फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Broken Dreams, Empty Seats

टूटते सपने, खाली सीटें

Wed, 18 Jul 2018 06:49 PM IST
रोहित कौशिक
रोहित कौशिक Updated Wed, 18 Jul 2018 06:49 PM IST
विज्ञापन
Broken Dreams, Empty Seats
रोहित कौशिक

पिछले दिनों अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने कम दाखिले वाले तकनीकी शिक्षण संस्थाओं को स्वैच्छिक रूप से बंद करने की पहल को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया था। आज हमारे देश में तकनीकी शिक्षा विभिन्न विसंगतियों के चलते दयनीय स्थिति में है। पिछले तीन-चार वर्षों से इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट कॉलेजों की सीटें नहीं भर रही हैं। सवाल है कि इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट की डिग्रियों से छात्रों का मोहभंग क्यों हुआ?


loader

अगर प्रतियोगिता के माध्यम से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने की बात छोड़ दें, तो वर्ष 2000 तक छात्र दक्षिण के निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में इंजीनियरिंग पढ़ने जाते थे। उस समय इंजीनियरिंग में प्रवेश कराने वाले दलालों ने भारी मुनाफा कमाया। 1997 में दक्षिण की तर्ज पर देश के विभिन्न राज्यों में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने शुरू हुए। हालांकि उस समय इनकी संख्या अधिक नहीं थी। 2001 के आसपास निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या बढ़ने लगी और 2006 से 2010 तक कुकुरमुत्तों की तरह निजी इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट कॉलेज खुले। ये कॉलेज कब शिक्षा की दुकान बन गए, पता ही नहीं चला। आज छात्र न मिलने के कारण अनेक कॉलेज बंद होने के कगार पर हैं।
 
जरूरत से ज्यादा कॉलेज होने के साथ कुछ अन्य कारण भी हैं, जिनके चलते छात्रों का इन डिग्रियों से मोहभंग हुआ है। ज्यादातर निजी कॉलेजों से डिग्रियां लेने के बाद छात्रों को नौकरी के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं। किसी तरह नौकरी मिल भी जाती है, तो उसे बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जब डिग्री के अनुसार अच्छा वेतन नहीं मिलता, तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। इसी वजह से आज छात्रों और अभिभावकों का मोहभंग हुआ है।
 
असल में निजी कॉलेजों के मालिकों को अपने संसाधनों से कॉलेज का खर्च चलाना पड़ता है। जाहिर है, वे पैसा लगाकर कॉलेज खोलते हैं, तो मुनाफा भी कमाना चाहेंगे। ऐसे कॉलेजों को कोई सरकारी अनुदान भी नहीं मिलता है। सरकार अगर निजी कॉलेज खोलने की अनुमति देती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन कॉलेजों को छात्र भी मिले। निजी कॉलेज के मालिक ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में उसे शिक्षा की दुकान बना देते हैं। वे शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते हैं। इस तरह शिक्षा प्रदान करने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से एक व्यवसाय में तब्दील हो चुकी है, जिसमें सरकार, संबंधित विश्वविद्यालय और एआईसीटीई सभी शामिल हैं। पिछले दिनों एआईसीटीई के अंदर भ्रष्टाचार की खबरें प्रकाश में आई थीं। जब एआईसीटीई से जुडे़ कुछ लोग स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हों, तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि यह संस्था इंजीनियरिंग कॉलेजों का सही तरह से मूल्यांकन कर पाएगी।

ऐसा किसी एक प्रदेश में नहीं होता, बल्कि हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश समेत देश के अधिकतर राज्यों में यही हाल है। शिक्षा के निजीकरण ने सरकारी मशीनरी को खाने-कमाने की मशीन बना दिया है। विडंबना यह है कि कॉलेजों के मालिकों को तो सभी दोष देते हैं, पर सरकारी मशीनरी को कोई दोष नहीं देता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार, प्राविधिक विश्वविद्यालय और एआईसीटीई छात्रों को केवल डिग्रियां बांटना चाहती हैं या फिर उन्हें एक सफल इंजीनियर एवं प्रबंधक बनाना चाहती हैं। शिक्षा के मंदिरों का बंद होना न तो शुभ होता है और न ही समाज में सकारात्मक संदेश देता है। इसलिए हमें यह ध्यान देना होगा कि निजी कॉलेज शिक्षा की दुकान न बनें और छात्रों के अभाव में उन्हें बंद न करना पड़े। अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा को मजाक बनने से रोका जाए। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed