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वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में बड़े बदलाव लाने वाला बजट

Tue, 02 Feb 2021 04:29 AM IST
मोहनदास मोहनदास पई एवं निशा होला
मोहनदास पई एवं निशा होला Published by: मोहनदास Updated Tue, 02 Feb 2021 04:29 AM IST
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Budget to bring major changes in the backdrop of global epidemic
बजट 2021 - फोटो : अमर उजाला

वर्ष 2021-22 के बजट को वैश्विक महामारी की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए हो रहे अप्रत्याशित खर्च की भरपाई के साथ-साथ अगले वित्त वर्ष में मितव्ययिता उपायों के जरिये राजकोषीय घाटे को तेजी से कम करने के लिए कर लगाए जाने की आशंका थी। शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ। देश के स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाते हुए और कोविड-19 के नकारात्मक असर से निकलने के लिए विकासोन्मुखी बजट की जरूरत थी और यह बजट इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 


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सबसे बड़ी बात है कि सरकार स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचों पर खर्च करने की एक विस्तारवादी विकास नीति बना रही है। इसने वित्त वर्ष 2021 में  9.5 फीसदी के राजकोषीय घाटे का आकलन किया है, जिसमें बजट सब्सिडी भी शामिल है। पिछले बजट में 2.28 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी की तुलना में इस बार के बजट में सब्सिडी के मोर्चे पर 5.95 लाख करोड़ रुपये हैं, जिनमें 4.2 लाख करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी और 1.3 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी है। बजट में इतनी भारी-भरकम सब्सिडी का प्रावधान रखने से राजकोषीय घाटे का इस सीमा तक पहुंचना स्वाभाविक है। इस राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 2022 में खत्म करने का लक्ष्य है, जब सब्सिडी को घटाकर 3.35 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा, जिसमें खाद्य सब्सिडी 2.4 लाख करोड़ रुपये और उर्वरक सब्सिडी 79,000 करोड़ रुपये शामिल होंगे। राष्ट्रीय लघु बचत कोष को भी सीधे बजट में लाया गया है, भारतीय खाद्य निगम एनएसएफ से उधार नहीं लेगा। 18.5 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे (वित्त वर्ष 2021 के 194.8 लाख करोड़ रुपये के जीडीपी का 9.5 फीसदी) के साथ उम्मीद है कि सरकार अपने वित्तपोषण को साफ करेगी, वर्ष के सभी खर्च पूरे करेगी और इस असाधारण साल को पीछे छोड़ देगी। कम उधार के साथ 2022 में रोजकोषीय घाटे को कम कर 6.8 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है।

कोविड के लिए 35,000 करोड़ आवंटन के साथ इस वर्ष स्वास्थ्य पर खर्च में 137 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है, जो स्वागतयोग्य है। वैश्विक अर्थव्यवस्था से होड़ करने  और विकास के लिए भारत को वैश्विक स्तर के बुनियादी ढांचों की जरूरत है। सार्वजनिक व्यय यहां विकास का सबसे बड़ा प्रेरक है और सरकार ने इस बजट में इसे गति देने पर ध्यान केंद्रित किया है। 
राजमार्गों और हवाई अड्डों जैसी मौजूदा परिसंपत्तियों का मौद्रीकरण करके, उसे बेचकर बीस हजार करोड़ रुपये की लागत से एक विकास वित्तीय संस्थान शुरू कर परियोजनाओं के लिए पांच लाख करोड़ जुटाने का अभिनव तरीका निकाला है। 

इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च को 4.39 लाख करोड़ से बढ़ाकर 5.4 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया है। 13 प्रमुख उद्योग क्षेत्रों के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना का विस्तार करना और कई वस्तुओं के लिए सीमा शुल्क बढ़ाना स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित करेगा। मेट्रो और बसों जैसे सार्वजनिक परिवहन विकल्पों की क्षमता में सुधार से विकास में योगदान  होगा। बिजली उत्पादन एवं ट्रांसमिशन में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन वितरण अब भी उचित कीमत के अभाव, बर्बादी और लूट से पीड़ित है। डिस्कॉम निवेश और उन्नयन के लिए तीन लाख करोड़ रुपये के भारी परिव्यय के साथ उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक विकल्प पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करने से कीमत में हेरफेर रोकने में मदद मिलेगी और नागरिकों की बिजली तक पहुंच बेहतर होगी।

एमएसपी के माध्यम से किसानों को मिलने वाले लाभ की मात्रा के साथ पेश किया गया आंकड़ा दिलचस्प है और इसे सार्वजनिक डाटाबेस पर एकत्र किया जाना चाहिए। किसानों को खाद्य, बिजली, उर्वरक, पानी, प्रत्यक्ष धन हस्तांतरण और अन्य सहित कुल केंद्रीय और राज्य सब्सिडी 7.5 लाख करोड़ से अधिक है; यह एक बड़ी राशि है, जिस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। इसकी एक बड़ी राशि करदाताओं की कीमत पर संभवतः बड़े किसानों को दी जाती है, जिसे संतुलित किए जाने की जरूरत है। निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित उच्च शिक्षा विश्वविद्यालयों के प्रस्तावित क्लस्टरिंग के अलावा, विशेष रूप से राष्ट्रीय शैक्षिक नीति-2020 के मद्देनजर शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। पांच वर्षों में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन पर 50,000 करोड़ रुपये का परिव्यय एक स्वागत योग्य कदम है, जो चीन एवं अमेरिका के बरक्स भारत में नवाचार को बेहतर बनाने में योगदान देगा। डिजिटल पेमेंट, देसी भाषाओं, अंतरिक्ष और महासागरों पर फोकस अच्छा है, और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के साथ इसे संवर्धित किया जा सकता है। इसका लाभ केवल सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करना चाहिए।

सरकार कर सुधारों के बारे में गंभीर है और इलेक्ट्रॉनिक निष्पादन के अलावा अधिकरणों की स्थापना करके डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये स्कैलेबिलिटी (मापनीयता) का लाभ उठा रही है। करदाता मध्यवर्ग के लिए विशेष रूप से कोविड-19 और पिछले वर्ष के सात स्लैब के टैक्स ढांचे को ध्यान में रखते हुए टैक्स ढांचे को सरल बनाना स्वागत योग्य कदम है। कुल मिलाकर कोविड-19 की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह बजट दस में से 9.5 अंक का हकदार है। सबसे बड़ी राहत की बात है कि इसमें कोई नया कर या उपकर नहीं लगाया गया है। सरकार ने यह समझा है कि एक बुरे वर्ष में नागरिकों पर गलत तरीके से कर नहीं लगाया जा सकता है। उद्यमियों का उत्साह फिर से उभरेगा।

हालांकि स्टार्ट अप को समर्थन का अभाव निराश करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता खर्च, स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा, कर सुधार और वित्तीय क्षेत्रों में सुधार स्वागत योग्य कदम हैं और पचास खरब की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की आकांक्षा की दिशा में हैं। 

(-टीवी मोहनदास पई एरियन कैपिटल के चेयरमैन एवं निशा होला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो हैं।)

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