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बजट: आंकड़ों में दूसरा यथार्थ भी छिपा है, सरकार के लिए चुनौती पेश करेंगे कुछ विरोधाभास

Pinaki Chakraborty पिनाकी चक्रवर्ती
Updated Thu, 25 Jul 2024 07:16 AM IST
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सार
राजकोषीय लिहाज से बजट के आंकड़े प्रभावशाली हैं। नई घोषणाएं भी पर्याप्त हैं। लेकिन एक तरफ बाजार में निवेश बढ़ाने की बात की जा रही है, तो दूसरी तरफ कर ढांचे के बदलाव विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। इस तरह के विरोधाभासों से निपटना सरकार के लिए चुनौती होगी।
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Budget: There is another reality hidden in figures, some contradictions will present challenge to government
निर्मला सीतारमण - फोटो : पीटीआई

विस्तार

बीते नौ जून को सत्ता में आई नई राजग सरकार का यह पहला पूर्ण बजट है। यह बजट कई मायनों में खास है, जो अगले पांच वर्षों के दौरान आर्थिक प्रबंधन के लिए नीतिगत ढांचे का प्रतिबिंब है। बजट की शुरुआत दो सावधानियों के साथ होती है-बढ़ती वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक मुद्रास्फीति का बढ़ता जोखिम। बजट भाषण में वित्त मंत्री द्वारा इन दो वैश्विक जोखिमों का उल्लेख दर्शाता है कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था इन वैश्विक जोखिमों के प्रति कितनी संवेदनशील है।



वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि इन जोखिमों के बावजूद भारत के विकास की गति बनी रहेगी। लेकिन इसके लिए एक स्थिर व व्यापक आर्थिक व्यवस्था, टिकाऊ ऋण और घरेलू निवेश व उपभोक्ता मांग में बढ़ोतरी बेहद जरूरी है। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में भारतीय अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए केंद्रीय बजट 2024-25 में नौ प्राथमिकताएं बताई हैं। इनमें उत्पादकता, नौकरियां, सामाजिक न्याय, शहरी विकास, ऊर्जा सुरक्षा, बुनियादी ढांचा, नवाचार और सुधार शामिल हैं। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कई महत्वपूर्ण  घोषणाएं की हैं।


हाल के वर्षों में बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती रही है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि इस बार बजट में रोजगार, कौशल विकास, लघु, सूक्ष्म एवं मध्यम आकार के उद्यम (एमएसएमई) एवं मध्यवर्ग पर खास ध्यान दिया गया है। बजट में रोजगार बढ़ाने या निजी क्षेत्र में रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। बजट में शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास, समावेशी मानव संसाधन विकास और सामाजिक न्याय से संबंधित जिन पांच योजनाओं की घोषणा की गई है, वे समावेशी विकास और सामाजिक विकास के लिए सक्षम ढांचा बना सकती हैं। ये घोषणाएं इस तथ्य को भी रेखांकित करती हैं कि बेरोजगारी इस समय देश के सामने सबसे गंभीर एवं व्यापक आर्थिक समस्याओं में से एक है। कौशल विकास पारिस्थितिकी तंत्र और रोजगार के अवसरों के बीच अंतर को पाटने के लिए, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस मुद्दे को संबोधित करने के उद्देश्य से 2 ट्रिलियन (बीस खरब) रुपये के प्रधानमंत्री पैकेज के हिस्से के रूप में एक नई केंद्र प्रायोजित योजना की भी घोषणा की। 60 हजार करोड़ रुपये के परिव्यय वाली इस योजना का लक्ष्य राज्य सरकारों और उद्योग के सहयोग से अगले पांच वर्षों में बीस लाख से अधिक युवाओं को कौशल प्रदान करना है। कौशल के परिणाम और गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो पाठ्यक्रम सामग्री और डिजाइन उद्योग की जरूरतों के अनुरूप है। 60 हजार करोड़ रुपये में से, राज्य सरकारें 20 हजार करोड़ रुपये और उद्योग जगत 10 हजार करोड़ रुपये का योगदान देगा, जिसमें उसके कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) फंड भी शामिल हैं।

इस बजट में अगली पीढ़ी के सुधारों से संबंधित कई घोषणाएं की गई हैं। ये सुधार भूमि, श्रम, पूंजी, केंद्र-राज्य समन्वय और प्रौद्योगिकी के उपयोग से संबंधित हैं। बजट में जलवायु अनुकूलन और शमन के लिए पूंजी की उपलब्धता बढ़ाने की खातिर सक्षम ढांचा बनाने पर भी जोर दिया गया है। इनमें से अधिकांश सुधारों का क्रियान्वयन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है। खास तौर से भूमि से संबंधित कोई भी सुधार राज्य सरकारों को ही करना होगा। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, भूमि पर अधिकार, जमींदार और किरायेदार के संबंध सहित भूमि का स्वामित्व, और किराये का संग्रह; कृषि भूमि का हस्तांतरण तथा भूमि सुधार राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। पिछले दो दशकों में भूमि एवं भूमि बाजार में सुधार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। कुछ राज्यों में भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण एक बड़ी कामयाबी है। इस संबंध में राज्य स्तर पर व्यावहारिक भूमि संबंधी नीतिगत सुधारों के लिए विभिन्न राज्य स्तरीय नीतियों को समझना महत्वपूर्ण  है। इस मामले में केंद्र सरकार केवल राज्यों को सक्षम बना सकती है। ये सुधार केंद्र सरकार द्वारा संचालित नहीं किए जा सकते। इसलिए ऐसे सुधारों के कार्यान्वयन की सफलता के लिए राज्य सरकारों के साथ परामर्श प्रक्रिया की शुरुआत करनी होगी।

इस बजट में आयकर ढांचे में इस तरह परिवर्तन किया गया है कि आयकर भुगतान के बाद लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा बचा रहे। इसके लिए मूल छूट सीमा को बढ़ाया गया है, जिसके तहत वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए मानक कटौती को 50,000 रुपये से बढ़ाकर 75,000 रुपये कर दिया गया है। इसी तरह पेंशनभोगियों के लिए पारिवारिक पेंशन पर कटौती में छूट सीमा भी 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी गई है। बजट में आयकर अधिनियम, 1961 की व्यापक समीक्षा की भी घोषणा की गई है। चूंकि आधुनिक कर प्रणाली सरल और प्रशासन में आसान है, इसलिए आयकर अधिनियम की समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण  है। आयकर स्लैब में भी बदलाव किया गया है, जिससे आय वितरण के निचले छोर पर रहने वाले लोगों को मदद मिलेगी। हालांकि आयकर व्यवस्था वेतनभोगी और मध्यम वर्ग के हाथों में कर चुकाने के बाद अधिक आय प्रदान करती प्रतीत होती है। चूंकि ज्यादातर लोग नई कर व्यवस्था चुन रहे हैं, नए बजट के प्रावधानों के अनुसार, अब आम लोगों के हाथ में ज्यादा खर्च योग्य आय बचेगी, जिससे उन्हें महंगाई से निपटने में भी सहूलियत मिलेगी। लेकिन कैपिटल गेन टैक्स की दर में बदलाव, उन बदलावों के अनुरूप नहीं है, जो हाल के वर्षों में हमने  वित्तीय बाजारों में देखे हैं।

भारत के वित्तीय बाजार में खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ने से बदलाव की संभावना है। पिछले तीन वर्षों में जब भी देश से पूंजी का बहिर्गमन हुआ है, खुदरा निवेशकों ने ही मदद की है।  कैपिटल गेन टैक्स में वृद्धि निवेशकों को विरोधाभासी संकेत दे सकती है तथा शेयर बाजार के आधार को बढ़ाने के बड़े नीतिगत लक्ष्य के विरुद्ध दिख सकती है। मगर राजकोषीय हिसाब-किताब के लिहाज से बजट के आंकड़े प्रभावशाली हैं। राजकोषीय विवेक के साथ चलते रहना होगा और केंद्र सरकार के ऋण और घाटे को राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन अधिनियम के अनुरूप कम करना होगा।

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