करने की सिफारिश। चीनी उद्योग चार से छह माह तक कच्चे माल (गन्ना) की सतत आपूर्ति के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। महाराष्ट्र और गुजरात का पैटर्न अलग है, क्योंकि वहां किसानों की भागीदारी वाली सहकारी समितियां ही चीनी मिलों की मालिक हैं और उनको मुनाफे के आधार पर मूल्य का भुगतान हो जाता है। लेकिन उत्तर भारत में ऐसा नहीं है।

यहां राज्य सरकार द्वारा तय राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की सब कुछ है। हालांकि मिलें इसका विरोध पिछले 15 साल से कर रही हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इसके पक्ष में फैसला दे चुकी हैं। रंगराजन  समिति कहती है कि दो चीनी मिलों के बीच की 15 किलोमीटर की दूरी की शर्त समाप्त करने के साथ ही मिलों के लिए आरक्षित गन्ना क्षेत्र की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। एसएपी को भी समाप्त कर उसके स्थान पर किसानों को पहली किस्त के रूप में केंद्र द्वारा तय उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) का भुगतान किया जाए।

बाकी राशि चीनी और उसके उत्पादों की बिक्री से होने वाली कमाई के 70 फीसदी हिस्सेदारी के आधार पर दूसरी किस्त के रूप में दी जाए। इन राज्यों में गन्ना किसान सहकारी समितियां चीनी मिलों, राज्य सरकार और किसानों के बीच पुल का काम करती है। नई स्थिति में हर चीनी मिल के इलाके में आने वाले हजारों किसानों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर आपूर्ति का कांट्रैक्ट करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए बेहतर होगा कि मौजूदा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और कुशल बनाया जाए।

जहां तक 70 फीसदी हिस्सेदारी से गन्ना मूल्य तय करने की बात है, तो वह किसानों के गले उतरने वाला फॉरमूला नहीं है, क्योंकि जिस तरह से गन्ना मूल्य का मुद्दा कुछ अंतराल के बाद कोर्ट में जाता रहा है, उसके चलते इन राज्यों के किसानों और चीनी मिलों के बीच अविश्वास की स्थिति है। साथ ही, सहकारी समिति के जरिये संगठित होकर मोलभाव करना किसानों के लिए बेहतर है।

सवाल यह भी है कि गन्ना मूल्य के आधार पर चीनी का दाम तय क्यों नहीं हो सकता। ऐसा कौन-सा औद्योगिक उत्पाद है, जहां अंतिम उत्पाद के आधार पर कच्चे माल का दाम तय होता हो। फिर रंगराजन समिति उलटी गंगा क्यों बहा रही है? चीनी उद्योग को पूरी आजादी की सिफारिश जायज है, क्योंकि हर कदम पर यह अब भी नियंत्रण में है।


ऐसे में सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह समिति की उन सिफारिशों को पहले लागू कर दे, जिन पर विवाद नहीं है और उनमें से अधिकांश केंद्र के अधिकार में भी हैं। गन्ना मूल्य और गन्ना आरक्षण क्षेत्र जैसे मसलों पर अभी और चर्चा की जरूरत है। समिति प्रधानमंत्री ने गठित की थी, इसलिए उम्मीद है कि वह इसकी कुछ सिफारिशों को आर्थिक सुधारों के इस नए मौसम में लागू भी करेंगे। अन्यथा ऐसा न हो कि चीनी उद्योग पर पहले बनी समितियों की सूची में एक नया नाम रंगराजन समिति का जुड़ जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed