अर्थव्यवस्था पर केंद्रित हो बजट
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भारत आर्थिक चुनौतियों और राजनीतिक दबावों के बीच फंस गया है। यह संकट इस तरह है-सरकार को जितना राजस्व प्राप्त होता है, उसकी तुलना में उसका खर्च बहुत अधिक है। इस खाई को पाटने के लिए वह कर्ज लेती है। सरकार का खर्च अर्थनीति के मुताबिक नहीं, उस राजनीति के अनुरूप तय होता है, जिससे वह सत्ता में रह सके। फिर इसकी भी कोई गारंटी नहीं कि जिनकी बेहतरी के लिए खर्च किया जाता है, वह राशि उन तक पहुंचती ही है। उस नीतिकथा की तरह, जिसमें घड़े के पानी को ऊपर लाने के लिए कौआ उसमें पत्थर डालता है, सरकार को भी विकास दर ऊपर उठाने के लिए निवेश बढ़ाना होगा। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसके घड़े से पानी बह न जाए। वह जो खर्च करती है, उसका ठोस नतीजा दिखे। आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों के साथ संभावनाएं भी हैं, बजट में इन्हें जोड़ने की जरूरत है। कुछ जरूरी कदम ये हैं-
अमूल 2 का गठन-खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ने से मुद्रास्फीति ऊपर उठी है और विकास दर में कमी आई है। अमूल के बाजार में उतरने से पहले बीती सदी के छठे और सातवें दशक में अपने यहां दूध की कमी और उसकी कीमत में तेजी देखी गई थी। भारत को उत्पादन बढ़ाने, उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता हासिल करने और वितरण व्यवस्था को बेहतर करने की आवश्यकता है। भारत को अमूल 2 के रूप में खेत से खाने की मेज तक एक सुव्यवस्थित वितरण व्यवस्था चाहिए। सहकारी समितियों में फैले पच्चीस करोड़ से भी ज्यादा लोग यह काम कर सकते हैं। सरकार को एक तंत्र बनाने की जरूरत है, जो इन समितियों के गठन तथा बेहतर कामकाज में इनकी मदद करे।
वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहन-अभी दस में से चार भारतीयों के पास ही बैंक खाता है। ऐसे में देश का विकास नहीं हो सकता। यही कारण है कि देश को अपनी बचत दर को ऊपर उठाने में संघर्ष करना पड़ा, जीडीपी/टैक्स अनुपात को बेहतर करना पड़ा, नकदी, चेक, बांड जैसे वित्तीय दस्तावेजों में बचत बढ़ानी पड़ी; अनेक भारतीय अब भी सोने में निवेश कर रहे हैं, तो इसकी वजह यही है। बड़े-बड़े भवनों में बैंक चलाने के दिन गए। हमें भी अब वित्तीय समावेशन बढ़ाने के लिए तकनीकों को अपनाना होगा। अगर गरीबों को बैंकिंग सेवा में लाने में खर्च होता है, तो उसे सरकार को वहन करना चाहिए।
सब्सिडियों का सीधे नकद हस्तांतरण-सरकार ऐसी सब्सिडियों पर रोजाना 700 करोड़ रुपये खर्च करती है, जिनकी न सिर्फ विश्वसनीयता संदिग्ध है, बल्कि भ्रष्टाचार के कारण जिसका बड़ा हिस्सा बिचौलिये हड़प लेते हैं। बैंक खाते में सब्सिडी सीधे हस्तांतरित कर इससे बचा जा सकता है। केवल खाद्यान्न सब्सिडी के मामले में सरकार नकदी या खाद्यान्न का विकल्प रख सकती है।
नेशनल पावर डिस्कॉम का गठन-राज्य विद्युत बोर्डों का बकाया दो से तीन लाख करोड़ तक हो गया है। बिजली की कीमत में विसंगति और बिजली चोरी को इस घाटे की वजह बताया जाता है। राज्य बिजली बोर्डों को घाटे से उबारने के लिए बीच-बीच में सरकार को सामने आना पड़ता है। जब तक बिजली के वितरण और शुल्कों की वसूली की जिम्मेदारी राज्य बिजली बोर्डों के पास रहेगी, तब तक उन्हें घाटे से उबारने का काम बरकरार रहेगा। दरअसल भारत को एक बिजली वितरण कंपनी की जरूरत है-जो जहां बिजली की एक समान कीमत तय करेगी, सभी संसाधनों से बिजली खरीदेगी, वहीं बकाया हासिल करने के लिए एक व्यवस्था बनाएगी।
मुक्त प्रशिक्षु विश्वविद्यालय में निवेश-हर साल 1.4 करोड़ भारतीय युवा रोजगार ढूंढते हैं-यह 23 लाख चीनी सेना का छह गुना, और भारतीय रेल में नौकरी कर रहे लोगों का दस गुना है। इन युवाओं का एक बड़ा हिस्सा स्कूल की पढ़ाई छोड़ देने के बावजूद बुद्धिमान है। पर हमारे यहां रोजगार में प्रमुखता स्नातकों को ही दी जाती है। जबकि निर्माण, आपूर्ति तथा सेवा प्रदायी क्षेत्र, विमानन, मैन्यूफैक्चरिंग, खनन और यहां तक कि एकाउंटिंग कंपनियों तक में हुनरमंद युवाओं की कमी खलती है। देश को एक ऐसे मुक्त प्रशिक्षु विश्वविद्यालय की जरूरत है, जो युवाओं को सौ से तीन सौ दिनों के लिए दाखिला दे, फिर उन्हें प्रमाणपत्र दे कि वे रोजगार पाने के योग्य हैं। इन्हें यूरोप की तरह संबद्ध विषयों का सैद्धांतिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण देने का प्रावधान हो।
नदी जोड़ योजना-सूखा या मानसून की विफलता का भारत पर अब वैसा संकट नहीं आने वाला, जैसा उन्नीसवीं सदी में अकालों के जरिये आता था। नदियों को जोड़ने के पक्ष में पिछले करीब तीन दशक से तर्क दिए जा रहे हैं। अब इस पर अमल करने का समय आ गया है। इससे जल विद्युत उत्पादन बढ़ेगा। बड़ी नदी घाटियों को छोटी नदी घाटियों से जोड़कर बेहतर शुरुआत की जा सकती है।
इंडिया फर्स्ट फंड की स्थापना-देश की दशा सुधारने के लिए कई तरह की पहल जरूरी है, जिसके लिए फंड की व्यवस्था करना सरकार के लिए चुनौती है। ऐसे में, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में विनिवेश कर उसके शेयरों से राष्ट्रीय पुनरुत्थान फंड की स्थापना की जा सकती है। इस फंड का इस्तेमाल निजी बिजली कंपनियों की फंडिंग करने या कौशल विकसित करने जैसे जरूरी आर्थिक कदम उठाने में ही होना चाहिए। इस मॉडल पर काम हो रहा है-जैसे कि डीजल पर लगे उपकर से जो आय होगी, उसे राष्ट्रीय राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के विकास पर खर्च किया जाएगा। मोदी सरकार निजीकरण पर विचार भले न करे, पर उसे सरकारी स्वामित्व की नीति छोड़नी होगी।
बजट को अक्सर इस तरह देखा जाता है कि शेयर बाजार ने उस पर कैसी प्रतिक्रिया दी। लेकिन 2014 के बजट को सेंसेक्स को लुभाने के बजाय वास्तविक अर्थव्यवस्था पर केंद्रित करना होगा। चाहे सेंसेक्स हो या दलाल स्ट्रीट, वे सुशासन की अनदेखी नहीं कर सकती।
(अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक)